ऊर्जा महंगी, रुपया ढीला, निवेश सुस्त और बाज़ार नर्वस

 व्यंग्य

बाकी दुनिया नई टेक्नोलॉजी बना रही, हम “जुगाड़ इनोवेशन” पर अटके हैं

विजय शंकर पांडेय


भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों ऐसे व्यवहार कर रही है, जैसे एग्ज़ाम से पहले वाला छात्र—किताब खुली है, पर ध्यान कहीं और है। भारत की हालत ये है कि हर नई रिपोर्ट में “संभावनाएं अपार हैं” लिखा होता है, और नीचे छोटे अक्षरों में “बस फिलहाल नहीं”। रुपया भी अमेरिका के डॉलर को देखकर ऐसे गिर रहा है जैसे कोई सेल में कीमत—“लो, और सस्ता!” बाजार में लोग पूछते हैं, “रुपया गिर क्यों रहा है?” जवाब आता है, “क्योंकि उसे ऊपर उठाने वाला कोई जिम ट्रेनर नहीं है।” सरकार कहती है—“सब कंट्रोल में है।” आम आदमी पूछता है—“किसके कंट्रोल में?” उधर महंगाई ऐसे बढ़ रही है जैसे रिश्तेदारों की सलाह—बिना मांगे और लगातार।

विशेषज्ञ टीवी पर ग्राफ दिखाते हैं, जिनमें लाइन नीचे जाती है और वे कहते हैं—“देखिए, ये एक ‘ट्रांजिशन फेज़’ है।” जनता समझती है—“मतलब अभी और नीचे जाना बाकी है।” असल समस्या ये है कि जड़ें कमजोर हैं, लेकिन हम पत्तों को पॉलिश करने में लगे हैं। पेड़ हिल रहा है, और हम कह रहे हैं—“देखो, हवा कितनी तेज़ है!” अर्थव्यवस्था का असली मंत्र अब यही है, “घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा”—बस कब होगा, ये किसी के सिलेबस में नहीं है।


हम ब्रेक का आनंद ले रहे हैं

देश की अर्थव्यवस्था इस वक्त ऐसी फिल्म बन चुकी है, जिसका ट्रेलर कुछ और दिखाता है और असली कहानी कुछ और निकलती है। ऊपर से बयान आता है—“चिंता की कोई बात नहीं।” नीचे वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट धीरे से कान में कहती है—“भाई, थोड़ा तो घबरा लो।” प्रधानमंत्री और मंत्रीगण ऐसे आत्मविश्वास से भरे हैं जैसे क्रिकेट मैच में टीम 200 रन से पीछे हो और कप्तान कहे—“अभी मैच हमारे कंट्रोल में है।” उधर अर्थव्यवस्था पवेलियन में बैठी पानी पी रही है और पूछ रही है—“मुझे कब बैटिंग का मौका मिलेगा?” वित्त मंत्रालय की मासिक समीक्षा रिपोर्ट ने तो जैसे सच्चाई का CCTV फुटेज जारी कर दिया। उसमें साफ लिखा है—आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ी हैं। लेकिन बयानबाज़ी का कमाल देखिए—इसे “धीमी” नहीं, “संतुलित गति” कहा जा रहा है। यानी गाड़ी खड़ी हो जाए, तो कहो—“हम ब्रेक का आनंद ले रहे हैं।”


पश्चिम एशिया में युद्ध का असर भी खूब है। तेल की कीमतें ऐसे उछल रही हैं जैसे उन्हें ओलंपिक में भेजा जाना हो। और भारत की हालत उस परिवार जैसी है, जिसका बजट पहले ही टाइट हो और गैस सिलेंडर अचानक VIP बन जाए। ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता ने सरकार को ऐसा उलझाया है जैसे मोबाइल में नेटवर्क न आए—आप बार-बार फोन उठाते हैं, लेकिन सिग्नल गायब। और इस बीच महंगाई ने अपनी एंट्री मार दी है—पूरी फिल्म की असली विलेन बनकर। खासकर खाद्य पदार्थों की कीमतें तो ऐसे बढ़ रही हैं जैसे सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स—रुकने का नाम ही नहीं। टमाटर अब सब्जी नहीं, स्टेटस सिंबल बन चुका है। लोग सलाद में डालने से पहले दो बार सोचते हैं—“खाएं या बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट कर दें?”


