लोकतंत्र में कैमरा उठाना गुनाह है क्या?

 पत्रकार बनाम रील मेकर

विजय शंकर पांडेय 



सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों एक बड़ा सवाल गूंज रहा है—कौन पत्रकार है और कौन रील मेकर? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील है कि मोबाइल से रिकॉर्डिंग करने वाले हर शख्स की पहचान करना मुश्किल है। बात में दम है! आखिर कैमरे के पीछे खड़े आदमी की नीयत पढ़ने वाला कोई ऐप अभी तक लॉन्च नहीं हुआ है।


लेकिन सवाल यह है कि अगर मोबाइल उठाकर वीडियो बनाने वाला रील मेकर है, तो सूट-बूट पहनकर स्टूडियो में बैठा हर शख्स पत्रकार कैसे हो गया? क्या पत्रकारिता की डिग्री अब कैमरे के मेगापिक्सल और माइक पर लगे चैनल के लोगो से तय होगी?


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। संविधान ने कहीं यह नहीं लिखा कि बोलने से पहले किसी बड़े मीडिया हाउस का नियुक्ति पत्र दिखाना होगा। न ही यह शर्त रखी गई कि सच बोलने के लिए गले में प्रेस कार्ड और पीछे ओबी वैन होनी चाहिए।


दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स की याचिका भी इसी सवाल को उठाती है कि स्वतंत्र पत्रकारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खबरें साझा करने वालों को संरक्षण से वंचित क्यों रखा जाए?


अब जरा सरकार की चिंता समझिए। मोबाइल लेकर घूमने वाला व्यक्ति पत्रकार निकला, तो वह सवाल पूछ सकता है। सवाल पूछ लिया, तो जवाब देना पड़ सकता है। जवाब देने लगे, तो पुराना बयान याद आ सकता है। और पुराना बयान याद आ गया, तो नई खबर बन सकती है! इसलिए बेहतर है कि पहले यह तय हो जाए कि कैमरे वाला पत्रकार है या रील मेकर। तब तक मुद्दा कहीं और निकल चुका होगा।


वैसे रील बनाना अपराध नहीं है। बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रील बनाने को रोजगार के अवसरों से जोड़ चुके हैं। अब रोजगार का रास्ता खोलने के बाद अगर कोई उसी मोबाइल से भ्रष्टाचार, बदइंतजामी या जनता की परेशानी रिकॉर्ड करने लगे, तो उसके पेशे की पहचान अचानक इतनी जटिल क्यों हो जाती है?


क्या रील में दिखाया गया सच, सिर्फ इसलिए झूठ हो जाएगा कि उसे किसी स्वतंत्र पत्रकार ने रिकॉर्ड किया है?


मुख्यधारा के मीडिया पर भी सवाल कम नहीं हैं। व्यावसायीकरण, प्रायोजित खबरें, राजनीतिक दबाव और टीआरपी की दौड़ ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाई है। सोशल मीडिया पर लोग अक्सर मुख्यधारा के मीडिया को 'गोदी मीडिया' कहकर निशाना साधते हैं। ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकार कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण हैं।


हालांकि, हर स्वतंत्र पत्रकार सत्यवादी हरिश्चंद्र नहीं और हर रील मेकर खोजी पत्रकार नहीं। सोशल मीडिया पर अफवाहें भी फैलती हैं। इसलिए पत्रकारिता की कसौटी पहचान पत्र नहीं, बल्कि तथ्य, निष्पक्षता, जवाबदेही और जनहित होना चाहिए।


रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है। यह स्थिति मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।


ऐसे में महिला पत्रकारों पर हमले और बदसलूकी के मामलों में उनकी सुरक्षा पर बहस होनी चाहिए, न कि उनकी पहचान को ही बहस का केंद्र बना दिया जाए। पत्रकार चाहे बड़े चैनल का हो या छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म का, हमला करने वाले से पहले उसके संस्थान का नाम पूछना कैसा न्याय है?


