लेखक चेक-आउट कर गया

विजय शंकर पांडेय 




शायद शंकर मुस्कुरा रहे होंगे—क्योंकि उनका ‘जनअरण्य’ अब भी हमारे आसपास है, और ‘चौरंगी’ की लिफ्ट अब भी ऊपर-नीचे जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि लेखक चेक-आउट कर गया, कहानी अभी भी कमरे में ठहरी है।



सच तो यह है कि क्लासिक उपन्यास 'चौरंगी' एक मरते हुए शहर को श्रद्धांजलि है। 1955 में उच्च न्यायालय के कामकाज पर आधारित थी, उनकी पहली पुस्तक ' कोतो अजानारे।' शंकर को उच्च न्यायालय में प्रवेश कलकत्ता के अंतिम अंग्रेज बैरिस्टर, नोएल फ्रेडरिक बारवेल के साथ एक 'संयोगवश मुलाकात' के माध्यम से मिला था, जिन्होंने उन्हें क्लर्क के रूप में नियुक्त किया था। इसकी सफलता के बाद मणि शंकर मुखर्जी उर्फ शंकर ने अपने दूसरे उपन्यास के लिए विषय-वस्तु की खोज शुरू की थी।


अपनी 60वीं वर्षगांठ मनाते हुए, 1950 के दशक में कलकत्ता के एक विशिष्ट होटल में घटित होने वाली घटनाओं पर आधारित यह क्लासिक उपन्यास एक मरते हुए शहर को श्रद्धांजलि थी।


बांग्ला साहित्य के 93 साल पुराने बरगद शंकर नहीं रहे। मणिशंकर मुखर्जी नाम था, पर पाठकों के दिल में वे सिर्फ “शंकर” थे—जैसे किसी पुराने होटल के रजिस्टर में दर्ज वह नाम, जिसे कोई काट नहीं पाता। 


#anandbazarpatrika के मुताबिक 93 वर्षीय अनुभवी लेखक को कई शारीरिक समस्याओं के चलते पंद्रह दिन पहले अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उस समय वे खाना-पीना बंद कर चुके थे। वे कोमा में थे। शुक्रवार को दोपहर लगभग पौने दो बजे उनका निधन हो गया।


‘चौरंगी’ लिखकर उन्होंने कोलकाता के चमचमाते होटल के झूमरों के नीचे छिपी उदासी दिखा दी थी। आज शायद, वही झूमर आधे झुके होंगे—क्योंकि जिसने उनकी रोशनी का राज खोला, वह चला गया। ‘सीमाबद्ध’ और ‘जनअरण्य’ पर सत्यजित राय ने फिल्में बनाईं, और हम दर्शकों ने समझा कि यह सिर्फ कहानी नहीं, आईना है—जिसमें सूट-बूट पहने महत्वाकांक्षा और जेब में रखी बेचैनी साफ दिखती है।


साहित्य अकादमी पुरस्कार ने उन्हें सम्मानित किया, लेकिन सच यह है कि उन्होंने हमारे समाज को बेनकाब करके पुरस्कृत किया। कॉर्पोरेट दफ्तरों की चाय, होटल की लॉबी, और महानगर की भागती सड़कों पर जो नैतिक दुविधाएँ घूमती थीं, उन्हें उन्होंने शब्द दे दिए।


अब जब वे नहीं हैं, तो शहर वही रहेगा—भीड़ भी, नौकरी भी, प्रमोशन की दौड़ भी। फर्क बस इतना होगा कि उन सबको खामोशी से पढ़ने वाली कलम थम गई है।


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कसाई का "धर्म"

 

विजय शंकर पांडेय 



बकरी गुर्राई।

कसाई मुस्कराया।

चाकू चमका।

कसाई का "धर्म" टस से मस न हुआ।


बकरी बोली—“अन्याय!”

कसाई बोला—“आदेश।”

बकरी मिमियाई।

सत्ता ने कान बंद कर लिया।


यहाँ गुर्राहट से इतिहास नहीं बदलता।

यहाँ खून से सिर्फ फाइलें लाल होती हैं।

विचार नहीं।


सत्ता बड़ा मोह है।

इत्र जैसा।

जितना लगाओ, उतना चिपकता है।


कुर्सी पर बैठते ही

रीढ़ फोल्डिंग हो जाती है।

ज़मीर साइलेंट मोड में।


कल जो भाषण दे रहा था,

आज वही थाली पकड़े खड़ा है।

नमक वही।

स्वाद बदला हुआ।


कसाई कहता है—

“मैं मजबूर हूँ।”