फिलहाल देश में सबसे स्थिर चीज़ अगर कोई है, तो वो है—आश्वासन

गरीब और मध्यम वर्ग की हालत सबसे दिलचस्प है। अमीर वर्ग कहता है—“थोड़ी महंगाई है, मैनेज कर लेंगे।” गरीब वर्ग कहता है—“थोड़ी नहीं, पूरी महंगाई है, कैसे मैनेज करें?” और मध्यम वर्ग… वो बस EMI और सब्जी के दाम के बीच संतुलन साधने में योगा कर रहा है। सरकार का कहना है—“हम स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।” जनता पूछती है—“नजर के साथ कुछ कार्रवाई भी है या सिर्फ देखना ही है?” जवाब में फिर वही भरोसा—“सब ठीक हो जाएगा।”


असल में, हमारी अर्थव्यवस्था अब उस छात्र की तरह हो गई है, जिसे हर बार कहा जाता है—“अगली बार बेहतर करेंगे।” और अगली बार फिर वही कहानी दोहराई जाती है। फिलहाल देश में सबसे स्थिर चीज़ अगर कोई है, तो वो है—आश्वासन। महंगाई बदलती रहती है, तेल के दाम बदलते रहते हैं, रिपोर्ट्स बदलती रहती हैं… लेकिन एक चीज़ नहीं बदलती—“चिंता की कोई बात नहीं।” और यही सुन-सुनकर अब जनता सोच रही है—“शायद असली चिंता यही है कि कोई चिंता की बात मान ही नहीं रहा।”


भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय ऐसी बहुमुखी प्रतिभा दिखा रही है कि हर दिशा में समस्या पैदा कर रही है—ऊर्जा महंगी, रुपया ढीला, निवेश सुस्त और बाज़ार नर्वस। यानी “ऑल-राउंडर परफॉर्मेंस”, बस दर्शक खुश नहीं हैं। ऊर्जा लागत बढ़ी तो महंगाई ने तुरंत मौका भांप लिया—जैसे किसी शादी में बिना बुलाए रिश्तेदार। पेट्रोल-डीजल के दाम ऐसे चढ़ते हैं, जैसे उन्हें लिफ्ट मिल गई हो, और नीचे उतरने का रास्ता भूल गए हों। आम आदमी सोचता है—“गाड़ी चलाऊं या EMI भरूं?” उधर व्यापार घाटा और चालू खाते का घाटा ऐसे बढ़ रहे हैं जैसे व्हाट्सऐप ग्रुप में “गुड मॉर्निंग” मैसेज—रोज़, लगातार और बिना पूछे। विदेशी निवेशक भी अब भारत को ऐसे देख रहे हैं जैसे कोई छात्र प्रैक्टिकल से पहले लैब—“जाएं या ना जाएं?”


आत्मविश्वास कम, पसीना ज्यादा

रुपया बेचारा डॉलर के सामने ऐसे खड़ा है जैसे बोर्ड एग्जाम में बिना पढ़े छात्र—आत्मविश्वास कम, पसीना ज्यादा। अमेरिका का डॉलर मुस्कुरा रहा है और रुपया धीरे-धीरे कह रहा है—“भाई, थोड़ा संभलकर… मैं पहले ही दबाव में हूं।” अब आते हैं असली ट्विस्ट पर—सरकार को ये सब पहले से पता है। वी. अनंत नागेश्वरन जैसे लोग लगातार चेतावनी दे रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025 में साफ कहा गया था कि वित्तीय क्षेत्र इतना तेज भाग रहा है कि असली अर्थव्यवस्था पीछे छूट रही है। यानी शेयर मार्केट पार्टी कर रहा है और असली कारोबार कोने में बैठा समोसा खा रहा है।


