डेमोग्राफिक डिविडेंड: क्या भारत इस अवसर को बर्बाद कर रहा है?

 


विजय शंकर पांडेय



शुक्र है कि जंतर मंतर का छात्र आंदोलन खत्म हो गया। सरकार ने शनिवार को सारी मांगें मान लीं, छात्र खुश होकर घर लौट गए, और देश फिर से उसी पुरानी आरामदायक स्थिति में आ गया—जहाँ हर कोई कहता है “हमें डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) का फायदा उठाना चाहिए”, लेकिन कोई नहीं बताता कि फायदा उठाने वाला कौन है और बर्बाद करने वाला कौन।


पहले समझ लो भाई, डेमोग्राफिक डिविडेंड क्या होता है। 15 से 64 साल की उम्र वाली आबादी को कामकाजी आबादी कहते हैं। ये लोग काम करते हैं, कमाते हैं, खर्च करते हैं, टैक्स देते हैं, और सरकार उस पैसे से सड़क, स्कूल, अस्पताल बनाती है। चीन, दक्षिण कोरिया, वियतनाम ने इसी डिविडेंड से अमीर बन गए। भारत में भी यही डिविडेंड है… बस थोड़ा सा फर्क है। हमारे यहाँ डिविडेंड को “डिविडेंड” नहीं, “डिविडेंड-भ्रष्ट” कहते हैं।


देखो न मजा, छात्रों ने आंदोलन किया।


मांग क्या थी? अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी, अच्छी जिंदगी। सरकार ने कहा—“मंजूर!” फिर छात्रों ने कहा—“ठीक है, हम घर जा रहे हैं।” और घर जाकर क्या किया? उसी व्हाट्स ऐप ग्रुप में बैठकर “सरकार ने फिर कुछ नहीं किया” वाला पोस्ट लिखा। डेमोग्राफिक डिविडेंड का सबसे बड़ा दुश्मन यही है—पोस्ट। पोस्ट लिखने में इतनी मेहनत लगती है कि असली काम करने का समय ही नहीं बचता।


चीन वालों ने डिविडेंड का फायदा कैसे उठाया? उन्होंने कारखाने बनाए, सड़कें बनाईं, बच्चों को गणित सिखाई। हमारे यहाँ क्या होता है? बच्चा 15 साल का हुआ, डिविडेंड चालू। 18 साल का हुआ, कॉलेज में एडमिशन के लिए कोटा-कोटा खेल। 22 साल का हुआ, बेरोजगारी भत्ता मांगने का आंदोलन। 25 साल का हुआ, “मुझे सरकारी नौकरी दो वरना मैं टिकट काट दूँगा” वाला धरना। 30 साल का हुआ, शादी, और डिविडेंड खत्म। 64 साल आने से पहले ही डिविडेंड रिटायर हो जाता है।


मजा और देखो। सरकार कहती है—“हम स्किल डेवलपमेंट कर रहे हैं।” स्किल डेवलपमेंट का मतलब है—तीन महीने का कोर्स, सर्टिफिकेट, और फिर “अरे भाई, ये सर्टिफिकेट तो कोई कंपनी नहीं मानती।” फिर वही छात्र वापस जंतर मंतर पहुँच जाता है। डेमोग्राफिक डिविडेंड का चक्र पूरा हो जाता है—जन्म, शिक्षा, आंदोलन, सर्टिफिकेट, फिर आंदोलन। चीन में डिविडेंड से जीडीपी बढ़ती है, भारत में डिविडेंड से “ट्रेंडिंग हैशटैग” बढ़ता है।


और सबसे बड़ी मजेदार बात—हर नेता भाषण देता है, “हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड विश्व का सबसे बड़ा खजाना है।” खजाना तो है, लेकिन खजाने की चाबी किसके पास है? चाबी तो उस मंत्रालय के पास है जहाँ फाइलें 15 साल से “अंडर प्रोसेस” हैं। फाइल भी डेमोग्राफिक डिविडेंड वाली उम्र में पहुँच चुकी है—15 से 64 साल की—लेकिन अभी तक “वर्क इन प्रोग्रेस” है।


अगर हमने इस डिविडेंड को सही से इस्तेमाल नहीं किया तो क्या होगा? भविष्य में जब चीन वाले मंगल पर कॉलोनी बना रहे होंगे, तब हम जंतर मंतर पर बैठकर मांग करेंगे—“हमें भी मंगल पर जाने का कोटा दो!” और सरकार मान लेगी। छात्र खुश होकर घर लौट जाएँगे। फिर अगले दिन नया आंदोलन शुरू हो जाएगा—“मंगल पर भी बेरोजगारी है!”


