विजय शंकर पांडेय
शुक्र है कि जंतर मंतर का छात्र आंदोलन खत्म हो गया। सरकार ने शनिवार को सारी मांगें मान लीं, छात्र खुश होकर घर लौट गए, और देश फिर से उसी पुरानी आरामदायक स्थिति में आ गया—जहाँ हर कोई कहता है “हमें डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) का फायदा उठाना चाहिए”, लेकिन कोई नहीं बताता कि फायदा उठाने वाला कौन है और बर्बाद करने वाला कौन।
पहले समझ लो भाई, डेमोग्राफिक डिविडेंड क्या होता है। 15 से 64 साल की उम्र वाली आबादी को कामकाजी आबादी कहते हैं। ये लोग काम करते हैं, कमाते हैं, खर्च करते हैं, टैक्स देते हैं, और सरकार उस पैसे से सड़क, स्कूल, अस्पताल बनाती है। चीन, दक्षिण कोरिया, वियतनाम ने इसी डिविडेंड से अमीर बन गए। भारत में भी यही डिविडेंड है… बस थोड़ा सा फर्क है। हमारे यहाँ डिविडेंड को “डिविडेंड” नहीं, “डिविडेंड-भ्रष्ट” कहते हैं।
देखो न मजा, छात्रों ने आंदोलन किया।
मांग क्या थी? अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी, अच्छी जिंदगी। सरकार ने कहा—“मंजूर!” फिर छात्रों ने कहा—“ठीक है, हम घर जा रहे हैं।” और घर जाकर क्या किया? उसी व्हाट्स ऐप ग्रुप में बैठकर “सरकार ने फिर कुछ नहीं किया” वाला पोस्ट लिखा। डेमोग्राफिक डिविडेंड का सबसे बड़ा दुश्मन यही है—पोस्ट। पोस्ट लिखने में इतनी मेहनत लगती है कि असली काम करने का समय ही नहीं बचता।
चीन वालों ने डिविडेंड का फायदा कैसे उठाया? उन्होंने कारखाने बनाए, सड़कें बनाईं, बच्चों को गणित सिखाई। हमारे यहाँ क्या होता है? बच्चा 15 साल का हुआ, डिविडेंड चालू। 18 साल का हुआ, कॉलेज में एडमिशन के लिए कोटा-कोटा खेल। 22 साल का हुआ, बेरोजगारी भत्ता मांगने का आंदोलन। 25 साल का हुआ, “मुझे सरकारी नौकरी दो वरना मैं टिकट काट दूँगा” वाला धरना। 30 साल का हुआ, शादी, और डिविडेंड खत्म। 64 साल आने से पहले ही डिविडेंड रिटायर हो जाता है।
मजा और देखो। सरकार कहती है—“हम स्किल डेवलपमेंट कर रहे हैं।” स्किल डेवलपमेंट का मतलब है—तीन महीने का कोर्स, सर्टिफिकेट, और फिर “अरे भाई, ये सर्टिफिकेट तो कोई कंपनी नहीं मानती।” फिर वही छात्र वापस जंतर मंतर पहुँच जाता है। डेमोग्राफिक डिविडेंड का चक्र पूरा हो जाता है—जन्म, शिक्षा, आंदोलन, सर्टिफिकेट, फिर आंदोलन। चीन में डिविडेंड से जीडीपी बढ़ती है, भारत में डिविडेंड से “ट्रेंडिंग हैशटैग” बढ़ता है।
और सबसे बड़ी मजेदार बात—हर नेता भाषण देता है, “हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड विश्व का सबसे बड़ा खजाना है।” खजाना तो है, लेकिन खजाने की चाबी किसके पास है? चाबी तो उस मंत्रालय के पास है जहाँ फाइलें 15 साल से “अंडर प्रोसेस” हैं। फाइल भी डेमोग्राफिक डिविडेंड वाली उम्र में पहुँच चुकी है—15 से 64 साल की—लेकिन अभी तक “वर्क इन प्रोग्रेस” है।
अगर हमने इस डिविडेंड को सही से इस्तेमाल नहीं किया तो क्या होगा? भविष्य में जब चीन वाले मंगल पर कॉलोनी बना रहे होंगे, तब हम जंतर मंतर पर बैठकर मांग करेंगे—“हमें भी मंगल पर जाने का कोटा दो!” और सरकार मान लेगी। छात्र खुश होकर घर लौट जाएँगे। फिर अगले दिन नया आंदोलन शुरू हो जाएगा—“मंगल पर भी बेरोजगारी है!”
तो दोस्तों, डेमोग्राफिक डिविडेंड बर्बाद मत कीजिए। नहीं तो एक दिन डिविडेंड खुद आकर कहेगा—“भाई, मैं थक गया। अब मैं साउथ कोरिया चला गया। वहाँ कम से कम काम तो होता है।”
और तब हम सब मिलकर एक नया हैशटैग चलाएँगे—डेमोग्राफिक डिविडेंड वापस आओ।
डेमोग्राफिक डिविडेंड का 10 साल का काउंटडाउन शुरू… टिक-टिक-टिक!