आईपीओ का हाल तो और दिलचस्प है। पहले कंपनियां पैसा जुटाने के लिए बाजार में आती थीं, अब कुछ मामलों में लगता है प्रमोटर कह रहे हैं—“भाई, हम निकल रहे हैं, तुम संभालो।” निवेशक सोचता है—“मैं निवेश कर रहा हूं या किसी और का एग्जिट प्लान फंड कर रहा हूं?” स्थिति ऐसी हो गई है कि हर समस्या दूसरी समस्या की दोस्त बन गई है। ऊर्जा महंगी हुई तो महंगाई बढ़ी, महंगाई बढ़ी तो खर्च घटा, खर्च घटा तो विकास धीमा, विकास धीमा तो निवेशक गायब—और फिर रुपया बोला, “अब मैं भी चलता हूं नीचे।”


सरकार का बयान अब भी वही है—“सब नियंत्रण में है।” लेकिन कंट्रोल इतना “माइक्रो” हो गया है कि आम आदमी को दिखाई ही नहीं दे रहा। असल में, हमारी अर्थव्यवस्था उस पुराने पंखे की तरह हो गई है—आवाज़ बहुत करता है, हवा कम देता है। और जब कोई पूछे कि “ठीक क्यों नहीं कराते?”, जवाब मिलता है—“चल तो रहा है ना!” अंत में सच्चाई यही है—जड़ कमजोर है, और ऊपर से आंधी तेज़। लेकिन हम अब भी पत्तों को पकड़कर समझ रहे हैं कि पेड़ मजबूत है। और जब अर्थशास्त्री चेतावनी देते हैं, तो हम कहते हैं—“भाई, थोड़ा पॉजिटिव सोचो!”

क्योंकि इस देश में सबसे मजबूत सेक्टर अगर कोई है, तो वो है—आशावाद। भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त एक ऐसे “जुगाड़ू महल” की तरह लग रही है, जिसे दूर से देखो तो ताजमहल, पास जाओ तो ईंटों के बीच से झांकती रेत। ऊपर से जीडीपी की चमक—नीचे से बुनियाद की खनक। सरकार कहती है—“हम दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं।” निजी क्षेत्र कहता है—“हाँ, लेकिन रिस्क आप लीजिए, हम तालियां बजाएंगे।” हाल ये है कि निवेश की बात आते ही उद्योगपति ऐसे पीछे हटते हैं जैसे स्कूल में टीचर पूछे—“कौन प्रेजेंटेशन देगा?”



आर्थिक सर्वेक्षण ने भी इशारों-इशारों में बता दिया—निजी क्षेत्र रिस्क लेने के मूड में नहीं है। यानी देश का बिजनेस क्लास अब “खतरा” शब्द को ऐसे देखता है जैसे कोई बिल्ली पानी को—दूर से ही नमस्ते! अनुसंधान और विकास की हालत तो और दिलचस्प है। बाकी दुनिया नई टेक्नोलॉजी बना रही है, और हम अभी भी “जुगाड़ इनोवेशन” पर अटके हैं—जैसे टूटी कुर्सी को ईंट से सपोर्ट देना और कहना—“देखो, इंडिजिनस टेक्नोलॉजी!”


ये इन्वेस्टमेंट है या किसी का ‘एग्जिट इंटरव्यू’?

आईपीओ का खेल भी अब थोड़ा फिल्मी हो गया है। पहले कंपनियां कहती थीं—“हम भविष्य बना रहे हैं, पैसा लगाइए।” अब कुछ जगहों पर मैसेज ऐसा लगता है—“हम अपना भविष्य बना चुके हैं, अब आप हमारा वर्तमान खरीद लीजिए।” निवेशक सोचता है—“ये इन्वेस्टमेंट है या किसी का ‘एग्जिट इंटरव्यू’?” और फिर आता है जीडीपी का जादू। हर बार आंकड़ा आता है और हम खुशी से कहते हैं—“देखो, कितनी तेज़ ग्रोथ है!” लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि ये ग्रोथ आई कहां से? क्योंकि अगर सवाल पूछ लिया, तो जवाब मिलेगा—“थोड़ा वित्तीय सेक्टर से, थोड़ा उम्मीदों से, और बाकी एक्सेल शीट से।”