लोकतंत्र में कैमरा अपराधी नहीं होता, वह कभी-कभी सत्ता का आईना भी होता है। आईने में चेहरा अच्छा दिखे तो उसे विकास की तस्वीर कहिए, लेकिन चेहरा बिगड़ा दिखे तो आईना बनाने वाले को रील मेकर बताकर खारिज मत कीजिए।


आखिर लोकतंत्र कोई ऐसा स्टूडियो नहीं, जहां सिर्फ चुने हुए एंकरों को बोलने की अनुमति हो। यहां जनता भी सवाल पूछ सकती है। और हां, अगर हर सवाल पूछने वाले को पत्रकार मानना मुश्किल है, तो हर सवाल से बचने वाले को लोकतंत्र का रक्षक मानना भी आसान नहीं होना चाहिए!


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कर्ज़ अमेरिका ले रहा, झटका भारत का शेयर बाज़ार खा रहा

 विजय शंकर पांडेय


कर्ज़ अमेरिका की सरकार ले रही है… और भुगत भारत का शेयर बाज़ार रहा है! अब आप कहेंगे— “भइया, अमेरिका ने उधार लिया है तो हमारी जेब क्यों विलाप रही है?”‌तो थोड़ा हिसाब-किताब समझिए… क्योंकि शेयर बाज़ार में दर्द हमेशा वहीं नहीं होता, जहाँ से चोट लगी हो!


अमेरिका को खर्च चलाना है। कमाई कम पड़ गई तो सरकार ने कहा— “कोई बात नहीं, बॉन्ड बेच देते हैं!” निवेशक आए, डॉलर दिए और अमेरिकी सरकार को पैसा दे गए।‌ बदले में सरकार बोली— “लो भाई, ब्याज भी देंगे… आराम से 10-30 साल बाद हिसाब कर लेंगे!”‌ अब अमेरिकी बॉन्ड को दुनिया में सबसे सुरक्षित निवेशों में गिना जाता है। तो अगर 10 साल के अमेरिकी बॉन्ड पर करीब 5% का रिटर्न मिल रहा हो, तो विदेशी निवेशक भारत के शेयर बाज़ार में क्यों आए?


यहाँ शेयर बाज़ार कहता है— “भाई, पैसा लगाओ… मुनाफा भी हो सकता है, घाटा भी!” उधर अमेरिकी बॉन्ड कहता है— “बैठो आराम से, ब्याज लो!” निवेशक बोला— “रिस्क क्यों लें? हम कोई समाजसेवी संस्था थोड़े ही हैं!” और फिर विदेशी पैसा भारतीय शेयर बाज़ार से निकलने लगता है।


नतीजा देखिए—निफ़्टी सितंबर 2024 में करीब 26 हजार के आसपास था, और अब करीब 23 हजार के आसपास घूम रहा है। यानी अगर किसी ने दो साल पहले निफ़्टी में एक लाख रुपये लगाए होते, तो आज हिसाब देखकर शायद कैलकुलेटर से कहता— “भाई, तू ही बता… गलती मेरी थी या टाइमिंग की?” ऊपर से विदेशी निवेशकों ने भारत से करीब 5 लाख करोड़ रुपये की नेट बिक्री कर दी।


अब सवाल है— विदेशी पैसा भारत से जा क्यों रहा है? पहला कारण—AI की बहार। अमेरिका, ताइवान और कोरिया में AI कंपनियों के शेयरों ने निवेशकों को खूब आकर्षित किया। हमारे यहाँ निवेशक AI ढूँढता है तो कभी-कभी मोबाइल में ChatGPT खुल जाता है!


दूसरा—भारतीय शेयरों की कीमत। निफ़्टी का PE करीब 20 है, जबकि लंबे समय का औसत करीब 17 रहा है। मतलब बाज़ार गिरने के बाद भी निवेशक कह रहा है— “अरे भाई, सेल लगी है… लेकिन इतनी भी नहीं!”


फिर आता है रुपया। डॉलर महंगा हुआ तो विदेशी निवेशक का रिटर्न दबता है। उसने डॉलर बेचकर रुपये लगाए थे, अब रुपये बेचकर डॉलर खरीदने हैं।‌ यानी भारत से पैसा निकालते वक्त डॉलर बोला— “पहले मेरा भाव देख लो!” 


