व्यंग्य
बाकी दुनिया नई टेक्नोलॉजी बना रही, हम “जुगाड़ इनोवेशन” पर अटके हैं
विजय शंकर पांडेय
भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों ऐसे व्यवहार कर रही है, जैसे एग्ज़ाम से पहले वाला छात्र—किताब खुली है, पर ध्यान कहीं और है। भारत की हालत ये है कि हर नई रिपोर्ट में “संभावनाएं अपार हैं” लिखा होता है, और नीचे छोटे अक्षरों में “बस फिलहाल नहीं”। रुपया भी अमेरिका के डॉलर को देखकर ऐसे गिर रहा है जैसे कोई सेल में कीमत—“लो, और सस्ता!” बाजार में लोग पूछते हैं, “रुपया गिर क्यों रहा है?” जवाब आता है, “क्योंकि उसे ऊपर उठाने वाला कोई जिम ट्रेनर नहीं है।” सरकार कहती है—“सब कंट्रोल में है।” आम आदमी पूछता है—“किसके कंट्रोल में?” उधर महंगाई ऐसे बढ़ रही है जैसे रिश्तेदारों की सलाह—बिना मांगे और लगातार।
विशेषज्ञ टीवी पर ग्राफ दिखाते हैं, जिनमें लाइन नीचे जाती है और वे कहते हैं—“देखिए, ये एक ‘ट्रांजिशन फेज़’ है।” जनता समझती है—“मतलब अभी और नीचे जाना बाकी है।” असल समस्या ये है कि जड़ें कमजोर हैं, लेकिन हम पत्तों को पॉलिश करने में लगे हैं। पेड़ हिल रहा है, और हम कह रहे हैं—“देखो, हवा कितनी तेज़ है!” अर्थव्यवस्था का असली मंत्र अब यही है, “घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा”—बस कब होगा, ये किसी के सिलेबस में नहीं है।
हम ब्रेक का आनंद ले रहे हैं
देश की अर्थव्यवस्था इस वक्त ऐसी फिल्म बन चुकी है, जिसका ट्रेलर कुछ और दिखाता है और असली कहानी कुछ और निकलती है। ऊपर से बयान आता है—“चिंता की कोई बात नहीं।” नीचे वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट धीरे से कान में कहती है—“भाई, थोड़ा तो घबरा लो।” प्रधानमंत्री और मंत्रीगण ऐसे आत्मविश्वास से भरे हैं जैसे क्रिकेट मैच में टीम 200 रन से पीछे हो और कप्तान कहे—“अभी मैच हमारे कंट्रोल में है।” उधर अर्थव्यवस्था पवेलियन में बैठी पानी पी रही है और पूछ रही है—“मुझे कब बैटिंग का मौका मिलेगा?” वित्त मंत्रालय की मासिक समीक्षा रिपोर्ट ने तो जैसे सच्चाई का CCTV फुटेज जारी कर दिया। उसमें साफ लिखा है—आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ी हैं। लेकिन बयानबाज़ी का कमाल देखिए—इसे “धीमी” नहीं, “संतुलित गति” कहा जा रहा है। यानी गाड़ी खड़ी हो जाए, तो कहो—“हम ब्रेक का आनंद ले रहे हैं।”
पश्चिम एशिया में युद्ध का असर भी खूब है। तेल की कीमतें ऐसे उछल रही हैं जैसे उन्हें ओलंपिक में भेजा जाना हो। और भारत की हालत उस परिवार जैसी है, जिसका बजट पहले ही टाइट हो और गैस सिलेंडर अचानक VIP बन जाए। ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता ने सरकार को ऐसा उलझाया है जैसे मोबाइल में नेटवर्क न आए—आप बार-बार फोन उठाते हैं, लेकिन सिग्नल गायब। और इस बीच महंगाई ने अपनी एंट्री मार दी है—पूरी फिल्म की असली विलेन बनकर। खासकर खाद्य पदार्थों की कीमतें तो ऐसे बढ़ रही हैं जैसे सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स—रुकने का नाम ही नहीं। टमाटर अब सब्जी नहीं, स्टेटस सिंबल बन चुका है। लोग सलाद में डालने से पहले दो बार सोचते हैं—“खाएं या बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट कर दें?”