तो दोस्तों, डेमोग्राफिक डिविडेंड बर्बाद मत कीजिए। नहीं तो एक दिन डिविडेंड खुद आकर कहेगा—“भाई, मैं थक गया। अब मैं साउथ कोरिया चला गया। वहाँ कम से कम काम तो होता है।”


और तब हम सब मिलकर एक नया हैशटैग चलाएँगे—डेमोग्राफिक डिविडेंड वापस आओ।




डेमोग्राफिक डिविडेंड का 10 साल का काउंटडाउन शुरू… टिक-टिक-टिक!


भाई साहब, अभी भारत में हर 100 में से 67 लोग कामकाजी श्रेणी में हैं। 1960 में ये आँकड़ा 56 था। 2030 तक 69 हो जाएगा, फिर 2035 से नीचे गिरने लगेगा। यानी डेमोग्राफिक डिविडेंड का फायदा उठाने के लिए हमारे पास ठीक-ठीक 10 साल बचे हैं। 10 साल! इतने में कोई देश विकसित हो जाता है, और हम इतने में सिर्फ एक और पेपर लीक स्कैम का सीजन पूरा कर लेते हैं।


अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट कहती है कि हर साल 50 लाख युवा ग्रेजुएट नौकरी के बाजार में कूदते हैं। इनमें से सैलरी वाली नौकरी सिर्फ 17 लाख को मिलती है। 11 लाख को कोई-न-कोई जुगाड़ वाला रोजगार मिल जाता है। बाकी? बाकी लोग “मैं भी ग्रेजुएट हूँ” वाला स्टेटस लगाकर बैठ जाते हैं। और जिन्हें नौकरी मिल भी जाती है, उनकी सैलरी बढ़ने का इंतजार उसी तरह होता है जैसे सरकारी फाइल का—सालों साल।


अब जंतर मंतर का आंदोलन याद कीजिए। छात्र चिल्ला रहे थे—पढ़ाई में गड़बड़ी, परीक्षा में लीक, नौकरी में लीक। सरकार ने मांगें मान लीं। छात्र घर लौट गए। लेकिन असली समस्या तो वही है—सबको सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। सरकारी नौकरी मिलना अब लगभग वैसा ही हो गया है जैसे लॉटरी। फर्क सिर्फ इतना है कि लॉटरी में कम से कम नंबर लीक नहीं होते।


डेमोग्राफिक डिविडेंड का सबसे बड़ा मजा यह है कि युवाओं को शिक्षा और रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार कहती है—“हम कर रहे हैं।” फिर बजट भाषण में स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया के नारे लगते हैं। नतीजा? युवा स्किल इंडिया, करके घर आते हैं और कहते हैं—“स्किल तो आ गया, अब जॉब कहाँ है?” डिजिटल इंडिया में सब कुछ डिजिटल हो गया—नौकरी की लिस्ट भी डिजिटल है, सिर्फ नौकरी असली नहीं है।


और सबसे खतरनाक बात—हम दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आय में लगभग 140वें नंबर पर हैं। यानी देश अमीर है, नागरिक गरीब। अगर इस डिविडेंड का फायदा नहीं उठाया तो भारत अमीर होने से पहले ही बूढ़ा हो जाएगा। कल्पना कीजिए—2035 के बाद जब कामकाजी आबादी घटने लगेगी, तब बुजुर्ग बैठकर कहेंगे, “अरे जब हम जवान थे तो डेमोग्राफिक डिविडेंड था… हमने उसे जंतर मंतर पर खर्च कर दिया।”


10 साल का समय है। चीन ने इसी समय में दुनिया बदल दी। हमने इसी समय में कितने पेपर लीक किए, कितने आंदोलन किए, कितने हैशटैग ट्रेंड करवाए—ये हिसाब लगाने में ही 8 साल निकल जाएँगे। बाकी 2 साल में कोई नया आयोग बनेगा, जो रिपोर्ट देगा कि “डेमोग्राफिक डिविडेंड बर्बाद हो गया है, अब क्या करें?”


तो युवाओं, जल्दी करो। पढ़ो, स्किल सीखो, नौकरी ढूँढो… नहीं तो एक दिन डिविडेंड खुद रिटायरमेंट ले लेगा और कहेगा—“भाई, मैंने तुम्हें 10 साल दिए थे। तुमने मुझसे जंतर मंतर करा लिया। अब मैं साउथ कोरिया चला गया। वहाँ कम से कम उम्र के साथ सैलरी भी बढ़ती है।”


और तब हम सब बुजुर्ग होकर एक नया नारा लगाएँगे—  

“डेमोग्राफिक डिविडेंड लौटाओ… नहीं तो पेंशन दो!”





डेमोग्राफिक डिविडेंड का राजनीतिक पहलू: वोट बैंक का सबसे बड़ा ‘डिविडेंड’!