और अब अमेरिकी बॉन्ड की बढ़ती यील्ड भी खेल में आ गई। एक तरफ शेयर बाज़ार— “रिस्क है, लेकिन रिटर्न बड़ा हो सकता है।” दूसरी तरफ अमेरिकी बॉन्ड— “लगभग सुरक्षित हूँ और ब्याज भी दूँगा।” निवेशक बोला— “भाई, पहले सुरक्षित पैसा रख लेते हैं… रोमांच बाद में करेंगे!”


लेकिन कहानी में ट्विस्ट ये है कि अमेरिका का कर्ज़ भी लगातार बढ़ रहा है। टैरिफ़, युद्ध और ब्याज दरों की चिंता अलग। क्योंकि कर्ज़ भी आखिर कर्ज़ है। आज डॉलर में हो या रुपये में— उधार लेकर घी पीने की भी एक लिमिट होती है। और वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा मज़ाक यही है—

अमेरिका कर्ज़ लेकर खर्च करता है, विदेशी निवेशक डरकर पैसा निकालता है, और भारत का शेयर बाज़ार कहता है—

“भइया, मेरा क्या कसूर था?” दुनिया ग्लोबल हो गई है साहब—अब अमेरिका की उधारी का हिसाब भी भारत का निवेशक अपनी जेब से समझता है!



साभार - #नेशनल_व्हील्स, #प्रयागराज 


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डेमोग्राफिक डिविडेंड: क्या भारत इस अवसर को बर्बाद कर रहा है?

 


विजय शंकर पांडेय



शुक्र है कि जंतर मंतर का छात्र आंदोलन खत्म हो गया। सरकार ने शनिवार को सारी मांगें मान लीं, छात्र खुश होकर घर लौट गए, और देश फिर से उसी पुरानी आरामदायक स्थिति में आ गया—जहाँ हर कोई कहता है “हमें डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) का फायदा उठाना चाहिए”, लेकिन कोई नहीं बताता कि फायदा उठाने वाला कौन है और बर्बाद करने वाला कौन।


पहले समझ लो भाई, डेमोग्राफिक डिविडेंड क्या होता है। 15 से 64 साल की उम्र वाली आबादी को कामकाजी आबादी कहते हैं। ये लोग काम करते हैं, कमाते हैं, खर्च करते हैं, टैक्स देते हैं, और सरकार उस पैसे से सड़क, स्कूल, अस्पताल बनाती है। चीन, दक्षिण कोरिया, वियतनाम ने इसी डिविडेंड से अमीर बन गए। भारत में भी यही डिविडेंड है… बस थोड़ा सा फर्क है। हमारे यहाँ डिविडेंड को “डिविडेंड” नहीं, “डिविडेंड-भ्रष्ट” कहते हैं।


देखो न मजा, छात्रों ने आंदोलन किया।


मांग क्या थी? अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी, अच्छी जिंदगी। सरकार ने कहा—“मंजूर!” फिर छात्रों ने कहा—“ठीक है, हम घर जा रहे हैं।” और घर जाकर क्या किया? उसी व्हाट्स ऐप ग्रुप में बैठकर “सरकार ने फिर कुछ नहीं किया” वाला पोस्ट लिखा। डेमोग्राफिक डिविडेंड का सबसे बड़ा दुश्मन यही है—पोस्ट। पोस्ट लिखने में इतनी मेहनत लगती है कि असली काम करने का समय ही नहीं बचता।


चीन वालों ने डिविडेंड का फायदा कैसे उठाया? उन्होंने कारखाने बनाए, सड़कें बनाईं, बच्चों को गणित सिखाई। हमारे यहाँ क्या होता है? बच्चा 15 साल का हुआ, डिविडेंड चालू। 18 साल का हुआ, कॉलेज में एडमिशन के लिए कोटा-कोटा खेल। 22 साल का हुआ, बेरोजगारी भत्ता मांगने का आंदोलन। 25 साल का हुआ, “मुझे सरकारी नौकरी दो वरना मैं टिकट काट दूँगा” वाला धरना। 30 साल का हुआ, शादी, और डिविडेंड खत्म। 64 साल आने से पहले ही डिविडेंड रिटायर हो जाता है।


