दुर्गा पूजा में अंजलि दोगे या सिर्फ सेल्फी लोगे?
विजय शंकर पांडेय
बंगाल में सिर्फ़ गला फाड़ने से काम नहीं चलता—यहाँ दिमाग भी साथ लाना पड़ता है। बंगाल चुनाव आते ही बाहरी नेताओं को अचानक लगता है कि हुगली के किनारे भी वही फार्मूला चलेगा, जो साबरमती के किनारे चला था। बस माइक उठाओ, आवाज़ दो डेसिबल और बढ़ाओ, दो-चार तुकबंदी वाली बजबजाते जुमले फेंको और समझ लो जनता “वाह साहब! क्या मास्टर स्ट्रोक है” कहकर वोट डालने दौड़ पड़ेगी।
उन्हें लगता है कि बंगाल भी कोई विशाल व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का एक्सटेंशन सेंटर है, जहाँ जितनी ज़ोर से बोलो, उतनी जल्दी सत्य प्रमाणित हो जाता है। लेकिन बंगाल बेचारा हर बार चश्मा ठीक करते हुए पूछता है—“भाषण खत्म हुआ? अब कुछ विचार भी हैं, या सिर्फ़ वॉल्यूम ही लाए हैं?”
यह वही बंगाल है जहाँ चैतन्य ने भक्ति दी, रवींद्रनाथ ने कविता दी, नज़रुल ने विद्रोह दिया, और विवेकानंद ने विचार दिया। वहाँ अगर आप टपोरी स्टाइल में “करारा हमला” बेचने आएँगे, तो जनता उसे भाषण नहीं, लोकल ट्रेन का झगड़ा समझेगी। नोएडा मीडिया उधर स्टूडियो में चिल्लाता है—“क्या मास्टरस्ट्रोक है!” और बंगाल इधर चाय की चुस्की लेकर कहता है—“भाई, यह स्ट्रोक कम, शोर ज़्यादा लग रहा है।”
पहले संस्कृति से एनओसी लेनी पड़ती है
बाकी भारत में नेता जनता से वोट मांगते हैं, बंगाल में पहले संस्कृति से एनओसी लेनी पड़ती है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में इस बार विकास, रोजगार और सड़क-पानी जैसे मुद्दे कम ही चर्चा में आए। हां, आप कितने छटाक बंगाली हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढते ज्यादातर भाजपा नेता नजर आए।
इससे पहले कांग्रेस हो, वामपंथी हो या फिर कांग्रेस से ही निकला तृणमूल हो, कभी इस तरह की अग्निपरीक्षा से किसी को नहीं गुजरना पड़ा। भाजपा नेता मंच पर पहुंचते ही पहले भाषण नहीं, पहचान पत्र निकालते दिख रहे हैं—देखिए, हमने भी आज माछ-भात खाया है, रसोगोल्ला भी बिना चम्मच के खाया है, और कोलकाता’ को ‘कलकत्ता’ नहीं बोलते!
मुख्यमंत्री पद का चेहरा पूछो तो जवाब आता है—चेहरा पूरी तरह बंगाली होगा, बस अभी वॉशिंग मशीन में है, निकलते ही दिखा देंगे। उधर विरोधी पूछ रहे हैं—दुर्गा पूजा में अंजलि दोगे या सिर्फ सेल्फी लोगे? भाषा पर हालत यह है कि हर नेता “आमार सोनार बांग्ला” बोलते-बोलते “वंदे मातरम्” पर सुरक्षित लैंडिंग कर रहा है। धोती-कुर्ता पहनकर फोटोशूट हो रहे हैं, लेकिन बैठते समय सबको डर—कहीं प्लीट्स से राष्ट्रवाद बाहर न गिर जाए। बंगाल ने साफ कर दिया है—यहां सिर्फ चुनाव जीतना काफी नहीं, पहले पड़ोस की काकी को यह भरोसा दिलाना पड़ता है कि तुम सच में “बांग्लार मानुष” हो।
ये चुनाव है या फिश फेस्टिवल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुद्दे कम और मछलियाँ ज़्यादा तैर रही थी। चुनावी सभाओं में अब रोजगार, शिक्षा और सड़क से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि कौन कितनी मछली खाता है और किस भाव से खाता है। मानो विधानसभा नहीं, “राष्ट्रीय मत्स्य संसद” का चुनाव हो रहा हो। इसी बीच भाजपा सांसद रवि किशन ने बड़े प्रेम से जनता को आश्वस्त किया—4 मई के बाद चार गुना ज्यादा मछली खाइए, चिंता मत करिए! जनता भी सोच में पड़ गई कि ये चुनाव है या फिश फेस्टिवल का उद्घाटन? अब लोग राशन कार्ड नहीं, फिश कार्ड बनवाने की सोच रहे हैं।
टीएमसी ने भी शायद मन ही मन तय कर लिया होगा कि अगला घोषणा पत्र “मां, माटी, मानुष” नहीं, “माछ, भात, मतदान” पर बनेगा। उधर विपक्ष पूछ रहा है—सर, महंगाई? जवाब आता है—“पहले बताइए, हिलसा पसंद है या रोहू? बंगाल की राजनीति ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में मुद्दे तैरते रहते हैं—बस कभी-कभी वे पानी से निकलकर कड़ाही में पहुंच जाते हैं। जनता वोट डालेगी या कांटा, यह देखने लायक होगा।
