तभी लोकतंत्र के रिमोट से किसी ने म्यूट बटन दबा दिया

 विजय शंकर पांडेय


देश की सबसे बड़ी पंचायत में इस बार नया नियम लागू हुआ है— बोलना मना है, समझना वैकल्पिक है, और मान लेना अनिवार्य है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों तैयार थे। विपक्ष फाइल लेकर आया था, सत्ता पक्ष भी जवाब लेकर। जनता उम्मीद लेकर बैठी थी— आज कुछ तो सुना जाएगा! लेकिन तभी लोकतंत्र के रिमोट से किसी ने म्यूट बटन दबा दिया। विपक्ष बोला—हम चर्चा चाहते हैं! जवाब आया—हमने उचित विचार-विमर्श कर लिया है। विपक्ष फिर बोला—लेकिन हमें भी तो बोलने दें! जवाब मिला—आपके विचार हम पहले ही समझ चुके हैं, अब उसे सुनने की ज़रूरत नहीं। 


लोकसभा में ओम बिरला और राज्यसभा में सीपी राधाकृष्णनन ने बड़ी शालीनता से कहा— बहस नहीं होगी, क्योंकि हमने पहले ही बहस कर ली है… अपने-अपने दिमाग में। यह सुनकर लोकतंत्र थोड़ा चौंका— अच्छा! अब बहस भी इन-हाउस हो गई? उधर विपक्ष के पास लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 हस्ताक्षर थे। मतलब संख्या पूरी थी, मौका अधूरा रह गया। जैसे शादी में बारात पूरी आ जाए, लेकिन दूल्हे से कहा जाए— फेरे हमने सोच लिए हैं, आप बस मिठाई खा लीजिए। प्रस्ताव था—मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने का। मुद्दा बड़ा था, सवाल गंभीर थे, लेकिन समाधान सरल निकला—चर्चा ही मत होने दो। क्योंकि अगर चर्चा होगी, तो सवाल उठेंगे। सवाल उठेंगे, तो जवाब देने पड़ेंगे। और जवाब देने पड़ेंगे, तो कहीं भरोसा भी बन सकता है— जो कि इस समय सबसे अनावश्यक चीज़ लग रही है।


जनता टीवी पर बैठी सोच रही थी— अरे! ये वही संसद है न, जहाँ कभी बहस हुआ करती थी? अब तो लगता है— संसद नहीं, साइलेंट मोड में चल रही मीटिंग है। विपक्ष के नेता बोले— हमें बोलने का मौका चाहिए! सत्ता पक्ष ने मुस्कुराकर कहा— आपकी भावना हम तक पहुँच गई है, अब शब्दों की क्या ज़रूरत? यह नया लोकतांत्रिक मॉडल है— जहाँ संवाद की जगह सारांश चल रहा है। जनता के मन में जो शक था, वो अब थोड़ा और मजबूत हो गया। क्योंकि जब सवाल पूछने की इजाज़त नहीं मिलती, तो लोग जवाब खुद बना लेते हैं— और वही सबसे खतरनाक होते हैं।


अगर सब ठीक है, तो बोलने में डर कैसा है?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ, निर्वाचन आयोग की सफाई, और अब संसद की चुप्पी— तीनों मिलकर एक नया नैरेटिव बना रहे हैं— अगर सब ठीक है, तो बोलने में डर कैसा है? लोकतंत्र अब सोच रहा है— मुझे बचाने के लिए बहस जरूरी थी, अब मुझे बचाने के लिए चुप्पी जरूरी हो गई? अंत में जनता ने टीवी बंद किया और कहा— लगता है अगली बार वोट डालने से पहले हमें यह भी पूछना पड़ेगा— वोट डालें या सीधे मान लें कि सब ठीक है? और संसद के गलियारों में कहीं एक धीमी आवाज गूंजी— बहस होती तो रिकॉर्ड बनता… अब सिर्फ रिकार्डेड साइलेंस है। 