भाई साहब, अभी भारत में हर 100 में से 67 लोग कामकाजी श्रेणी में हैं। 1960 में ये आँकड़ा 56 था। 2030 तक 69 हो जाएगा, फिर 2035 से नीचे गिरने लगेगा। यानी डेमोग्राफिक डिविडेंड का फायदा उठाने के लिए हमारे पास ठीक-ठीक 10 साल बचे हैं। 10 साल! इतने में कोई देश विकसित हो जाता है, और हम इतने में सिर्फ एक और पेपर लीक स्कैम का सीजन पूरा कर लेते हैं।
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट कहती है कि हर साल 50 लाख युवा ग्रेजुएट नौकरी के बाजार में कूदते हैं। इनमें से सैलरी वाली नौकरी सिर्फ 17 लाख को मिलती है। 11 लाख को कोई-न-कोई जुगाड़ वाला रोजगार मिल जाता है। बाकी? बाकी लोग “मैं भी ग्रेजुएट हूँ” वाला स्टेटस लगाकर बैठ जाते हैं। और जिन्हें नौकरी मिल भी जाती है, उनकी सैलरी बढ़ने का इंतजार उसी तरह होता है जैसे सरकारी फाइल का—सालों साल।
अब जंतर मंतर का आंदोलन याद कीजिए। छात्र चिल्ला रहे थे—पढ़ाई में गड़बड़ी, परीक्षा में लीक, नौकरी में लीक। सरकार ने मांगें मान लीं। छात्र घर लौट गए। लेकिन असली समस्या तो वही है—सबको सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। सरकारी नौकरी मिलना अब लगभग वैसा ही हो गया है जैसे लॉटरी। फर्क सिर्फ इतना है कि लॉटरी में कम से कम नंबर लीक नहीं होते।
डेमोग्राफिक डिविडेंड का सबसे बड़ा मजा यह है कि युवाओं को शिक्षा और रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार कहती है—“हम कर रहे हैं।” फिर बजट भाषण में स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया के नारे लगते हैं। नतीजा? युवा स्किल इंडिया, करके घर आते हैं और कहते हैं—“स्किल तो आ गया, अब जॉब कहाँ है?” डिजिटल इंडिया में सब कुछ डिजिटल हो गया—नौकरी की लिस्ट भी डिजिटल है, सिर्फ नौकरी असली नहीं है।
और सबसे खतरनाक बात—हम दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं, लेकिन प्रति व्यक्ति आय में लगभग 140वें नंबर पर हैं। यानी देश अमीर है, नागरिक गरीब। अगर इस डिविडेंड का फायदा नहीं उठाया तो भारत अमीर होने से पहले ही बूढ़ा हो जाएगा। कल्पना कीजिए—2035 के बाद जब कामकाजी आबादी घटने लगेगी, तब बुजुर्ग बैठकर कहेंगे, “अरे जब हम जवान थे तो डेमोग्राफिक डिविडेंड था… हमने उसे जंतर मंतर पर खर्च कर दिया।”
10 साल का समय है। चीन ने इसी समय में दुनिया बदल दी। हमने इसी समय में कितने पेपर लीक किए, कितने आंदोलन किए, कितने हैशटैग ट्रेंड करवाए—ये हिसाब लगाने में ही 8 साल निकल जाएँगे। बाकी 2 साल में कोई नया आयोग बनेगा, जो रिपोर्ट देगा कि “डेमोग्राफिक डिविडेंड बर्बाद हो गया है, अब क्या करें?”
तो युवाओं, जल्दी करो। पढ़ो, स्किल सीखो, नौकरी ढूँढो… नहीं तो एक दिन डिविडेंड खुद रिटायरमेंट ले लेगा और कहेगा—“भाई, मैंने तुम्हें 10 साल दिए थे। तुमने मुझसे जंतर मंतर करा लिया। अब मैं साउथ कोरिया चला गया। वहाँ कम से कम उम्र के साथ सैलरी भी बढ़ती है।”
और तब हम सब बुजुर्ग होकर एक नया नारा लगाएँगे—
“डेमोग्राफिक डिविडेंड लौटाओ… नहीं तो पेंशन दो!”
डेमोग्राफिक डिविडेंड का राजनीतिक पहलू: वोट बैंक का सबसे बड़ा ‘डिविडेंड’!
