कसाई का "धर्म"

 

विजय शंकर पांडेय 



बकरी गुर्राई।

कसाई मुस्कराया।

चाकू चमका।

कसाई का "धर्म" टस से मस न हुआ।


बकरी बोली—“अन्याय!”

कसाई बोला—“आदेश।”

बकरी मिमियाई।

सत्ता ने कान बंद कर लिया।


यहाँ गुर्राहट से इतिहास नहीं बदलता।

यहाँ खून से सिर्फ फाइलें लाल होती हैं।

विचार नहीं।


सत्ता बड़ा मोह है।

इत्र जैसा।

जितना लगाओ, उतना चिपकता है।


कुर्सी पर बैठते ही

रीढ़ फोल्डिंग हो जाती है।

ज़मीर साइलेंट मोड में।


कल जो भाषण दे रहा था,

आज वही थाली पकड़े खड़ा है।

नमक वही।

स्वाद बदला हुआ।


कसाई कहता है—

“मैं मजबूर हूँ।”

बकरी कहती है—

“मैं बेबस हूँ।”


मजबूरी को नीति बना दिया गया।

बेबस को खबर।


गुर्राने से क्रांति नहीं आती।

तालियों से तानाशाही जाती नहीं।


यहाँ धर्म बदलते हैं पोस्टर में।

नीतियाँ बदलती हैं मौसम में।

और आदमी बदलता है

सत्ता के आईने में।


बकरी फिर गुर्राई।

कसाई फिर हँसा।

चाकू फिर चला।


क्यों

कि

सत्ता का मोह है।

कोई छोह नहीं।

जो बाज आ जाए।


लोकतांत्रिक हवा

 

विजय शंकर पांडेय 


दिल्ली की हवा अब हवा नहीं रही।

वो एक सरकारी फाइल है।

जिसमें हर सांस की एंट्री है।


सुबह उठते ही योग नहीं होता।

पहले एक्चेयूआई चेक होता है।

“आज जिंदा रहने की संभावना कितनी है?”


यहां लोग छाता नहीं,

मास्क लेकर निकलते हैं।

धूप से नहीं,

हवा से बचने के लिए।


दिल्ली की हवा लोकतांत्रिक है।

अमीर-गरीब में भेद नहीं करती।

सबको बराबर खांसने का हक देती है।


यहां सांस लेना भी

लक्ज़री हो गया है।

एसी के साथ।

हेपा फ़िल्टर के साथ।

और ईएमआई के साथ।


बच्चे ड्रॉइंग में

पेड़ नहीं बनाते।

चिमनी बनाते हैं।

उसे “विकास” कहते हैं।


डॉक्टर अब नाड़ी नहीं देखते।

एक्यूआई देखते हैं।

फिर कहते हैं—

“दिल्ली छोड़ दीजिए।”


सरकारें समाधान नहीं देतीं।

वे कैलेंडर देती हैं।

आज ऑड-ईवन।

कल सम-विषम।

परसों बहाना।


पराली हर साल जलती है।

जिम्मेदारी हर साल उड़ जाती है।

ठीक उसी हवा में।


यहां सांस लेना

एक राजनीतिक बयान है।

और खांसना

एक जन आंदोलन।


दिल्ली की हवा

इतनी जहरीली है कि

अब ज़हर भी शर्मिंदा है।


यह हवा

धीरे-धीरे नहीं मारती।

बस रोज़ याद दिलाती है—

“आज भी बच गए।”


कहते हैं—

ज़िंदगी चार सांसों की होती है।

दिल्ली में दो पहले ही

हवा ले जाती है।


बाकी दो

आप अस्पताल में ढूंढते हैं।

मगर सपने नए होते हैं


विजय शंकर पांडेय 


पिता की कमीज़ पुरानी होती है,

मगर सपने नए होते हैं।

हमारे लिए।


कमीज़ के बटन ढीले होते हैं।

जिम्मेदारियाँ टाइट।


कॉलर घिसा होता है।

हौसला चमकदार।


वो फैशन नहीं देखते।

फीस देखते हैं।

ट्रेंड नहीं पूछते।

इंतजाम सब करते हैं।


पिता सैलरी स्लिप नहीं,

संघर्ष की पर्ची होते हैं।


सुबह अलार्म से पहले उठते हैं।

रात चिंता के बाद सोते हैं।

बीच में

पूरी ज़िंदगी काम पर रहते हैं।


उनकी जेब में

हमारा भविष्य रहता है।

खुद के सपने

काग़ज़ की तरह मुड़े रहते हैं।


नई कमीज़ मिलती है

तो शादी में।

या फिर

किसी खास मौके पर।


पिता “थक गया हूं”

कभी नहीं कहते।

बस कुर्सी पर

चुपचाप बैठ जाते हैं।


बच्चे पूछें—

पापा, सब ठीक है?

तो जवाब आता है—

हाँ, सब बढ़िया है।

बस आवाज़

थोड़ी भारी होती है।


मोबाइल पुराना।

चार्जर ढीला।

पर हौसले की बैटरी

फुल रहती है।


उनका हास्य सादा होता है।

मजाक कम।

जिम्मेदारी ज़्यादा।


आज बच्चे ब्रांड पहनते हैं।

पिता भरोसा पहनते हैं।


और जब हम उड़ना सीखते हैं,

पिता जमीन बन जाते हैं।


कमीज़ और पुरानी हो जाती है।

पर सपने

और नए।


हमारे लिए।


बच्चे का एक सवाल

 विजय शंकर पांडेय 


दुनिया का सबसे ताकतवर देश  

ड्रोन उड़ाता है, 

तो आतंकवादी काँप जातें हैं।  


पर बच्चे के घर लौटते ही  

लाचार पिता काँप जाता है।  


स्कूल से लौटा बेटा पूछता है—  

"पापा, क्या हुआ?"  


पापा घबराते हैं—  

"बेटा… कुछ नहीं।"  


बेटा सहमें हुए पूछता है—  

"वे ड्रोन से मार देंगे न हमें?"  


पापा पसीना-पसीना  

"नहीं-नहीं… होमवर्क करो पहले!"  


वो देश जहाँ  

मिसाइल से दुश्मन खत्म  

टैक्स से नागरिक खत्म  

और नन्हे बच्चे के एक सवाल से  

पूरा पेंटागन हिल जाता है।  


मिनेसोटा का बूढ़ा अंकल हँसता है  

"तुम लोग दुनिया जीत रहे हो  

पर मेरे तालाब में  

एक भी मछली नहीं पकड़ पाते!"  


क्यों?

क्योंकि केंचुआ डालना भूल जाते हो!


तो सुन लो सुपरपावर का राज  

बाहर ड्रोन, अंदर डर  

दुनिया पर राज, 

मगर घर में ही हार  

मछली चाहिए?  

नन्हा केंचुआ डालो यार।  



जय हो उस महान राष्ट्र की  

जहाँ सबसे बड़ा हथियार  

ड्रोन नहीं—  

बच्चे का एक सवाल होता है  

और सबसे कारगर चारा  

नन्हा-सा केंचुआ।  




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