लोकतंत्र में अब चुनाव नहीं हो रहा, “संदेह उत्सव” मनाया जा रहा है। पहले लोग वोट डालते थे, अब शक डालते हैं—और वह भी पूरे आत्मविश्वास के साथ। पहले सवाल होता था—किसे वोट दें? अब सवाल है—वोट जाएगा भी या बीच रास्ते में ही ‘लापता’ तो नहीं हो जाएगा? निर्वाचन आयोग बेचारा अब सिर्फ चुनाव नहीं कराता, वह लोगों के मन से शक हटाने की कोशिश भी करता है। लेकिन समस्या यह है कि शक अब वायरल कंटेंट बन चुका है—एक बार फैल गया तो हर मोबाइल में अपना घर बना लेता है। 


पश्चिम बंगाल का माहौल तो जैसे चुनाव से पहले ही ‘थ्रिलर फिल्म’ बन चुका है। हर गली में सस्पेंस, हर चौक पर क्लाइमेक्स। और मालदा के कलियाचक में तो लोकतंत्र ने खुद को रियलिटी शो में बदल लिया—जहाँ न्यायिक अधिकारी दस घंटे तक “कैद में लोकतंत्र” एपिसोड का हिस्सा बने रहे। भीड़ भी कमाल की थी—महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग—सब शामिल। ऐसा लग रहा था जैसे कोई त्योहार हो। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां प्रसाद की जगह आक्रोश बांटा जा रहा था।


संदेह अब लोकतंत्र का नया ईंधन बन चुका है

कोई पूछे—आप क्यों आए हैं? जवाब मिला, हमें भी नहीं पता, लेकिन माहौल गरम है, तो हम भी गरम हैं। आजकल भीड़ का अपना तर्क है— अगर हम गुस्से में नहीं होंगे, तो हमें सीरियस कौन लेगा? और नेताओं का तर्क उससे भी सरल— अगर जनता गुस्से में है, तो उसे थोड़ा और गुस्सा दिलाना हमारा कर्तव्य है। संदेह अब लोकतंत्र का नया ईंधन बन चुका है। बिना इसके चुनाव का इंजन स्टार्ट ही नहीं होता। कोई कहता है—सूची में नाम नहीं है। कोई कहता है—नाम है, पर भरोसा नहीं है।

और कुछ लोग तो इतने उन्नत हो चुके हैं कि कहते हैं—हमें खुद पर ही भरोसा नहीं है, वोट पर क्या भरोसा करें! इस पूरे ड्रामे में न्यायिक अधिकारी सबसे दिलचस्प किरदार बन गए हैं— वे फाइल लेकर आए थे, और ‘बंधक अनुभव’ लेकर लौटे।


सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई—और जतानी भी चाहिए थी। लेकिन कोर्ट भी शायद सोच रहा होगा— हम फैसला सुनाएं या पहले जनता के संदेह का इलाज करें? असल समस्या यही है—चुनाव प्रक्रिया से ज्यादा लोगों के मन की प्रक्रिया बिगड़ गई है। जहाँ भरोसा होना चाहिए था, वहाँ शक है। जहाँ धैर्य होना चाहिए था, वहाँ भीड़ है। और जहाँ संवाद होना चाहिए था, वहाँ नारे हैं। लोकतंत्र अब वोट से नहीं, वायरल वीडियो से प्रभावित होता है।


आखिर में जनता भी कन्फ्यूज है

जिसका वीडियो ज्यादा चला, उसका नैरेटिव सही माना जाता है। आखिर में जनता भी कन्फ्यूज है— हम वोटर हैं, दर्शक हैं, या इस पूरे शो के एक्स्ट्रा कलाकार? और लोकतंत्र चुपचाप कोने में बैठा सोच रहा है—मुझे बचाने के लिए चुनाव कराए जाते थे, अब चुनाव बचाने के लिए मुझे ही बचाना पड़ रहा है। कहानी का नैतिक संदेश बहुत सीधा है— जब भरोसा गायब हो जाता है, तो लोकतंत्र भीड़ के भरोसे चलने लगता है… और भीड़ का भरोसा—आप जानते ही हैं— हर पाँच मिनट में अपडेट हो जाता है!