असल में, हमने अर्थव्यवस्था के दो मजबूत खंभे बनाए—निजी क्षेत्र और वित्तीय सेक्टर। लेकिन दिक्कत ये है कि दोनों खंभे रेत पर खड़े हैं। निजी क्षेत्र रिस्क नहीं लेना चाहता और वित्तीय सेक्टर इतना तेज़ भाग रहा है कि असली अर्थव्यवस्था पीछे छूट गई है। अब जब वैश्विक परिस्थितियां खराब हुईं—ऊर्जा महंगी, निवेश धीमा, बाज़ार अस्थिर—तो ये खंभे डगमगाने लगे। जैसे तेज हवा में प्लास्टिक की कुर्सी—दिखती मजबूत है, पर भरोसा नहीं होता।


मासिक समीक्षा रिपोर्ट ने भी यही कहा—हालात थोड़े कठिन हैं। लेकिन सरकारी भाषा में “कठिन” का मतलब होता है—“थोड़ा ज्यादा ही कठिन।” जनता अब कंफ्यूज है—टीवी पर सुनती है “अर्थव्यवस्था मजबूत है”, बाजार में जाती है तो लगता है “जेब कमजोर है।” ये वही स्थिति है जैसे डॉक्टर कहे—“आप बिल्कुल फिट हैं”, और मरीज सीढ़ी चढ़ते ही हांफ जाए। अंत में सच्चाई सीधी है—हमने एक शानदार इमारत बनाई, लेकिन नींव पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अब जब मौसम खराब हुआ है, तो दीवारों में हल्की-हल्की दरारें दिखने लगी हैं। फिलहाल समाधान यही है—आंकड़ों की पेंटिंग थोड़ी और चमका दो, और जनता से कहो—“देखो, सब कुछ ठीक लग रहा है ना?” क्योंकि इस दौर में असली अर्थव्यवस्था से ज्यादा जरूरी है—उसका अच्छा दिखना।





बेहया बनाम वज्र बेहया

  विजय शंकर पांडेय 


एक होता है बेहया।

दूसरा होता है वज्र-बेहया।

पहला कभी-कभार शरमा जाता है।

दूसरा शर्म को सरकारी फाइल समझता है।

जिसे खोलना मना है।


बेहया गलती करे तो कान खुजाता है।

वज्र-बेहया गलती करे तो प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाता है।

कहता है—सब ठीक है।

गलती जनता की है।

समझने में चूक गई।


बेहया कुर्सी पाए तो थोड़ा संभलता है।

वज्र-बेहया कुर्सी पाए तो कुर्सी संभलती है।

डरती है।

कहीं ये बैठ न जाए।

और लकड़ी तक जल न जाए।


इनकी खासियत निराली है।

कीचड़ में कमल ढूंढ लेते हैं।

और कमल में भी कीचड़।

फिर गर्व से बताते हैं—

देखो, सफाई अभियान चल रहा है।


इनका आत्मविश्वास अद्भुत होता है।

तूफान आए तो कहते हैं—हमने बुलाया।

बारिश हो तो कहते हैं—हमारी योजना।

सूखा पड़े तो कहते हैं—जनता की साजिश।


ये हर मंच पर चमकते हैं।

माइक मिले तो इतिहास बदल देते हैं।

कैमरा मिले तो भूगोल।

और मौका मिले तो संविधान भी।


कुर्सी इनके लिए सेवा नहीं।

कुर्सी इनके लिए जिम है।

जहां वे रोज नैतिकता उठाते हैं।

और फर्श पर पटक देते हैं।


इनकी चमड़ी वैज्ञानिक चमत्कार है।

टिप्पणी पड़े तो फिसल जाती है।

आलोचना पड़े तो उछल जाती है।

जवाबदेही आए तो गायब हो जाती है।


बेहया कभी-कभी सोचता है—

“यार, लोग क्या कहेंगे?”

वज्र-बेहया सोचता है—

“लोग कुछ भी कहें,

कुर्सी क्या कहेगी?”