मजा और देखो। सरकार कहती है—“हम स्किल डेवलपमेंट कर रहे हैं।” स्किल डेवलपमेंट का मतलब है—तीन महीने का कोर्स, सर्टिफिकेट, और फिर “अरे भाई, ये सर्टिफिकेट तो कोई कंपनी नहीं मानती।” फिर वही छात्र वापस जंतर मंतर पहुँच जाता है। डेमोग्राफिक डिविडेंड का चक्र पूरा हो जाता है—जन्म, शिक्षा, आंदोलन, सर्टिफिकेट, फिर आंदोलन। चीन में डिविडेंड से जीडीपी बढ़ती है, भारत में डिविडेंड से “ट्रेंडिंग हैशटैग” बढ़ता है।


और सबसे बड़ी मजेदार बात—हर नेता भाषण देता है, “हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड विश्व का सबसे बड़ा खजाना है।” खजाना तो है, लेकिन खजाने की चाबी किसके पास है? चाबी तो उस मंत्रालय के पास है जहाँ फाइलें 15 साल से “अंडर प्रोसेस” हैं। फाइल भी डेमोग्राफिक डिविडेंड वाली उम्र में पहुँच चुकी है—15 से 64 साल की—लेकिन अभी तक “वर्क इन प्रोग्रेस” है।


अगर हमने इस डिविडेंड को सही से इस्तेमाल नहीं किया तो क्या होगा? भविष्य में जब चीन वाले मंगल पर कॉलोनी बना रहे होंगे, तब हम जंतर मंतर पर बैठकर मांग करेंगे—“हमें भी मंगल पर जाने का कोटा दो!” और सरकार मान लेगी। छात्र खुश होकर घर लौट जाएँगे। फिर अगले दिन नया आंदोलन शुरू हो जाएगा—“मंगल पर भी बेरोजगारी है!”


तो दोस्तों, डेमोग्राफिक डिविडेंड बर्बाद मत कीजिए। नहीं तो एक दिन डिविडेंड खुद आकर कहेगा—“भाई, मैं थक गया। अब मैं साउथ कोरिया चला गया। वहाँ कम से कम काम तो होता है।”


और तब हम सब मिलकर एक नया हैशटैग चलाएँगे—डेमोग्राफिक डिविडेंड वापस आओ।




डेमोग्राफिक डिविडेंड का 10 साल का काउंटडाउन शुरू… टिक-टिक-टिक!


भाई साहब, अभी भारत में हर 100 में से 67 लोग कामकाजी श्रेणी में हैं। 1960 में ये आँकड़ा 56 था। 2030 तक 69 हो जाएगा, फिर 2035 से नीचे गिरने लगेगा। यानी डेमोग्राफिक डिविडेंड का फायदा उठाने के लिए हमारे पास ठीक-ठीक 10 साल बचे हैं। 10 साल! इतने में कोई देश विकसित हो जाता है, और हम इतने में सिर्फ एक और पेपर लीक स्कैम का सीजन पूरा कर लेते हैं।


अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट कहती है कि हर साल 50 लाख युवा ग्रेजुएट नौकरी के बाजार में कूदते हैं। इनमें से सैलरी वाली नौकरी सिर्फ 17 लाख को मिलती है। 11 लाख को कोई-न-कोई जुगाड़ वाला रोजगार मिल जाता है। बाकी? बाकी लोग “मैं भी ग्रेजुएट हूँ” वाला स्टेटस लगाकर बैठ जाते हैं। और जिन्हें नौकरी मिल भी जाती है, उनकी सैलरी बढ़ने का इंतजार उसी तरह होता है जैसे सरकारी फाइल का—सालों साल।


अब जंतर मंतर का आंदोलन याद कीजिए। छात्र चिल्ला रहे थे—पढ़ाई में गड़बड़ी, परीक्षा में लीक, नौकरी में लीक। सरकार ने मांगें मान लीं। छात्र घर लौट गए। लेकिन असली समस्या तो वही है—सबको सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। सरकारी नौकरी मिलना अब लगभग वैसा ही हो गया है जैसे लॉटरी। फर्क सिर्फ इतना है कि लॉटरी में कम से कम नंबर लीक नहीं होते।