भाइयो-बहनों, डेमोग्राफिक डिविडेंड सिर्फ आबादी का खेल नहीं है। ये तो भारतीय राजनीति का सबसे स्वादिष्ट मेन्यू है। 67 प्रतिशत कामकाजी आबादी? वाह! ये तो तैयार-तैयार वोट बैंक है। 2030 तक 69 प्रतिशत? और भी बढ़िया। 10 साल का समय? बिल्कुल सही—दो-तीन चुनाव चक्र का समय। यानी डिविडेंड का असली फायदा देश को नहीं, पार्टियों को उठाना है।


देखो कैसे खेल चलता है। सत्ता में बैठे लोग भाषण देते हैं—“हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड विश्व का सबसे बड़ा खजाना है। हम स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया से इसे सोने में बदल देंगे।” विपक्ष तुरंत जवाब देता है—“खजाना तो है, लेकिन चाबी आपकी जेब में है और जॉब कहीं नहीं है। 50 लाख ग्रेजुएट आते हैं, 17 लाख को नौकरी मिलती है। बाकी को सिर्फ ‘आत्मनिर्भर’ बनने का सर्टिफिकेट मिलता है।” फिर दोनों तरफ से एक ही बात निकलती है—“हम युवाओं के साथ हैं।” युवा सुनकर ताली बजाते हैं, और अगले चुनाव में फिर वही वादा दोहराया जाता है।


जंतर मंतर का आंदोलन याद है? छात्र शिक्षा और परीक्षा लीक को लेकर सड़क पर थे। राजनीतिक दल तुरंत मैदान में कूद पड़े। कोई बोला—“ये तो व्यवस्था की नाकामी है।” कोई बोला—“पिछली सरकार ने बिगाड़ा था।” कोई बोला—“हम सत्ता में आए तो सब ठीक कर देंगे।” आंदोलन खत्म हुआ, छात्र घर गए, और डिविडेंड फिर से उसी पुरानी फाइल में वापस चला गया—‘अंडर कंसीडरेशन’। राजनीति में समस्या हल करना जरूरी नहीं, समस्या को चुनाव तक जिंदा रखना जरूरी है।


मजा तो तब आता है जब आरक्षण, कोटा और फ्रीबी का मसाला मिलता है। डेमोग्राफिक डिविडेंड को जाति, धर्म, क्षेत्र के हिसाब से बाँट दिया जाता है। एक पार्टी कहती है—“युवाओं को नौकरी दो।” दूसरी कहती है—“पहले कोटा बढ़ाओ।” तीसरी कहती है—“मुफ्त बिजली, मुफ्त राशन, मुफ्त लैपटॉप।” नतीजा? युवा नौकरी माँगने के बजाय मुफ्त का इंतजार करने लगते हैं। डिविडेंड काम करने के बजाय ‘मुफ्तखोरी’ का डिविडेंड बन जाता है।


और सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई ये है कि 10 साल का समय राजनीतिक रूप से बहुत लंबा होता है। नेता सोचते हैं—“अगला चुनाव तो 5 साल बाद है। तब तक मैं वादा कर दूँगा, रिपोर्ट बनवा दूँगा, नया आयोग बना दूँगा।” 2035 के बाद जब कामकाजी आबादी घटने लगेगी, तब कोई नेता बचेगा ही नहीं जो जवाबदेह हो। सब रिटायर हो चुके होंगे या किसी और पार्टी में चले गए होंगे। देश बूढ़ा हो जाएगा, और राजनीति कहेगी—“अरे, हमने तो कोशिश की थी… जनता ने वोट नहीं दिया।”


चीन ने डिविडेंड का फायदा उठाया क्योंकि वहाँ एक पार्टी थी और फैसला जल्दी होता था। भारत में लोकतंत्र है, इसलिए फैसला लेने में इतना समय लगता है कि डिविडेंड खुद थककर बैठ जाता है। लोकतंत्र की खूबी है कि हर कोई बोल सकता है। खराबी ये है कि बोलने वाले इतने ज्यादा हैं कि काम करने वाला कोई नहीं बचता।


तो दोस्तों, डेमोग्राफिक डिविडेंड का असली राजनीतिक पहलू ये है—ये युवाओं का भविष्य नहीं, नेताओं का वर्तमान है। युवा सोचते हैं नौकरी मिलेगी, नेता सोचते हैं वोट मिलेगा। दोनों सही हैं। बस फर्क इतना है कि वोट तो 5 साल में मिल जाता है, नौकरी 10 साल में भी नहीं मिलती।


अगर यह सिलसिला जारी रहा तो 2035 में जब डिविडेंड ढलान पर होगा, तब कोई नया नेता खड़ा होकर बोलेगा—“हमारे पूर्वजों ने डेमोग्राफिक डिविडेंड बर्बाद कर दिया। अब हम ‘डेमोग्राफिक लाइबिलिटी’ को संभालेंगे।” और युवा (जो अब अधेड़ हो चुके होंगे) ताली बजाते हुए कहेंगे—“वाह! क्या विजन है!”