और कुर्सी बेचारा क्या कहे।

वह लकड़ी है।

चुप रहती है।

मगर इतिहास गवाही देता है—

कई बार कुर्सी छोटी नहीं होती।

बैठने वाला बड़ा बेहया निकल आता है।


इसलिए राजनीति का नया सिद्धांत बना है।

योग्यता बाद में।

बेशर्मी पहले।

जो जितना वज्र-बेहया,

उसकी कुर्सी उतनी स्थायी।





जनता देखती है।

हंसती है।

कभी-कभी रो भी लेती है।

फिर चुनाव आता है।

और कहानी फिर से शुरू हो जाती है।


#AprilFoolsDay

सपने छुट्टी पर हैं

 

विजय शंकर पांडेय 


युद्ध शुरू होता है।

पहले बयान आता है।

फिर चेतावनी।

फिर आखिरी चेतावनी।

और फिर… वही पुरानी कहानी।


नेता कहते हैं—रणनीति जरूरी है।

जनता पूछती है—रोटी भी?

जवाब आता है—वो अगली मीटिंग में।


टीवी पर नक्शे चमकते हैं।

लाल तीर दौड़ते हैं।

स्टूडियो में जीत तय हो जाती है।

मैदान में इंसान हार जाता है।


बच्चा लाइन में खड़ा है।

हाथ में कटोरा है।

आंखों में सवाल है।

पर जवाब… कहीं और व्यस्त है।


स्कूल खामोश है।

ब्लैकबोर्ड खाली है।

चॉक घिस चुकी है।

सपने छुट्टी पर हैं।


अस्पताल भरा है।

दवा आधी है।

दर्द पूरा है।

और बजट… भाषण में है।


हर मौत एक आंकड़ा बनती है।

फाइल में फिट हो जाती है।

पर घर में जो सन्नाटा है—

उसका कोई कॉलम नहीं होता।


फिर घोषणा होती है—पुनर्निर्माण!

ताली बजती है।

ठेके निकलते हैं।

और मलबा “मौका” बन जाता है।

आपदा में अवसर।


युद्ध खत्म नहीं होता।

बस नाम बदलता है।

कभी ऑपरेशन।

कभी मिशन।

कभी “शांति प्रक्रिया”।



और इंसान?

वो हर बार वही रहता है—

टूटता हुआ।

छूटता हुआ।

और… भूलता हुआ।


क्योंकि अगला युद्ध

बस अगली हेडलाइन दूर है।

चुप्पियों को प्रतिकार में परिवर्तित करने की प्रत्याशा

सत्यकेतु के कविता संग्रह #एक_कर्मचारी_की_डायरी' पर एक नजर




विजय शंकर पांडेय


बरबस बशीर बद्र की यह पंक्तियां याद आ रही हैं, 'अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना, हर इक दरिया हज़ारों साल का अफ़्साना लिखता है।' वरिष्ठ पत्रकार, नाटककार और कहानीकार सत्यकेतु की न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से सद्य प्रकाशित कविता संग्रह "एक कर्मचारी की डायरी" इस लिहाज से उम्मीदों पर बिल्कुल खरा उतरती है। कॉरपोरेटी पद्धति मनुष्य की रचनात्मकता की हत्या कर देती है, मगर कवि ने तमाम जद्दोजहद के बावजूद अपने कवित्व को न सिर्फ बचाए रखा, बल्कि वक्त के साथ उसे मांज कर, तराश कर और पैना कर दिया। इस संग्रह की ज्यादातर कविताओं में वे मौजूदा दौर की विसंगतियों से सीधे लोहा लेते नजर आए। वह भी तब जब रोजमर्रा के जीवन में आदमी स्वार्थ, सुविधावाद और व्यक्तिवादिता के आगोश में सिर्फ अपना घोसला तलाशता नजर आ रहा है। तथाकथित आधुनिकतावादी जीवनशैली ने बनी बनाई तमाम परिभाषाओं को तितर बितर कर दिया है। विश्वभर में जब मानवीय उदात्तताएं हाशिए पर जा रही हैं, सत्यकेतु अपने कवि होने की संवेदनशीलता को बेलाग लपेट बखूबी दर्ज करते नजर आए। मसलन – 

दफ़्तर मेरे घर तक पहुंच गया है

उन्होंने दफ़्तर को

मेरे घर में घुसा दिया है

दफ़्तर की छोटी से छोटी बात

दूर करती है मुझे मेरे घर से

बात-बात पर बुला लिया जाता है दफ़्तर

टाइम-बे-टाइम

डिवोशन, लेबर, लॉयल्टी, नमक...