डेमोग्राफिक डिविडेंड का सबसे बड़ा मजा यह है कि युवाओं को शिक्षा और रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार कहती है—“हम कर रहे हैं।” फिर बजट भाषण में स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया के नारे लगते हैं। नतीजा? युवा स्किल इंडिया, करके घर आते हैं और कहते हैं—“स्किल तो आ गया, अब जॉब कहाँ है?” डिजिटल इंडिया में सब कुछ डिजिटल हो गया—नौकरी की लिस्ट भी डिजिटल है, सिर्फ नौकरी असली नहीं है।


और सबसे खतरनाक बात—हम दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आय में लगभग 140वें नंबर पर हैं। यानी देश अमीर है, नागरिक गरीब। अगर इस डिविडेंड का फायदा नहीं उठाया तो भारत अमीर होने से पहले ही बूढ़ा हो जाएगा। कल्पना कीजिए—2035 के बाद जब कामकाजी आबादी घटने लगेगी, तब बुजुर्ग बैठकर कहेंगे, “अरे जब हम जवान थे तो डेमोग्राफिक डिविडेंड था… हमने उसे जंतर मंतर पर खर्च कर दिया।”


10 साल का समय है। चीन ने इसी समय में दुनिया बदल दी। हमने इसी समय में कितने पेपर लीक किए, कितने आंदोलन किए, कितने हैशटैग ट्रेंड करवाए—ये हिसाब लगाने में ही 8 साल निकल जाएँगे। बाकी 2 साल में कोई नया आयोग बनेगा, जो रिपोर्ट देगा कि “डेमोग्राफिक डिविडेंड बर्बाद हो गया है, अब क्या करें?”


तो युवाओं, जल्दी करो। पढ़ो, स्किल सीखो, नौकरी ढूँढो… नहीं तो एक दिन डिविडेंड खुद रिटायरमेंट ले लेगा और कहेगा—“भाई, मैंने तुम्हें 10 साल दिए थे। तुमने मुझसे जंतर मंतर करा लिया। अब मैं साउथ कोरिया चला गया। वहाँ कम से कम उम्र के साथ सैलरी भी बढ़ती है।”


और तब हम सब बुजुर्ग होकर एक नया नारा लगाएँगे—  

“डेमोग्राफिक डिविडेंड लौटाओ… नहीं तो पेंशन दो!”





डेमोग्राफिक डिविडेंड का राजनीतिक पहलू: वोट बैंक का सबसे बड़ा ‘डिविडेंड’!


भाइयो-बहनों, डेमोग्राफिक डिविडेंड सिर्फ आबादी का खेल नहीं है। ये तो भारतीय राजनीति का सबसे स्वादिष्ट मेन्यू है। 67 प्रतिशत कामकाजी आबादी? वाह! ये तो तैयार-तैयार वोट बैंक है। 2030 तक 69 प्रतिशत? और भी बढ़िया। 10 साल का समय? बिल्कुल सही—दो-तीन चुनाव चक्र का समय। यानी डिविडेंड का असली फायदा देश को नहीं, पार्टियों को उठाना है।


देखो कैसे खेल चलता है। सत्ता में बैठे लोग भाषण देते हैं—“हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड विश्व का सबसे बड़ा खजाना है। हम स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया से इसे सोने में बदल देंगे।” विपक्ष तुरंत जवाब देता है—“खजाना तो है, लेकिन चाबी आपकी जेब में है और जॉब कहीं नहीं है। 50 लाख ग्रेजुएट आते हैं, 17 लाख को नौकरी मिलती है। बाकी को सिर्फ ‘आत्मनिर्भर’ बनने का सर्टिफिकेट मिलता है।” फिर दोनों तरफ से एक ही बात निकलती है—“हम युवाओं के साथ हैं।” युवा सुनकर ताली बजाते हैं, और अगले चुनाव में फिर वही वादा दोहराया जाता है।


जंतर मंतर का आंदोलन याद है? छात्र शिक्षा और परीक्षा लीक को लेकर सड़क पर थे। राजनीतिक दल तुरंत मैदान में कूद पड़े। कोई बोला—“ये तो व्यवस्था की नाकामी है।” कोई बोला—“पिछली सरकार ने बिगाड़ा था।” कोई बोला—“हम सत्ता में आए तो सब ठीक कर देंगे।” आंदोलन खत्म हुआ, छात्र घर गए, और डिविडेंड फिर से उसी पुरानी फाइल में वापस चला गया—‘अंडर कंसीडरेशन’। राजनीति में समस्या हल करना जरूरी नहीं, समस्या को चुनाव तक जिंदा रखना जरूरी है।