यही है भारतीय राजनीति का असली डेमोग्राफिक डिविडेंड—वादों का, भाषणों का, और हमेशा के लिए अधूरे रह जाने वाले सपनों का।

स्रष्टा और सृष्टि का अंतर मिट रहा

अब आपका गुस्सा भी “डिजिटल एसेट” है, हाथ में ब्रह्मास्त्र, दिमाग में फितूर

#विजय_शंकर_पांडेय


आज के युग में ज्ञान बहुत सस्ता हो गया है। इतना सस्ता कि हर दूसरा आदमी रील देखकर तीन मिनट में भू-राजनीति, क्वांटम फिजिक्स और अध्यात्म सामान्य तौर पर समझ लेता है। सूचनाओं का ऐसा अंबार है कि आदमी को अपने पड़ोसी का जन्मदिन भले याद न हो, लेकिन मंगल ग्रह का तापमान पता है। ज्ञान कहता है— “सब कुछ संभव है।” विवेक बेचारा कोने में बैठकर पूछता है— “लेकिन भाई, करना भी चाहिए क्या?” 



आज लोग टर्म ऐंड कंडीशन पढ़े बिना आत्मा तक स्वीकार कर लेते हैं। और फिर कहते हैं—प्राइवेसी खतरे में है! हर जेब में स्मार्टफोन है, लेकिन बातचीत अब भी मूर्खतापूर्ण है। गूगल के पास हर सवाल का जवाब है, बस “चुप कब रहना है” इसका ऑप्शन अभी बीटा वर्जन में है। पहले लोग तपस्या करके ज्ञान पाते थे। अब लोग वाईफाई  पकड़कर ज्ञानी बन जाते हैं। एक सज्जन तो सुबह योगा पर मोटिवेशनल पोस्ट डालते हैं, और दोपहर में ट्रोलिंग करके चार लोगों का रक्तचाप बढ़ा देते हैं। असल संकट सूचना की कमी नहीं, शून्य की कमी है। वह खाली जगह, जहां आदमी थोड़ा रुककर सोच सके—“जो मैं जानता हूं, क्या उसे समझता भी हूं?” वरना आजकल ज्ञान बढ़ रहा है, और बुद्धि स्टोरेज फुल दिखा रही है।


इंसान पहले पत्थर घिसता था, अब प्रॉम्प्ट घिस रहा है। पहले आग खोजी थी, अब “एआई जेनरेटेड” ज्ञान खोज रहा है। ऋषि-मुनि जंगल में ध्यान लगाते थे, आजकल लोग चैटजीपीटी से पूछते हैं— “गुरुजी, आत्मा क्या है? और साथ में एक एचडी फोटो भी बना दो।” हर आदमी अपनी चेतना का डिजिटल जुड़वा बना रहा है। किसी का एआई प्रेम पत्र लिख रहा है, किसी का एआई इश्क के हुनर सीखा रहा, और कुछ महानुभावों का एआई इस्तीफा भी लिख देता है— बस नौकरी छोड़ने की हिम्मत अभी इंसान को खुद करनी पड़ती है। दार्शनिक चिंतित हैं— “स्रष्टा और सृष्टि का अंतर मिट रहा है!” 

उधर कॉर्पोरेट वाले खुश हैं— “बहुत बढ़िया! अब कर्मचारी भी मशीन, और मशीन भी कर्मचारी!” एक बाबा ने तो नया कोर्स निकाल दिया— “डिजिटल मोक्ष विद कृत्रिम कुंडलिनी।” फीस मात्र 51 हजार। साथ में फ्री ई-बुक— “आत्मज्ञान इन 30 सेकंड।” सब ओर डेटा का शोर है। एल्गोरिद्म चीख रहे हैं। नोटिफिकेशन बरस रहे हैं। और भीतर बैठा मौलिक मौन धीरे से पूछ रहा है— “बेटा, तू चेतना बढ़ा रहा है या बस वाईफाई?” यहीं से शुरू होता है चेतना का विद्रोह— जब आदमी पहली बार मोबाइल बंद करके खुद से मिलने की कोशिश करता है।


इंसान ने कमाल कर दिया है। जेब में ऐसी मशीन रख ली है, जिससे पूरी दुनिया चल सकती है। बस दिक्कत इतनी है कि उसी मशीन से वह दिनभर रील भी देख रहा है। हम ईश्वरीय सामर्थ्य वाले उपकरण बना रहे हैं। AI  नॉवेल लिख रहा है, रोबोट सर्जरी कर रहा है, ड्रोन युद्ध लड़ रहे हैं। और इंसान? अब भी “रिप्लाई आल” दबाकर ऑफिस में महाभारत करा देता है। तकनीक आसमान छू रही है, लेकिन संयम अब भी जमीन पर पड़ा नेटवर्क ढूंढ रहा है। 