वगैरह की दी जाती है दुहाई

बल्कि होती है वह अपने तईं मुक़म्मल धमकी

कि ऐसा नहीं तो बाहर का दरवाजा खुला है


मानव संघर्ष के साथ रिश्तों का ताना-बाना बुनती नजर आई कविताएं


पुस्तक में करीब 56 कविताएं हैं। हर कविता की तासीर रोजमर्रा के मानव संघर्ष, शोषण, पीड़ा, खुशी, दु:ख, बाजारवाद, पर्यावरणीय व सामाजिक चिंताओं के साथ रिश्तों का ताना-बाना बुनती नजर आई। साथ ही ये कविताएं जीवन की विडम्बनाओं को सहेजे संभाले पाठक को अपने साथ लिए सफर तय करती हैं। कुछ इस तरह कि पाठक इस संग्रह की कविताओं में स्वयं को अभिव्यक्त करता महसूस करने लगता है। शायद यही इस संग्रह और रचनाकार की थाती है। स्वयं कवि अपने अंदाज में कविता को परिभाषित भी करता है। 

कविता

मनुष्यता के पाहन को पिघलाने की क्षमता है

कविता

चुप्पियों को प्रतिकार में परिवर्तित करने की प्रत्याशा है

कविता

क़यामत के क़हर को बेअसर करने की आख़िरी भाषा है।


ख़ामोश लब के बावजूद अपनी नज़र से गुफ़्तगू करते नज़र आए


ख्यातिलब्ध कवि केदारनाथ सिंह की मानें तो ‘कविता को सही बल और ठहराव देकर पढ़ा जाए तो वो अपना अर्थ खोल देती है।’ बतौर पत्रकार या कर्मचारी सत्यकेतु एक अरसे तक न सिर्फ मेरे सहयात्री, बल्कि पड़ोसी भी रहे हैं। जाहिर है एक दूसरे की दाल में पड़ने वाले नमक ही नहीं, बल्कि तमाम सुख-दुख और जद्दोजहद में भी काफी हद तक हम साझेदार रहे हैं। सत्यकेतु अक्सर ख़ामोश लब के बावजूद अपनी नज़र से गुफ़्तगू करते नज़र आए। अपने मिज़ाज के मुताबिक ही वे जितना बोलते नहीं, उससे अधिक बयान करते नज़र आए अपनी कविताओं में। अपनी कविताओं के जरिए वे यह अहसास कराने से चूके नहीं कि उनके अंदर बहुत कुछ उमड़-घुमड़ चल रहा है और इसी ने उन्हें कवि बनाया होगा। सत्यकेतु के ही शब्दों में –

 मेरी चुप्पी को भी

क़रीबी/खून के लोग

घुन्नापन, घमंड, अभिमान

और न जाने किन-किन विशेषणों से

आभूषित करते हैं

उन्हें इस बात का दुख

कि नहीं मानता मैं उनका मशवरा यथावत

नहीं सुनता उन्हें शब्दश:

नहीं रहता उनके कहे में जस का तस



मुश्किल दौर से जूझ रही दुनिया को धैर्य बनाए रखने का हौसला


कवि की मौजूदा कर्मभूमि प्रयागराज देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शहर इलाहाबाद का ही टटका नाम है। नेहरू की मानें तो “मुश्किल समय में भी मनुष्य को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। अच्छी किताबें पढ़ने से धैर्य बना रहता है।“ इस काव्यसंग्रह के जरिए कवि मुश्किल दौर से जूझ रही दुनिया को धैर्य बनाए रखने का हौसला देते हैं। लोकतंत्र के अमृतकाल में आप चाहे रूदाली कीजिए या फिर इतराइए, मगर सच तो यही है कि पूरी दुनिया में लोकतंत्र ही नहीं, लोगों का निजत्व, रिश्ते और संबंध तक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। “रिश्ते” शीर्षक कविता में कवि ने इस पीड़ा को बखूबी बयान किया है। 