फिलहाल देश में सबसे स्थिर चीज़ अगर कोई है, तो वो है—आश्वासन
गरीब और मध्यम वर्ग की हालत सबसे दिलचस्प है। अमीर वर्ग कहता है—“थोड़ी महंगाई है, मैनेज कर लेंगे।” गरीब वर्ग कहता है—“थोड़ी नहीं, पूरी महंगाई है, कैसे मैनेज करें?” और मध्यम वर्ग… वो बस EMI और सब्जी के दाम के बीच संतुलन साधने में योगा कर रहा है। सरकार का कहना है—“हम स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।” जनता पूछती है—“नजर के साथ कुछ कार्रवाई भी है या सिर्फ देखना ही है?” जवाब में फिर वही भरोसा—“सब ठीक हो जाएगा।”
असल में, हमारी अर्थव्यवस्था अब उस छात्र की तरह हो गई है, जिसे हर बार कहा जाता है—“अगली बार बेहतर करेंगे।” और अगली बार फिर वही कहानी दोहराई जाती है। फिलहाल देश में सबसे स्थिर चीज़ अगर कोई है, तो वो है—आश्वासन। महंगाई बदलती रहती है, तेल के दाम बदलते रहते हैं, रिपोर्ट्स बदलती रहती हैं… लेकिन एक चीज़ नहीं बदलती—“चिंता की कोई बात नहीं।” और यही सुन-सुनकर अब जनता सोच रही है—“शायद असली चिंता यही है कि कोई चिंता की बात मान ही नहीं रहा।”
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय ऐसी बहुमुखी प्रतिभा दिखा रही है कि हर दिशा में समस्या पैदा कर रही है—ऊर्जा महंगी, रुपया ढीला, निवेश सुस्त और बाज़ार नर्वस। यानी “ऑल-राउंडर परफॉर्मेंस”, बस दर्शक खुश नहीं हैं। ऊर्जा लागत बढ़ी तो महंगाई ने तुरंत मौका भांप लिया—जैसे किसी शादी में बिना बुलाए रिश्तेदार। पेट्रोल-डीजल के दाम ऐसे चढ़ते हैं, जैसे उन्हें लिफ्ट मिल गई हो, और नीचे उतरने का रास्ता भूल गए हों। आम आदमी सोचता है—“गाड़ी चलाऊं या EMI भरूं?” उधर व्यापार घाटा और चालू खाते का घाटा ऐसे बढ़ रहे हैं जैसे व्हाट्सऐप ग्रुप में “गुड मॉर्निंग” मैसेज—रोज़, लगातार और बिना पूछे। विदेशी निवेशक भी अब भारत को ऐसे देख रहे हैं जैसे कोई छात्र प्रैक्टिकल से पहले लैब—“जाएं या ना जाएं?”
आत्मविश्वास कम, पसीना ज्यादा
रुपया बेचारा डॉलर के सामने ऐसे खड़ा है जैसे बोर्ड एग्जाम में बिना पढ़े छात्र—आत्मविश्वास कम, पसीना ज्यादा। अमेरिका का डॉलर मुस्कुरा रहा है और रुपया धीरे-धीरे कह रहा है—“भाई, थोड़ा संभलकर… मैं पहले ही दबाव में हूं।” अब आते हैं असली ट्विस्ट पर—सरकार को ये सब पहले से पता है। वी. अनंत नागेश्वरन जैसे लोग लगातार चेतावनी दे रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025 में साफ कहा गया था कि वित्तीय क्षेत्र इतना तेज भाग रहा है कि असली अर्थव्यवस्था पीछे छूट रही है। यानी शेयर मार्केट पार्टी कर रहा है और असली कारोबार कोने में बैठा समोसा खा रहा है।
आईपीओ का हाल तो और दिलचस्प है। पहले कंपनियां पैसा जुटाने के लिए बाजार में आती थीं, अब कुछ मामलों में लगता है प्रमोटर कह रहे हैं—“भाई, हम निकल रहे हैं, तुम संभालो।” निवेशक सोचता है—“मैं निवेश कर रहा हूं या किसी और का एग्जिट प्लान फंड कर रहा हूं?” स्थिति ऐसी हो गई है कि हर समस्या दूसरी समस्या की दोस्त बन गई है। ऊर्जा महंगी हुई तो महंगाई बढ़ी, महंगाई बढ़ी तो खर्च घटा, खर्च घटा तो विकास धीमा, विकास धीमा तो निवेशक गायब—और फिर रुपया बोला, “अब मैं भी चलता हूं नीचे।”
सरकार का बयान अब भी वही है—“सब नियंत्रण में है।” लेकिन कंट्रोल इतना “माइक्रो” हो गया है कि आम आदमी को दिखाई ही नहीं दे रहा। असल में, हमारी अर्थव्यवस्था उस पुराने पंखे की तरह हो गई है—आवाज़ बहुत करता है, हवा कम देता है। और जब कोई पूछे कि “ठीक क्यों नहीं कराते?”, जवाब मिलता है—“चल तो रहा है ना!” अंत में सच्चाई यही है—जड़ कमजोर है, और ऊपर से आंधी तेज़। लेकिन हम अब भी पत्तों को पकड़कर समझ रहे हैं कि पेड़ मजबूत है। और जब अर्थशास्त्री चेतावनी देते हैं, तो हम कहते हैं—“भाई, थोड़ा पॉजिटिव सोचो!”