एक वैज्ञानिक बोला— “हमने ऐसी मशीन बनाई है जो मानवता बदल देगी!” उधर निवेशक बोला— “बहुत बढ़िया। इससे विज्ञापन कितने बेचेंगे?” सभ्यता बड़ी अजीब जगह पहुंच गई है। परमाणु शक्ति भी है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी, लेकिन ट्रैफिक में हॉर्न बजाते समय आदिमानव वाली आत्मा जाग जाती है। तकनीक भविष्य का ढांचा बना सकती है, लेकिन उसमें प्राण फूंकने का काम अब भी चेतना को ही करना है। वरना होगा यह कि मशीनें सुपरइंटेलिजेंट होंगी और उन्हें चलाने वाले लोग पासवर्ड में “1234” डाल रहे होंगे। असल खतरा AI नहीं है। खतरा वह इंसान है जिसके हाथ में ब्रह्मास्त्र है और दिमाग में कमेंट सेक्शन।


आप जितना चिल्लाएंगे, उतना प्लेटफॉर्म कमाएगा


पहले जमाने में व्यापारी नमक बेचते थे। अब कंपनियां गुस्सा बेचती हैं। सोशल मीडिया का नया सिद्धांत है— “आप खुश हैं? तो आप बेकार यूज़र हैं।” फ्रांसेस हॉगन ने बताया कि एल्गोरिद्म वही दिखाते हैं जिससे लोग लड़ें, भड़कें और टूट जाएं। क्योंकि प्यार में लोग स्क्रोल कम करते हैं, लेकिन नफरत में पूरी रात जागते हैं। अब आपका गुस्सा भी “डिजिटल एसेट” है। आप जितना चिल्लाएंगे, उतना प्लेटफॉर्म कमाएगा। 


एक आदमी ने लिखा— “आज मौसम अच्छा है।” पोस्ट पर दो लाइक आए। दूसरे ने लिखा—“देश खतरे में है!” तीन लाख शेयर, चार टीवी डिबेट, और पांच राजनीतिक पार्टियों का टिकट। एल्गोरिद्म बड़ा संवेदनशील जीव है। उसे आपकी उदासी, डर, असुरक्षा सब समझ आती है। बस इंसानियत समझने का फीचर अभी डेवलपमेंट में है। पहले मां कहती थी— “बेटा, गुस्सा मत किया करो।” अब ऐप कहता है— “भाई, थोड़ा और भड़क जाओ, इंगेजमेंट गिर रहा है।” दुनिया में अब भावनाएं महसूस नहीं की जातीं, मापी जाती हैं। क्रोध = रीच। नफरत = मोनेटाइजेशन। और विवेक? वह शायद “कम्युनिटी गाईडलाइन” पढ़ते-पढ़ते कहीं सो गया है।


भाई, इससे पड़ोसी की नौकरी कैसे खा सकते हैं?


तकनीक बेचारा निर्दोष है। उसने कब कहा था— “मुझे बनाओ और फिर नैतिकता को छुट्टी पर भेज दो!” समस्या यह है कि हमारे मोबाइल का सॉफ्टवेयर हर हफ्ते अपडेट हो जाता है, लेकिन दिमाग अब भी “संस्करण 1.0” पर अटका है। चैटजीपीटी दो महीने में 10 करोड़ लोगों तक पहुंच गया। उधर नैतिकता समिति अभी तक पहली मीटिंग का व्हाट्सऐप ग्रुप ही बना रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पूछ रहा है— “मैं मानवता की कैसे सेवा करूं?” और इंसान पूछ रहा है— “भाई, इससे पड़ोसी की नौकरी कैसे खा सकते हैं?” 

पहले लोग चरित्र निर्माण करते थे। अब “प्रोफाइल निर्माण” करते हैं। बायो में लिखा है— सहानुभूतिपूर्ण | दूरदर्शी | मानवता को प्राथमिकता देने वाला और नीचे कमेंट— “भाई, उसको बेरोजगार करवा दो।” मशीनें रातोंरात अपग्रेड हो रही हैं। कल तक एआई स्क्रिप्ट लिखता था, आज फिल्म बना रहा है। कल शायद संसद भी चला ले। वैसे फर्क किसी को पता भी नहीं चलेगा। मानव चरित्र बेचारा धीमा है। उसे अपडेट होने में पीढ़ियां लगती हैं। क्योंकि उसके सर्वर पर अहंकार, लालच और पाखंड का भारी लोड है। दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भाग रही है, और नेचुरल कॉमन सेंस अब लुप्तप्राय प्रजाति घोषित होने वाला है।


साभार #नेशनल_व्हील्स #प्रयागराज

बंगाल में दिमाग भी साथ लाना पड़ता है

दुर्गा पूजा में अंजलि दोगे या सिर्फ सेल्फी लोगे?