मजा तो तब आता है जब आरक्षण, कोटा और फ्रीबी का मसाला मिलता है। डेमोग्राफिक डिविडेंड को जाति, धर्म, क्षेत्र के हिसाब से बाँट दिया जाता है। एक पार्टी कहती है—“युवाओं को नौकरी दो।” दूसरी कहती है—“पहले कोटा बढ़ाओ।” तीसरी कहती है—“मुफ्त बिजली, मुफ्त राशन, मुफ्त लैपटॉप।” नतीजा? युवा नौकरी माँगने के बजाय मुफ्त का इंतजार करने लगते हैं। डिविडेंड काम करने के बजाय ‘मुफ्तखोरी’ का डिविडेंड बन जाता है।


और सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई ये है कि 10 साल का समय राजनीतिक रूप से बहुत लंबा होता है। नेता सोचते हैं—“अगला चुनाव तो 5 साल बाद है। तब तक मैं वादा कर दूँगा, रिपोर्ट बनवा दूँगा, नया आयोग बना दूँगा।” 2035 के बाद जब कामकाजी आबादी घटने लगेगी, तब कोई नेता बचेगा ही नहीं जो जवाबदेह हो। सब रिटायर हो चुके होंगे या किसी और पार्टी में चले गए होंगे। देश बूढ़ा हो जाएगा, और राजनीति कहेगी—“अरे, हमने तो कोशिश की थी… जनता ने वोट नहीं दिया।”


चीन ने डिविडेंड का फायदा उठाया क्योंकि वहाँ एक पार्टी थी और फैसला जल्दी होता था। भारत में लोकतंत्र है, इसलिए फैसला लेने में इतना समय लगता है कि डिविडेंड खुद थककर बैठ जाता है। लोकतंत्र की खूबी है कि हर कोई बोल सकता है। खराबी ये है कि बोलने वाले इतने ज्यादा हैं कि काम करने वाला कोई नहीं बचता।


तो दोस्तों, डेमोग्राफिक डिविडेंड का असली राजनीतिक पहलू ये है—ये युवाओं का भविष्य नहीं, नेताओं का वर्तमान है। युवा सोचते हैं नौकरी मिलेगी, नेता सोचते हैं वोट मिलेगा। दोनों सही हैं। बस फर्क इतना है कि वोट तो 5 साल में मिल जाता है, नौकरी 10 साल में भी नहीं मिलती।


अगर यह सिलसिला जारी रहा तो 2035 में जब डिविडेंड ढलान पर होगा, तब कोई नया नेता खड़ा होकर बोलेगा—“हमारे पूर्वजों ने डेमोग्राफिक डिविडेंड बर्बाद कर दिया। अब हम ‘डेमोग्राफिक लाइबिलिटी’ को संभालेंगे।” और युवा (जो अब अधेड़ हो चुके होंगे) ताली बजाते हुए कहेंगे—“वाह! क्या विजन है!”


यही है भारतीय राजनीति का असली डेमोग्राफिक डिविडेंड—वादों का, भाषणों का, और हमेशा के लिए अधूरे रह जाने वाले सपनों का।

स्रष्टा और सृष्टि का अंतर मिट रहा

अब आपका गुस्सा भी “डिजिटल एसेट” है, हाथ में ब्रह्मास्त्र, दिमाग में फितूर

#विजय_शंकर_पांडेय


आज के युग में ज्ञान बहुत सस्ता हो गया है। इतना सस्ता कि हर दूसरा आदमी रील देखकर तीन मिनट में भू-राजनीति, क्वांटम फिजिक्स और अध्यात्म सामान्य तौर पर समझ लेता है। सूचनाओं का ऐसा अंबार है कि आदमी को अपने पड़ोसी का जन्मदिन भले याद न हो, लेकिन मंगल ग्रह का तापमान पता है। ज्ञान कहता है— “सब कुछ संभव है।” विवेक बेचारा कोने में बैठकर पूछता है— “लेकिन भाई, करना भी चाहिए क्या?” 