बकरी कहती है—

“मैं बेबस हूँ।”


मजबूरी को नीति बना दिया गया।

बेबस को खबर।


गुर्राने से क्रांति नहीं आती।

तालियों से तानाशाही जाती नहीं।


यहाँ धर्म बदलते हैं पोस्टर में।

नीतियाँ बदलती हैं मौसम में।

और आदमी बदलता है

सत्ता के आईने में।


बकरी फिर गुर्राई।

कसाई फिर हँसा।

चाकू फिर चला।


क्यों

कि

सत्ता का मोह है।

कोई छोह नहीं।

जो बाज आ जाए।


लोकतांत्रिक हवा

 

विजय शंकर पांडेय 


दिल्ली की हवा अब हवा नहीं रही।

वो एक सरकारी फाइल है।

जिसमें हर सांस की एंट्री है।


सुबह उठते ही योग नहीं होता।

पहले एक्चेयूआई चेक होता है।

“आज जिंदा रहने की संभावना कितनी है?”


यहां लोग छाता नहीं,

मास्क लेकर निकलते हैं।

धूप से नहीं,

हवा से बचने के लिए।


दिल्ली की हवा लोकतांत्रिक है।

अमीर-गरीब में भेद नहीं करती।

सबको बराबर खांसने का हक देती है।


यहां सांस लेना भी

लक्ज़री हो गया है।

एसी के साथ।

हेपा फ़िल्टर के साथ।

और ईएमआई के साथ।


बच्चे ड्रॉइंग में

पेड़ नहीं बनाते।

चिमनी बनाते हैं।

उसे “विकास” कहते हैं।


डॉक्टर अब नाड़ी नहीं देखते।

एक्यूआई देखते हैं।

फिर कहते हैं—

“दिल्ली छोड़ दीजिए।”


सरकारें समाधान नहीं देतीं।

वे कैलेंडर देती हैं।

आज ऑड-ईवन।

कल सम-विषम।

परसों बहाना।


पराली हर साल जलती है।

जिम्मेदारी हर साल उड़ जाती है।

ठीक उसी हवा में।


यहां सांस लेना

एक राजनीतिक बयान है।

और खांसना

एक जन आंदोलन।


दिल्ली की हवा

इतनी जहरीली है कि

अब ज़हर भी शर्मिंदा है।


यह हवा

धीरे-धीरे नहीं मारती।

बस रोज़ याद दिलाती है—

“आज भी बच गए।”


कहते हैं—

ज़िंदगी चार सांसों की होती है।

दिल्ली में दो पहले ही

हवा ले जाती है।


बाकी दो

आप अस्पताल में ढूंढते हैं।

मगर सपने नए होते हैं


विजय शंकर पांडेय 


पिता की कमीज़ पुरानी होती है,

मगर सपने नए होते हैं।

हमारे लिए।


कमीज़ के बटन ढीले होते हैं।

जिम्मेदारियाँ टाइट।


कॉलर घिसा होता है।

हौसला चमकदार।


वो फैशन नहीं देखते।

फीस देखते हैं।

ट्रेंड नहीं पूछते।

इंतजाम सब करते हैं।


पिता सैलरी स्लिप नहीं,

संघर्ष की पर्ची होते हैं।


सुबह अलार्म से पहले उठते हैं।

रात चिंता के बाद सोते हैं।

बीच में

पूरी ज़िंदगी काम पर रहते हैं।


उनकी जेब में

हमारा भविष्य रहता है।

खुद के सपने

काग़ज़ की तरह मुड़े रहते हैं।


नई कमीज़ मिलती है

तो शादी में।

या फिर

किसी खास मौके पर।


पिता “थक गया हूं”

कभी नहीं कहते।

बस कुर्सी पर

चुपचाप बैठ जाते हैं।


बच्चे पूछें—

पापा, सब ठीक है?

तो जवाब आता है—

हाँ, सब बढ़िया है।

बस आवाज़

थोड़ी भारी होती है।


मोबाइल पुराना।

चार्जर ढीला।

पर हौसले की बैटरी

फुल रहती है।


उनका हास्य सादा होता है।

मजाक कम।

जिम्मेदारी ज़्यादा।


आज बच्चे ब्रांड पहनते हैं।

पिता भरोसा पहनते हैं।


और जब हम उड़ना सीखते हैं,

पिता जमीन बन जाते हैं।


कमीज़ और पुरानी हो जाती है।

पर सपने

और नए।


हमारे लिए।