खूंटी पर टंगे वस्त्र नहीं होते रिश्ते

न ही छींके पर रखे असबाब की तरह

इस प्रकार सुलभ

कि जब चाहा इस्तेमाल किया

माफ़िक़ न हुआ तो मन से उतार दिया

ज़रूरत की ज़मीन पर उगी फसल नहीं होते रिश्ते

कि काट काटकर बोरियां भरते रहा जाए

न ही सांसें अटका देने वाली अपेक्षाओं की तरह

इतने बेमुरव्वत

कि फांस बनकर गले में अटक जाए

निर्वाह की स्वाभाविकता भी खो जाए


तंत्र तो उत्सव में लीन होता है, मगर लोक ‘सलीब’ पर टंग जाता है


ठीक इसी तरह सिर्फ चुनाव होना ही लोकतंत्र की गारंटी नहीं हैं। घोषित तानाशाह भी उस वैधता की लालसा रखता है, जो आधुनिक युग में, केवल मतपेटी या ईवीएम द्वारा ही प्रदान की जा सकती है। जीत का अंतर डराने-धमकाने के एक और हथियार के रूप में दोगुना असर डालता है। साथ ही यह भी सच है कि चुनाव के बिना लोकतंत्र का अस्तित्व नहीं है। साल 2024 में, भारत समेत दुनिया की आधी से अधिक आबादी अपनी अपनी सरकार चुनेगी। कहने को तो आम चुनाव लोकतंत्र का महापर्व है। मगर यह कैसा महापर्व है, जिसमें तंत्र तो उत्सव में लीन होता है, मगर लोक ‘सलीब’ पर टंग जाता है। ऐसे संकट के दौर में कवि करोड़ों बेजुबानों के “हूक” को स्वर देता है और पूछ बैठता है-  

यह देश किसका है?

जो सुविधाओं का निर्माण कर

दर-ब-दर भटक रहे हैं

उनका..?

या

जो सारी सुविधाओं पर

कुंडली मारकर बैठे हैं

उनका..?

बोल बंधु यह देश किसका है?

 

कवि इस सोकॉल्ड विकास के चरम उत्कर्ष से बेखबर नहीं हैं


कमोवेश पूरी दुनिया में आज पूंजीवाद से उपजे तानाशाहों या फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था में निरंकुश शासकों का वर्चस्व बढ़ रहा है| जाहिर है कवि इस सोकॉल्ड विकास के चरम उत्कर्ष से बेखबर नहीं हैं। वह अपनी देखी, समझी हुई उस सामाजिक समझ के बूते ही “वीणा के तार छेड़ो” शीर्षक कविता में आह्वान करता है कि 

 

अपनी 

दुनिया को नर्क बना रहे पागलों को

उनके हाल पर छोड़ दो

बकने दो

हंसने दो

चीखने दो

उनकी देह से शेर की खाल

जल्द ही उतर जाएगी।


इसी तरह “ग़लती” शीर्षक कविता में कवि कहता है कि 

उसकी ग़लती उतनी नहीं थी

जितनी उसे सच्चा समझने वालों ने की थी

ग़लीज़ परंपरा से उसका लगाव

जगजाहिर था

आधुनिकता के प्रखर प्रतिमानों से तरन्नुम भरा बैर

उसके हर वचन

हर चाल से छलकता था

पीछे मुड़कर

आगे दौड़ने के अपने बखूबी अभ्यास से

उसने क़बीले को चमत्कृत कर रखा था


हर उस सवाल को बचाए रखने की जद्दोजहद जिनके गुम होने की आशंका है


इस संग्रह की कविताओं में आम लोगों के जीवन का अर्थ भी घनीभूत है। उनकी कविताएं मन मसोस कर ही सही, हर उस सवाल को बचाए रखने की जद्दोजहद करती नजर आती हैं, जिनके इस संवेदनहीन दौर में, वक़्त की धुंध में, कहीं गुम होने की आशंका है। वे अपनी धरती, अपनी थाती, अपनी विरासत या फिर यूं कहें कि मनुष्य जीवन, प्रकृति या सब कुछ के होने को खोने से ऐसे ही बचाए रखना चाहते हैं। मसलन "आप.... बुद्ध हैं न!" शीर्षक कविता में कवि की बेचैनी बहुत कुछ बयां करती है --


सुनिए...

