मगर सपने नए होते हैं


विजय शंकर पांडेय 


पिता की कमीज़ पुरानी होती है,

मगर सपने नए होते हैं।

हमारे लिए।


कमीज़ के बटन ढीले होते हैं।

जिम्मेदारियाँ टाइट।


कॉलर घिसा होता है।

हौसला चमकदार।


वो फैशन नहीं देखते।

फीस देखते हैं।

ट्रेंड नहीं पूछते।

इंतजाम सब करते हैं।


पिता सैलरी स्लिप नहीं,

संघर्ष की पर्ची होते हैं।


सुबह अलार्म से पहले उठते हैं।

रात चिंता के बाद सोते हैं।

बीच में

पूरी ज़िंदगी काम पर रहते हैं।


उनकी जेब में

हमारा भविष्य रहता है।

खुद के सपने

काग़ज़ की तरह मुड़े रहते हैं।


नई कमीज़ मिलती है

तो शादी में।

या फिर

किसी खास मौके पर।


पिता “थक गया हूं”

कभी नहीं कहते।

बस कुर्सी पर

चुपचाप बैठ जाते हैं।


बच्चे पूछें—

पापा, सब ठीक है?

तो जवाब आता है—

हाँ, सब बढ़िया है।

बस आवाज़

थोड़ी भारी होती है।


मोबाइल पुराना।

चार्जर ढीला।

पर हौसले की बैटरी

फुल रहती है।


उनका हास्य सादा होता है।

मजाक कम।

जिम्मेदारी ज़्यादा।


आज बच्चे ब्रांड पहनते हैं।

पिता भरोसा पहनते हैं।


और जब हम उड़ना सीखते हैं,

पिता जमीन बन जाते हैं।


कमीज़ और पुरानी हो जाती है।

पर सपने

और नए।


हमारे लिए।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी: केवल इस ब्लॉग का सदस्य टिप्पणी भेज सकता है.