देश में दो तरह के आयोग सक्रिय हैं— एक है निर्वाचन आयोग। और दूसरा है जनता का संदेह आयोग। पहला चुनाव कराता है, दूसरा चुनाव पर शक कराता है। अब समस्या यह है कि दूसरा आयोग ज्यादा लोकप्रिय हो गया है। उसके पास न दफ्तर है, न कर्मचारी— फिर भी उसकी पहुँच हर गली, हर मोबाइल और हर चाय की दुकान तक है। निर्वाचन आयोग ने सोचा—चलो सुधार करते हैं। और देखते ही देखते पश्चिम बंगाल के 480 अफसरों का तबादला कर दिया। ऐसा लगा जैसे चुनाव नहीं, म्यूजिकल चेयर का फाइनल राउंड चल रहा हो।


अफसर भी कन्फ्यूज— हम ड्यूटी पर हैं या ट्रांसफर की रिहर्सल में? ऊपर से आया आदेश—निष्पक्ष रहो। नीचे से आया सवाल—सर, पहले पता तो हो हम हैं कहाँ? फिर आया विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात SIR। नाम सुनकर लगा जैसे कोई सुपरहीरो एंट्री कर रहा हो— मैं हूँ SIR, सब ठीक कर दूँगा! लेकिन SIR के आते ही 10 लाख आपत्तियाँ आ गईं। इतनी आपत्तियाँ कि खुद आपत्तियाँ भी सोचने लगीं—हम ज़्यादा तो नहीं हो गईं? अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा—जल्दी निपटाओ। तो निपटाया गया—इतनी तेजी से कि कुछ आपत्तियाँ समझ ही नहीं पाईं कि उन्हें सुना गया या सिर्फ स्क्रॉल किया गया।


निष्पक्षता अब सिद्धांत नहीं, कस्टमाइज्ड सर्विस

निष्पक्षता अब भारत में कोई सिद्धांत नहीं, एक कस्टमाइज्ड सर्विस बन चुकी है—आपकी ज़रूरत के हिसाब से निष्पक्षता। पश्चिम बंगाल में भारतीय चुनाव आयोग ने पूरा प्रशासन बदल दिया—जैसे घर में मेहमान आने वाले हों और अचानक सफाई अभियान चल पड़े। कुर्सियाँ बदलो, टेबल बदलो, माहौल बदलो… ताकि निष्पक्षता चमकती हुई दिखे। वहीं असम में सब कुछ वैसा ही है। यहाँ निष्पक्षता छुट्टी पर है, शायद ब्रह्मपुत्र किनारे चाय पी रही है। हिमंता बिस्वा सरमा के साथ सेटिंग इतनी आरामदायक है कि आयोग को लगा—यहाँ सब ठीक ही होगा, क्यों बेवजह मेहनत करें? 


अब निष्पक्षता भी क्षेत्रीय भाषा समझने लगी है। बंगाल में वो सख्त अफसर बन जाती है—सब बदल दो! और असम में दोस्ताना अंदाज़—आप जैसे हैं, वैसे ही बढ़िया हैं। जनता भी कन्फ्यूज है—निष्पक्षता का ट्रांसफर ऑर्डर आया क्या? कोई कहता है—भाई, ये वन नेशन, वन निष्पक्षता’ नहीं है, ये वन स्टेट, वन स्टाइल है। आखिरकार लोकतंत्र में सब बराबर हैं… बस कुछ लोग ज़्यादा बराबर हैं!