महिला सशक्तिकरण का असली फॉर्मूला
राजनीति की विडंबना देखिए—जब ममता बनर्जी जैसी महिला नेता सत्ता में होती हैं, तो अचानक पूरा नैरेटिव बदल जाता है। तब महिला सशक्तिकरण घास छिलने चला जाता है, “पॉलिटिकल टारगेटिंग” शुरू हो जाती है। इस बार के चुनाव में ईडी से लेकर बाकी जांच एजेंसियां पश्चिम बंगाल में ऐसे दौड़ लगाई, जैसे चुनाव नहीं, वर्ल्ड कप का फाइनल चल रहा हो।
छापेमारी की स्पीड देखकर लगता है कि देश की असली जीडीपी इसी के बूते मापी जानी चाहिए। जनता सोचती है—“यह चुनाव है या भारत पाकिस्तान युद्ध?” और सत्ता कहती है—“नहीं नहीं, यह तो सिर्फ पारदर्शिता है!” उधर आज्ञाकारी चुनाव आयोग के महारथी पहले ही मैदान सेट कर चुके होते हैं। नियम ऐसे लागू होते हैं जैसे किसी रियलिटी शो में जज पहले से विजेता तय कर चुके हों।
महिला सशक्तिकरण का असली फॉर्मूला कुछ यूं है, पहले महिला को देवी बनाओ, फिर ऊंचे आसन पर बैठाओ, फिर कहो—“आप इतनी पवित्र हैं कि राजनीति की गंदगी में क्यों उतरेंगी?” और अगर कोई महिला खुद उतर जाए—तो फिर पूरा सिस्टम उसे याद दिलाता है कि “देवी का काम मंदिर में अच्छा लगता है, संसद विधानसभा में नहीं।”
आजादी के बाद का सबसे शुद्ध प्रेम-प्रकरण है
अरे भाई, बंगाल में वोट पड़ रहे हैं तो बस सीएम पद का फैसला नहीं, सीधे दिल्ली का सिंहासन भी तय होना है! जीत गए तो मोदी जी के उत्तराधिकारी, हार गए तो... अरे, 2029 से पहले ही भाजपा को “रिटायरमेंट” का फॉर्म भरवा दिया जाएगा। ममता दीदी खड़ी हैं – एक तरफ हौसले का पहाड़, दूसरी तरफ “दुनिया का सबसे ईमानदार चुनाव आयोग”, जिसकी ईमानदारी देखकर ईवीएम भी शर्म से लाल हो जाता है। एक तरफ अपार धन, नफरत की फैक्ट्री और सिस्टम का पूरा रिमोट कंट्रोल।
दूसरी तरफ– माँ काली के सच्चे भक्त, हाथ में त्रिशूल, मुंह में “अभी नहीं तो कभी नहीं” का मंत्र। दीदी का नारा है, “आओ, लड़ो, हारो, फिर भी हम जीतेंगे!” भाजपा का “कमल खिलाओ अभियान!” सचमुच, यह चुनाव आजादी के बाद का सबसे शुद्ध प्रेम-प्रकरण है – जहां एक तरफ बेशर्मी का बाजार गर्म है, दूसरी तरफ योद्धाओं का सैलाब। हार-जीत कुछ भी हो, एक बात पक्की, 2029 में अगर भाजपा बंगाल से बाहर हुई तो दिल्ली का ताज पर संकट गहरा सकता है। जय माँ काली! जय इलेक्शन कमीशन! दोनों की जय हो, बस थोड़ी-सी ईमानदारी मिल जाए तो काफी है।
अच्छे दिन आएंगे, बस तारीख कन्फर्म नहीं
देश में एक नया ट्रेंड चल पड़ा है—“बेचारा कौन?” प्रतियोगिता। बंगाल में चुनाव है। दावा किया जा रहा है कि बंगाल में हिंदू बेचारे हैं, तो कोई जवाब देता है कि पूरे देश में ही आम आदमी बेचारा है—धर्म बाद में, जेब पहले रोती है। बंगाल में अगर कोई कहे कि “मुसलमान फैल रहे हैं”, तो बाकी देश से आवाज आती है—“भाई, यहां तो महंगाई फैल रही है!” उधर कोई “दबंगई” का मुद्दा उठाए, तो इधर सिलेंडर के दाम इतने दबंग हो गए हैं कि रसोई में घुसते ही आम आदमी सलाम ठोक देता है।
नौकरी का हाल ये है कि डिग्री दीवार पर टंगी है और आदमी खुद ठेके पर। 12 घंटे की ड्यूटी के बाद 10-12 हजार की सैलरी मिलती है, जैसे कोई लॉटरी लग गई हो। और फिर भी उम्मीद यही—“अच्छे दिन आएंगे”, बस तारीख कन्फर्म नहीं है। मजेदार बात ये है कि हर कोई “अपना-अपना दुख” लेकर बैठा है। बंगाल वाला कहता है, “हम पीड़ित हैं”, बाकी देश वाला कहता है, “भाई, लाइन में लगो।” असल सच्चाई ये है कि धर्म के नाम पर बहस करते-करते हम सबकी कॉमन प्रॉब्लम—महंगाई, बेरोजगारी और थकान—VIP एंट्री लेकर पीछे से निकल जाती है। और हम? अभी भी तय कर रहे हैं—“बेचारा आखिर है कौन?”