क्योंकि इस देश में सबसे मजबूत सेक्टर अगर कोई है, तो वो है—आशावाद। भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त एक ऐसे “जुगाड़ू महल” की तरह लग रही है, जिसे दूर से देखो तो ताजमहल, पास जाओ तो ईंटों के बीच से झांकती रेत। ऊपर से जीडीपी की चमक—नीचे से बुनियाद की खनक। सरकार कहती है—“हम दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं।” निजी क्षेत्र कहता है—“हाँ, लेकिन रिस्क आप लीजिए, हम तालियां बजाएंगे।” हाल ये है कि निवेश की बात आते ही उद्योगपति ऐसे पीछे हटते हैं जैसे स्कूल में टीचर पूछे—“कौन प्रेजेंटेशन देगा?”
आर्थिक सर्वेक्षण ने भी इशारों-इशारों में बता दिया—निजी क्षेत्र रिस्क लेने के मूड में नहीं है। यानी देश का बिजनेस क्लास अब “खतरा” शब्द को ऐसे देखता है जैसे कोई बिल्ली पानी को—दूर से ही नमस्ते! अनुसंधान और विकास की हालत तो और दिलचस्प है। बाकी दुनिया नई टेक्नोलॉजी बना रही है, और हम अभी भी “जुगाड़ इनोवेशन” पर अटके हैं—जैसे टूटी कुर्सी को ईंट से सपोर्ट देना और कहना—“देखो, इंडिजिनस टेक्नोलॉजी!”
ये इन्वेस्टमेंट है या किसी का ‘एग्जिट इंटरव्यू’?
आईपीओ का खेल भी अब थोड़ा फिल्मी हो गया है। पहले कंपनियां कहती थीं—“हम भविष्य बना रहे हैं, पैसा लगाइए।” अब कुछ जगहों पर मैसेज ऐसा लगता है—“हम अपना भविष्य बना चुके हैं, अब आप हमारा वर्तमान खरीद लीजिए।” निवेशक सोचता है—“ये इन्वेस्टमेंट है या किसी का ‘एग्जिट इंटरव्यू’?” और फिर आता है जीडीपी का जादू। हर बार आंकड़ा आता है और हम खुशी से कहते हैं—“देखो, कितनी तेज़ ग्रोथ है!” लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि ये ग्रोथ आई कहां से? क्योंकि अगर सवाल पूछ लिया, तो जवाब मिलेगा—“थोड़ा वित्तीय सेक्टर से, थोड़ा उम्मीदों से, और बाकी एक्सेल शीट से।”
असल में, हमने अर्थव्यवस्था के दो मजबूत खंभे बनाए—निजी क्षेत्र और वित्तीय सेक्टर। लेकिन दिक्कत ये है कि दोनों खंभे रेत पर खड़े हैं। निजी क्षेत्र रिस्क नहीं लेना चाहता और वित्तीय सेक्टर इतना तेज़ भाग रहा है कि असली अर्थव्यवस्था पीछे छूट गई है। अब जब वैश्विक परिस्थितियां खराब हुईं—ऊर्जा महंगी, निवेश धीमा, बाज़ार अस्थिर—तो ये खंभे डगमगाने लगे। जैसे तेज हवा में प्लास्टिक की कुर्सी—दिखती मजबूत है, पर भरोसा नहीं होता।
मासिक समीक्षा रिपोर्ट ने भी यही कहा—हालात थोड़े कठिन हैं। लेकिन सरकारी भाषा में “कठिन” का मतलब होता है—“थोड़ा ज्यादा ही कठिन।” जनता अब कंफ्यूज है—टीवी पर सुनती है “अर्थव्यवस्था मजबूत है”, बाजार में जाती है तो लगता है “जेब कमजोर है।” ये वही स्थिति है जैसे डॉक्टर कहे—“आप बिल्कुल फिट हैं”, और मरीज सीढ़ी चढ़ते ही हांफ जाए। अंत में सच्चाई सीधी है—हमने एक शानदार इमारत बनाई, लेकिन नींव पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अब जब मौसम खराब हुआ है, तो दीवारों में हल्की-हल्की दरारें दिखने लगी हैं। फिलहाल समाधान यही है—आंकड़ों की पेंटिंग थोड़ी और चमका दो, और जनता से कहो—“देखो, सब कुछ ठीक लग रहा है ना?” क्योंकि इस दौर में असली अर्थव्यवस्था से ज्यादा जरूरी है—उसका अच्छा दिखना।