आज लोग टर्म ऐंड कंडीशन पढ़े बिना आत्मा तक स्वीकार कर लेते हैं। और फिर कहते हैं—प्राइवेसी खतरे में है! हर जेब में स्मार्टफोन है, लेकिन बातचीत अब भी मूर्खतापूर्ण है। गूगल के पास हर सवाल का जवाब है, बस “चुप कब रहना है” इसका ऑप्शन अभी बीटा वर्जन में है। पहले लोग तपस्या करके ज्ञान पाते थे। अब लोग वाईफाई  पकड़कर ज्ञानी बन जाते हैं। एक सज्जन तो सुबह योगा पर मोटिवेशनल पोस्ट डालते हैं, और दोपहर में ट्रोलिंग करके चार लोगों का रक्तचाप बढ़ा देते हैं। असल संकट सूचना की कमी नहीं, शून्य की कमी है। वह खाली जगह, जहां आदमी थोड़ा रुककर सोच सके—“जो मैं जानता हूं, क्या उसे समझता भी हूं?” वरना आजकल ज्ञान बढ़ रहा है, और बुद्धि स्टोरेज फुल दिखा रही है।


इंसान पहले पत्थर घिसता था, अब प्रॉम्प्ट घिस रहा है। पहले आग खोजी थी, अब “एआई जेनरेटेड” ज्ञान खोज रहा है। ऋषि-मुनि जंगल में ध्यान लगाते थे, आजकल लोग चैटजीपीटी से पूछते हैं— “गुरुजी, आत्मा क्या है? और साथ में एक एचडी फोटो भी बना दो।” हर आदमी अपनी चेतना का डिजिटल जुड़वा बना रहा है। किसी का एआई प्रेम पत्र लिख रहा है, किसी का एआई इश्क के हुनर सीखा रहा, और कुछ महानुभावों का एआई इस्तीफा भी लिख देता है— बस नौकरी छोड़ने की हिम्मत अभी इंसान को खुद करनी पड़ती है। दार्शनिक चिंतित हैं— “स्रष्टा और सृष्टि का अंतर मिट रहा है!” 

उधर कॉर्पोरेट वाले खुश हैं— “बहुत बढ़िया! अब कर्मचारी भी मशीन, और मशीन भी कर्मचारी!” एक बाबा ने तो नया कोर्स निकाल दिया— “डिजिटल मोक्ष विद कृत्रिम कुंडलिनी।” फीस मात्र 51 हजार। साथ में फ्री ई-बुक— “आत्मज्ञान इन 30 सेकंड।” सब ओर डेटा का शोर है। एल्गोरिद्म चीख रहे हैं। नोटिफिकेशन बरस रहे हैं। और भीतर बैठा मौलिक मौन धीरे से पूछ रहा है— “बेटा, तू चेतना बढ़ा रहा है या बस वाईफाई?” यहीं से शुरू होता है चेतना का विद्रोह— जब आदमी पहली बार मोबाइल बंद करके खुद से मिलने की कोशिश करता है।


इंसान ने कमाल कर दिया है। जेब में ऐसी मशीन रख ली है, जिससे पूरी दुनिया चल सकती है। बस दिक्कत इतनी है कि उसी मशीन से वह दिनभर रील भी देख रहा है। हम ईश्वरीय सामर्थ्य वाले उपकरण बना रहे हैं। AI  नॉवेल लिख रहा है, रोबोट सर्जरी कर रहा है, ड्रोन युद्ध लड़ रहे हैं। और इंसान? अब भी “रिप्लाई आल” दबाकर ऑफिस में महाभारत करा देता है। तकनीक आसमान छू रही है, लेकिन संयम अब भी जमीन पर पड़ा नेटवर्क ढूंढ रहा है। 