विजय शंकर पांडेय


बंगाल में सिर्फ़ गला फाड़ने से काम नहीं चलता—यहाँ दिमाग भी साथ लाना पड़ता है। बंगाल चुनाव आते ही बाहरी नेताओं को अचानक लगता है कि हुगली के किनारे भी वही फार्मूला चलेगा, जो साबरमती के किनारे चला था। बस माइक उठाओ, आवाज़ दो डेसिबल और बढ़ाओ, दो-चार तुकबंदी वाली बजबजाते जुमले फेंको और समझ लो जनता “वाह साहब! क्या मास्टर स्ट्रोक है” कहकर वोट डालने दौड़ पड़ेगी। 

उन्हें लगता है कि बंगाल भी कोई विशाल व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का एक्सटेंशन सेंटर है, जहाँ जितनी ज़ोर से बोलो, उतनी जल्दी सत्य प्रमाणित हो जाता है। लेकिन बंगाल बेचारा हर बार चश्मा ठीक करते हुए पूछता है—“भाषण खत्म हुआ? अब कुछ विचार भी हैं, या सिर्फ़ वॉल्यूम ही लाए हैं?” 

यह वही बंगाल है जहाँ चैतन्य ने भक्ति दी, रवींद्रनाथ ने कविता दी, नज़रुल ने विद्रोह दिया, और विवेकानंद ने विचार दिया। वहाँ अगर आप टपोरी स्टाइल में “करारा हमला” बेचने आएँगे, तो जनता उसे भाषण नहीं, लोकल ट्रेन का झगड़ा समझेगी। नोएडा मीडिया उधर स्टूडियो में चिल्लाता है—“क्या मास्टरस्ट्रोक है!” और बंगाल इधर चाय की चुस्की लेकर कहता है—“भाई, यह स्ट्रोक कम, शोर ज़्यादा लग रहा है।” 


पहले संस्कृति से एनओसी लेनी पड़ती है

बाकी भारत में नेता जनता से वोट मांगते हैं, बंगाल में पहले संस्कृति से एनओसी लेनी पड़ती है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में इस बार विकास, रोजगार और सड़क-पानी जैसे मुद्दे कम ही चर्चा में आए। हां, आप कितने छटाक बंगाली हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढते ज्यादातर भाजपा नेता नजर आए। 

इससे पहले कांग्रेस हो, वामपंथी हो या फिर कांग्रेस से ही निकला तृणमूल हो, कभी इस तरह की अग्निपरीक्षा से किसी को नहीं गुजरना पड़ा। भाजपा नेता मंच पर पहुंचते ही पहले भाषण नहीं, पहचान पत्र निकालते दिख रहे हैं—देखिए, हमने भी आज माछ-भात खाया है, रसोगोल्ला भी बिना चम्मच के खाया है, और कोलकाता’ को ‘कलकत्ता’ नहीं बोलते! 

मुख्यमंत्री पद का चेहरा पूछो तो जवाब आता है—चेहरा पूरी तरह बंगाली होगा, बस अभी वॉशिंग मशीन में है, निकलते ही दिखा देंगे। उधर विरोधी पूछ रहे हैं—दुर्गा पूजा में अंजलि दोगे या सिर्फ सेल्फी लोगे? भाषा पर हालत यह है कि हर नेता “आमार सोनार बांग्ला” बोलते-बोलते “वंदे मातरम्” पर सुरक्षित लैंडिंग कर रहा है। धोती-कुर्ता पहनकर फोटोशूट हो रहे हैं, लेकिन बैठते समय सबको डर—कहीं प्लीट्स से राष्ट्रवाद बाहर न गिर जाए। बंगाल ने साफ कर दिया है—यहां सिर्फ चुनाव जीतना काफी नहीं, पहले पड़ोस की काकी को यह भरोसा दिलाना पड़ता है कि तुम सच में “बांग्लार मानुष” हो। 


ये चुनाव है या फिश फेस्टिवल

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुद्दे कम और मछलियाँ ज़्यादा तैर रही थी। चुनावी सभाओं में अब रोजगार, शिक्षा और सड़क से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि कौन कितनी मछली खाता है और किस भाव से खाता है। मानो विधानसभा नहीं, “राष्ट्रीय मत्स्य संसद” का चुनाव हो रहा हो। इसी बीच भाजपा सांसद रवि किशन ने बड़े प्रेम से जनता को आश्वस्त किया—4 मई के बाद चार गुना ज्यादा मछली खाइए, चिंता मत करिए! जनता भी सोच में पड़ गई कि ये चुनाव है या फिश फेस्टिवल का उद्घाटन? अब लोग राशन कार्ड नहीं, फिश कार्ड बनवाने की सोच रहे हैं।