आप...बुद्ध हैं न!

हमें आपसे बहुत प्यार है

पर कैसे स्वागत करूं आपका

यहां कदम कदम पर पहरा

वाणी पर आघात है गहरा

कैसे कहूं...

उदयन की नेकी को चीथ रहा है अंधकाल

प्रसेनजित की गद्दी पर क़ाबिज़ है अंगुलीमाल।


मगर पृथ्वी जैसा कोई नहीं होता है


हमारी यह दुनिया लगभग साढ़े चार अरब साल पुरानी है और आधुनिक मानवों के इस धरती पर आए लगभग दो से तीन लाख वर्ष हो गए हैं। जाहिर सी बात है कि इस लंबे अंतराल में कई परिवर्तन आए होंगे। मनुष्य का अस्तित्व जब से इस पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ है, प्रकृति ने सहचरी की भांति उसका साथ निभाया है। उसने मनुष्य की हर सुख-सुविधा का ख्याल रखा है और उसके अस्तित्व को पृथ्वी पर पनपने के लिए सभी साधन दिए हैं। "सौंदर्य" शीर्षक कविता में कवि कहता है कि 


जीवन की आस में

सैकड़ों ग्रह ढूंढ निकाले

एक एक कर

सौर परिवार से बाहर

मगर पृथ्वी जैसा कोई नहीं होता है


समकालीन जीवन अनुभव व काव्यगत संवेदना के साथ विशिष्ट रंगरूप


इस संग्रह की कविताएँ समकालीन जीवन अनुभव व काव्यगत संवेदना के साथ विशिष्ट रंगरूप में अभिव्यक्त हुई हैं। यहां दुनिया भर का दुःख-दर्द, संघर्ष और यथार्थ के मूलभूत अंतर्विरोधों और शाश्वत प्रेम का सौहार्द मौजूद है। “उम्मीद” शीर्षक कविता में कवि कहता है - 


सांझ बिताकर

रात में तारे कौन गिनता है?

जो राहत की छत पर लेटा हो

या जो उम्मीद भरी सुबह की प्रतीक्षा में हो


कुछ साल पहले राजधानी दिल्ली में 'लड़कियों के ख्वाब' विषय पर आयोजित एक गोष्ठी में शामिल तीन महिला लेखकों ने स्वीकार किया था कि लड़कियों को ख्वाब देखने के ज्यादा मौके तो नहीं मिलते हैं। लड़कियों को पहले से तैयार किए ख्वाब ही देखने की इजाजत होती है। 'लड़की' शीर्षक कविता में कवि ने स्त्री-पीड़ा के कई अविस्मरणीय चित्रों को बखूबी उकेरा है-  


लड़की और नसीहत साथ-साथ पैदा होती हैं

ओंकार के रास्ते पर पत्थर रख

लड़की अपने लिए नकार लेकर आती है

उसका असली दोस्त उसके आंसू होते हैं

जो आमरण साथ निभाते हैं

उसे घड़ी-घड़ी दी जाती है

पिता की पगड़ी की दुहाई

मां की ममता की क़सम

भाई के भविष्य का वास्ता


इसके अलावा हमारी टूटती सांसें लौटा दो, कमाल है..कुछ भी कमाल नहीं, ख़तरे का संकेत, बादशाहत ख़तरे में है, संकट आया तो सब नंगे हो गए, पैदल टैक्स और आख़िरी रोटियां आदि शीर्षक कविताएं कवि के सचेत संवेदनशील मनुष्य होने की तस्दीक बखूबी करती हैं।


#पुस्तक_समीक्षा

साभार : #नेशनल_व्हील्स #प्रयागराज और pratibimbmedia.com चंडीगढ़