भाइयो-बहनों, डेमोग्राफिक डिविडेंड सिर्फ आबादी का खेल नहीं है। ये तो भारतीय राजनीति का सबसे स्वादिष्ट मेन्यू है। 67 प्रतिशत कामकाजी आबादी? वाह! ये तो तैयार-तैयार वोट बैंक है। 2030 तक 69 प्रतिशत? और भी बढ़िया। 10 साल का समय? बिल्कुल सही—दो-तीन चुनाव चक्र का समय। यानी डिविडेंड का असली फायदा देश को नहीं, पार्टियों को उठाना है।
देखो कैसे खेल चलता है। सत्ता में बैठे लोग भाषण देते हैं—“हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड विश्व का सबसे बड़ा खजाना है। हम स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया से इसे सोने में बदल देंगे।” विपक्ष तुरंत जवाब देता है—“खजाना तो है, लेकिन चाबी आपकी जेब में है और जॉब कहीं नहीं है। 50 लाख ग्रेजुएट आते हैं, 17 लाख को नौकरी मिलती है। बाकी को सिर्फ ‘आत्मनिर्भर’ बनने का सर्टिफिकेट मिलता है।” फिर दोनों तरफ से एक ही बात निकलती है—“हम युवाओं के साथ हैं।” युवा सुनकर ताली बजाते हैं, और अगले चुनाव में फिर वही वादा दोहराया जाता है।
जंतर मंतर का आंदोलन याद है? छात्र शिक्षा और परीक्षा लीक को लेकर सड़क पर थे। राजनीतिक दल तुरंत मैदान में कूद पड़े। कोई बोला—“ये तो व्यवस्था की नाकामी है।” कोई बोला—“पिछली सरकार ने बिगाड़ा था।” कोई बोला—“हम सत्ता में आए तो सब ठीक कर देंगे।” आंदोलन खत्म हुआ, छात्र घर गए, और डिविडेंड फिर से उसी पुरानी फाइल में वापस चला गया—‘अंडर कंसीडरेशन’। राजनीति में समस्या हल करना जरूरी नहीं, समस्या को चुनाव तक जिंदा रखना जरूरी है।
मजा तो तब आता है जब आरक्षण, कोटा और फ्रीबी का मसाला मिलता है। डेमोग्राफिक डिविडेंड को जाति, धर्म, क्षेत्र के हिसाब से बाँट दिया जाता है। एक पार्टी कहती है—“युवाओं को नौकरी दो।” दूसरी कहती है—“पहले कोटा बढ़ाओ।” तीसरी कहती है—“मुफ्त बिजली, मुफ्त राशन, मुफ्त लैपटॉप।” नतीजा? युवा नौकरी माँगने के बजाय मुफ्त का इंतजार करने लगते हैं। डिविडेंड काम करने के बजाय ‘मुफ्तखोरी’ का डिविडेंड बन जाता है।
और सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई ये है कि 10 साल का समय राजनीतिक रूप से बहुत लंबा होता है। नेता सोचते हैं—“अगला चुनाव तो 5 साल बाद है। तब तक मैं वादा कर दूँगा, रिपोर्ट बनवा दूँगा, नया आयोग बना दूँगा।” 2035 के बाद जब कामकाजी आबादी घटने लगेगी, तब कोई नेता बचेगा ही नहीं जो जवाबदेह हो। सब रिटायर हो चुके होंगे या किसी और पार्टी में चले गए होंगे। देश बूढ़ा हो जाएगा, और राजनीति कहेगी—“अरे, हमने तो कोशिश की थी… जनता ने वोट नहीं दिया।”
चीन ने डिविडेंड का फायदा उठाया क्योंकि वहाँ एक पार्टी थी और फैसला जल्दी होता था। भारत में लोकतंत्र है, इसलिए फैसला लेने में इतना समय लगता है कि डिविडेंड खुद थककर बैठ जाता है। लोकतंत्र की खूबी है कि हर कोई बोल सकता है। खराबी ये है कि बोलने वाले इतने ज्यादा हैं कि काम करने वाला कोई नहीं बचता।
तो दोस्तों, डेमोग्राफिक डिविडेंड का असली राजनीतिक पहलू ये है—ये युवाओं का भविष्य नहीं, नेताओं का वर्तमान है। युवा सोचते हैं नौकरी मिलेगी, नेता सोचते हैं वोट मिलेगा। दोनों सही हैं। बस फर्क इतना है कि वोट तो 5 साल में मिल जाता है, नौकरी 10 साल में भी नहीं मिलती।
अगर यह सिलसिला जारी रहा तो 2035 में जब डिविडेंड ढलान पर होगा, तब कोई नया नेता खड़ा होकर बोलेगा—“हमारे पूर्वजों ने डेमोग्राफिक डिविडेंड बर्बाद कर दिया। अब हम ‘डेमोग्राफिक लाइबिलिटी’ को संभालेंगे।” और युवा (जो अब अधेड़ हो चुके होंगे) ताली बजाते हुए कहेंगे—“वाह! क्या विजन है!”
यही है भारतीय राजनीति का असली डेमोग्राफिक डिविडेंड—वादों का, भाषणों का, और हमेशा के लिए अधूरे रह जाने वाले सपनों का।