एक वैज्ञानिक बोला— “हमने ऐसी मशीन बनाई है जो मानवता बदल देगी!” उधर निवेशक बोला— “बहुत बढ़िया। इससे विज्ञापन कितने बेचेंगे?” सभ्यता बड़ी अजीब जगह पहुंच गई है। परमाणु शक्ति भी है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी, लेकिन ट्रैफिक में हॉर्न बजाते समय आदिमानव वाली आत्मा जाग जाती है। तकनीक भविष्य का ढांचा बना सकती है, लेकिन उसमें प्राण फूंकने का काम अब भी चेतना को ही करना है। वरना होगा यह कि मशीनें सुपरइंटेलिजेंट होंगी और उन्हें चलाने वाले लोग पासवर्ड में “1234” डाल रहे होंगे। असल खतरा AI नहीं है। खतरा वह इंसान है जिसके हाथ में ब्रह्मास्त्र है और दिमाग में कमेंट सेक्शन।


आप जितना चिल्लाएंगे, उतना प्लेटफॉर्म कमाएगा


पहले जमाने में व्यापारी नमक बेचते थे। अब कंपनियां गुस्सा बेचती हैं। सोशल मीडिया का नया सिद्धांत है— “आप खुश हैं? तो आप बेकार यूज़र हैं।” फ्रांसेस हॉगन ने बताया कि एल्गोरिद्म वही दिखाते हैं जिससे लोग लड़ें, भड़कें और टूट जाएं। क्योंकि प्यार में लोग स्क्रोल कम करते हैं, लेकिन नफरत में पूरी रात जागते हैं। अब आपका गुस्सा भी “डिजिटल एसेट” है। आप जितना चिल्लाएंगे, उतना प्लेटफॉर्म कमाएगा। 


एक आदमी ने लिखा— “आज मौसम अच्छा है।” पोस्ट पर दो लाइक आए। दूसरे ने लिखा—“देश खतरे में है!” तीन लाख शेयर, चार टीवी डिबेट, और पांच राजनीतिक पार्टियों का टिकट। एल्गोरिद्म बड़ा संवेदनशील जीव है। उसे आपकी उदासी, डर, असुरक्षा सब समझ आती है। बस इंसानियत समझने का फीचर अभी डेवलपमेंट में है। पहले मां कहती थी— “बेटा, गुस्सा मत किया करो।” अब ऐप कहता है— “भाई, थोड़ा और भड़क जाओ, इंगेजमेंट गिर रहा है।” दुनिया में अब भावनाएं महसूस नहीं की जातीं, मापी जाती हैं। क्रोध = रीच। नफरत = मोनेटाइजेशन। और विवेक? वह शायद “कम्युनिटी गाईडलाइन” पढ़ते-पढ़ते कहीं सो गया है।


भाई, इससे पड़ोसी की नौकरी कैसे खा सकते हैं?


तकनीक बेचारा निर्दोष है। उसने कब कहा था— “मुझे बनाओ और फिर नैतिकता को छुट्टी पर भेज दो!” समस्या यह है कि हमारे मोबाइल का सॉफ्टवेयर हर हफ्ते अपडेट हो जाता है, लेकिन दिमाग अब भी “संस्करण 1.0” पर अटका है। चैटजीपीटी दो महीने में 10 करोड़ लोगों तक पहुंच गया। उधर नैतिकता समिति अभी तक पहली मीटिंग का व्हाट्सऐप ग्रुप ही बना रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पूछ रहा है— “मैं मानवता की कैसे सेवा करूं?” और इंसान पूछ रहा है— “भाई, इससे पड़ोसी की नौकरी कैसे खा सकते हैं?” 

पहले लोग चरित्र निर्माण करते थे। अब “प्रोफाइल निर्माण” करते हैं। बायो में लिखा है— सहानुभूतिपूर्ण | दूरदर्शी | मानवता को प्राथमिकता देने वाला और नीचे कमेंट— “भाई, उसको बेरोजगार करवा दो।” मशीनें रातोंरात अपग्रेड हो रही हैं। कल तक एआई स्क्रिप्ट लिखता था, आज फिल्म बना रहा है। कल शायद संसद भी चला ले। वैसे फर्क किसी को पता भी नहीं चलेगा। मानव चरित्र बेचारा धीमा है। उसे अपडेट होने में पीढ़ियां लगती हैं। क्योंकि उसके सर्वर पर अहंकार, लालच और पाखंड का भारी लोड है। दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भाग रही है, और नेचुरल कॉमन सेंस अब लुप्तप्राय प्रजाति घोषित होने वाला है।


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