टीएमसी ने भी शायद मन ही मन तय कर लिया होगा कि अगला घोषणा पत्र “मां, माटी, मानुष” नहीं, “माछ, भात, मतदान” पर बनेगा। उधर विपक्ष पूछ रहा है—सर, महंगाई? जवाब आता है—“पहले बताइए, हिलसा पसंद है या रोहू? बंगाल की राजनीति ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में मुद्दे तैरते रहते हैं—बस कभी-कभी वे पानी से निकलकर कड़ाही में पहुंच जाते हैं। जनता वोट डालेगी या कांटा, यह देखने लायक होगा।


महिला सशक्तिकरण का असली फॉर्मूला

राजनीति की विडंबना देखिए—जब ममता बनर्जी जैसी महिला नेता सत्ता में होती हैं, तो अचानक पूरा नैरेटिव बदल जाता है। तब महिला सशक्तिकरण घास छिलने चला जाता है, “पॉलिटिकल टारगेटिंग” शुरू हो जाती है। इस बार के चुनाव में ईडी से लेकर बाकी जांच एजेंसियां पश्चिम बंगाल में ऐसे दौड़ लगाई, जैसे चुनाव नहीं, वर्ल्ड कप का फाइनल चल रहा हो। 


छापेमारी की स्पीड देखकर लगता है कि देश की असली जीडीपी इसी के बूते मापी जानी चाहिए। जनता सोचती है—“यह चुनाव है या भारत पाकिस्तान युद्ध?” और सत्ता कहती है—“नहीं नहीं, यह तो सिर्फ पारदर्शिता है!” उधर आज्ञाकारी चुनाव आयोग के महारथी पहले ही मैदान सेट कर चुके होते हैं। नियम ऐसे लागू होते हैं जैसे किसी रियलिटी शो में जज पहले से विजेता तय कर चुके हों। 


महिला सशक्तिकरण का असली फॉर्मूला कुछ यूं है, पहले महिला को देवी बनाओ, फिर ऊंचे आसन पर बैठाओ, फिर कहो—“आप इतनी पवित्र हैं कि राजनीति की गंदगी में क्यों उतरेंगी?” और अगर कोई महिला खुद उतर जाए—तो फिर पूरा सिस्टम उसे याद दिलाता है कि “देवी का काम मंदिर में अच्छा लगता है, संसद विधानसभा में नहीं।” 




आजादी के बाद का सबसे शुद्ध प्रेम-प्रकरण है

अरे भाई, बंगाल में वोट पड़ रहे हैं तो बस सीएम पद का फैसला नहीं, सीधे दिल्ली का सिंहासन भी तय होना है! जीत गए तो मोदी जी के उत्तराधिकारी, हार गए तो... अरे, 2029 से पहले ही भाजपा को “रिटायरमेंट” का फॉर्म भरवा दिया जाएगा। ममता दीदी खड़ी हैं – एक तरफ हौसले का पहाड़, दूसरी तरफ “दुनिया का सबसे ईमानदार चुनाव आयोग”, जिसकी ईमानदारी देखकर ईवीएम भी शर्म से लाल हो जाता है। एक तरफ अपार धन, नफरत की फैक्ट्री और सिस्टम का पूरा रिमोट कंट्रोल। 


दूसरी तरफ– माँ काली के सच्चे भक्त, हाथ में त्रिशूल, मुंह में “अभी नहीं तो कभी नहीं” का मंत्र। दीदी का नारा है, “आओ, लड़ो, हारो, फिर भी हम जीतेंगे!” भाजपा का “कमल खिलाओ अभियान!” सचमुच, यह चुनाव आजादी के बाद का सबसे शुद्ध प्रेम-प्रकरण है – जहां एक तरफ बेशर्मी का बाजार गर्म है, दूसरी तरफ योद्धाओं का सैलाब। हार-जीत कुछ भी हो, एक बात पक्की, 2029 में अगर भाजपा बंगाल से बाहर हुई तो दिल्ली का ताज पर संकट गहरा सकता है। जय माँ काली! जय इलेक्शन कमीशन! दोनों की जय हो, बस थोड़ी-सी ईमानदारी मिल जाए तो काफी है।


अच्छे दिन आएंगे, बस तारीख कन्फर्म नहीं

देश में एक नया ट्रेंड चल पड़ा है—“बेचारा कौन?” प्रतियोगिता। बंगाल में चुनाव है। दावा किया जा रहा है कि बंगाल में हिंदू बेचारे हैं, तो कोई जवाब देता है कि पूरे देश में ही आम आदमी बेचारा है—धर्म बाद में, जेब पहले रोती है। बंगाल में अगर कोई कहे कि “मुसलमान फैल रहे हैं”, तो बाकी देश से आवाज आती है—“भाई, यहां तो महंगाई फैल रही है!” उधर कोई “दबंगई” का मुद्दा उठाए, तो इधर सिलेंडर के दाम इतने दबंग हो गए हैं कि रसोई में घुसते ही आम आदमी सलाम ठोक देता है। 


नौकरी का हाल ये है कि डिग्री दीवार पर टंगी है और आदमी खुद ठेके पर। 12 घंटे की ड्यूटी के बाद 10-12 हजार की सैलरी मिलती है, जैसे कोई लॉटरी लग गई हो। और फिर भी उम्मीद यही—“अच्छे दिन आएंगे”, बस तारीख कन्फर्म नहीं है। मजेदार बात ये है कि हर कोई “अपना-अपना दुख” लेकर बैठा है। बंगाल वाला कहता है, “हम पीड़ित हैं”, बाकी देश वाला कहता है, “भाई, लाइन में लगो।” असल सच्चाई ये है कि धर्म के नाम पर बहस करते-करते हम सबकी कॉमन प्रॉब्लम—महंगाई, बेरोजगारी और थकान—VIP एंट्री लेकर पीछे से निकल जाती है। और हम? अभी भी तय कर रहे हैं—“बेचारा आखिर है कौन?”









जैसे कोई हॉरर फिल्म चल रही हो

 विजय शंकर पांडेय 


वाराणसी में बिजली अब सिर्फ चमकती नहीं है, मौके बेमौके मजाक भी करती है। "अमर उजाला" की खबर पढ़कर लगा कि वाराणसी में बिजली का स्मार्ट मीटर नहीं, कोई स्टैंडअप कॉमेडियन अपनी कलाबाजी दिखा रहा है। 


यहां उपभोक्ता का बिल माइनस में चला जाए तो भी यूपीपीसीएल का मैसेज आता है—“समय से जमा नहीं किया तो कनेक्शन काट देंगे।” मतलब आप कंपनी को पैसा दे रहे हों या कंपनी आपको—डांट हमेशा आपके ही हिस्से में है!  


सोलर लगवाने वालों ने सोचा था कि सूरज से दोस्ती कर लेंगे, लेकिन यूपीपीसीएल ने बता दिया—“दोस्ती हमारी चलेगी, सूरज की नहीं।” सरप्लस बिजली ऐसे उठा ली, जैसे मोहल्ले का दबंग आपके घर की छत से पतंग भी बिना पूछे ले जाए, और बदले में दो रुपये थमा दे—“लो भाई, मेहनताना, झालमुड़ी भी दस के भाव है, कम से कम टॉफी ही खा लेना!” विडंबना यह है कि इसकी भनक तक नहीं लगने दी जाती उपभोक्ताओं को।


अब आप सोलर लगवाने का जो अपराध किए हैं, उसके एवज में बैंक का लोन भी चुकाइए और बिजली का बिल भी। 


ऊपर से पोस्टपेड से प्रीपेड का ऐसा परिवर्तन हुआ जैसे लोकतंत्र से सीधे “लॉटरी तंत्र” में एंट्री। आधी रात को SMS आता है—“रिचार्ज करो वरना अंधेरा कायम हो जाएगा!” आम आदमी घबराकर मोबाइल ढूंढता है, जैसे कोई हॉरर फिल्म चल रही हो। 


कुल मिलाकर वाराणसी में बिजली नहीं, किस्मत जल रही है—और बिल? वो तो बस कॉमेडी का पंचलाइन बन चुका है!


अंधेर नगरी में पहले तो एकमुश्त थोक के भाव में बिना किसी अनुमति के उपभोक्ताओं को पोस्टपेड से प्रीपेड में कन्वर्ट कर दिया गया। अब कहा जा रहा है कि प्री-पेड अनिवार्य नहीं है। अब इनमें जो प्रीपेड का सरदर्द नहीं पालना चाहते, वे कब पोस्टपेड में तब्दील होंगे? किसकी चिरौरी विनती करनी होगी?


पोस्टपेड इसलिए जरूरी है कि निर्धारित तिथि पर बिल जमा करने की सहूलियत रहे। प्रीपेड में चिरकूट की तरह कभी भी, यहां तक कि आधी रात गए भी एसएमएस टपक जाता है। 


बिजली विभाग बिल का प्रारूप ऐसा बनाया है‌ कि उसे पढ़ने समझने के लिए कोचिंग सेंटर ज्वाइन करना पड़ेगा।


आम लोग पाई पाई जोड़ कर किसी तरह जीवन गुजार रहे हैं। नेताओं और अफसरों की तरह उनकी आमदनी के कई स्रोत नहीं है।  


कुछ तो रहम कीजिए.....








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