नतीजा— काम पूरा हुआ, पर भरोसा अधूरा रह गया। जनता ने देखा— इतनी जल्दी? जरूर कुछ गड़बड़ है! और फिर शुरू हुआ साज़िशाना कहानियों का सीज़न 2। कोई बोला—सूची में नाम गायब है। दूसरा बोला—नाम है, पर भरोसा गायब है। तीसरा बोला—दोनों हैं, पर सिस्टम पर भरोसा नहीं है। अब राजनीतिक गुटों के लिए यह माहौल वैसा ही है जैसे सूखी घास में चिंगारी। बस एक बयान दो, और आग अपने आप फैल जाती है।


हर सफाई, एक नई शंका पैदा कर रही

नेता बोले— हम जनता की भावनाओं का सम्मान करते हैं। मतलब— जहाँ शक है, वहाँ थोड़ा और शक डालो। इस पूरे ड्रामे में सबसे दिलचस्प किरदार फिर वही—निर्वाचन आयोग। वह बार-बार कहता है— हमने सब नियमों के अनुसार किया। जनता जवाब देती है— हमें नियम नहीं, भरोसा चाहिए। सुप्रीम कोर्ट बीच में आता है, नाराजगी जताता है, टिप्पणी करता है— पर जनता का संदेह इतना जिद्दी है कि वह कहता है— कोर्ट भी आ गया, अब कहानी और पक्की लग रही है! यानी स्थिति यह है कि हर सफाई, एक नई शंका पैदा कर रही है। लोकतंत्र अब प्रक्रिया से नहीं, परसेप्शन से चलता है। और परसेप्शन वही बनाता है जिसकी कहानी ज्यादा मजेदार हो।


आखिर में सवाल वही— चुनाव निष्पक्ष है या नहीं? शायद है। शायद नहीं भी। लेकिन असली संकट यह है कि अब किसी को “शायद” पर भरोसा नहीं। लोकतंत्र को बचाने के लिए अब सिर्फ वोटिंग मशीन नहीं, ट्रस्ट मशीन भी चाहिए— जो हर वोट के साथ एक भरोसा भी डाले। वरना अगली बार निर्वाचन आयोग प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगा, और जनता पूछेगी— सर, चुनाव कब हैं? और साथ ही—और इस बार शक का रिजल्ट कब आएगा?



साभार - #नेशनल_व्हील्स #प्रयागराज 


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ऊर्जा महंगी, रुपया ढीला, निवेश सुस्त और बाज़ार नर्वस

 व्यंग्य

बाकी दुनिया नई टेक्नोलॉजी बना रही, हम “जुगाड़ इनोवेशन” पर अटके हैं

विजय शंकर पांडेय


भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों ऐसे व्यवहार कर रही है, जैसे एग्ज़ाम से पहले वाला छात्र—किताब खुली है, पर ध्यान कहीं और है। भारत की हालत ये है कि हर नई रिपोर्ट में “संभावनाएं अपार हैं” लिखा होता है, और नीचे छोटे अक्षरों में “बस फिलहाल नहीं”। रुपया भी अमेरिका के डॉलर को देखकर ऐसे गिर रहा है जैसे कोई सेल में कीमत—“लो, और सस्ता!” बाजार में लोग पूछते हैं, “रुपया गिर क्यों रहा है?” जवाब आता है, “क्योंकि उसे ऊपर उठाने वाला कोई जिम ट्रेनर नहीं है।” सरकार कहती है—“सब कंट्रोल में है।” आम आदमी पूछता है—“किसके कंट्रोल में?” उधर महंगाई ऐसे बढ़ रही है जैसे रिश्तेदारों की सलाह—बिना मांगे और लगातार।

विशेषज्ञ टीवी पर ग्राफ दिखाते हैं, जिनमें लाइन नीचे जाती है और वे कहते हैं—“देखिए, ये एक ‘ट्रांजिशन फेज़’ है।” जनता समझती है—“मतलब अभी और नीचे जाना बाकी है।” असल समस्या ये है कि जड़ें कमजोर हैं, लेकिन हम पत्तों को पॉलिश करने में लगे हैं। पेड़ हिल रहा है, और हम कह रहे हैं—“देखो, हवा कितनी तेज़ है!” अर्थव्यवस्था का असली मंत्र अब यही है, “घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा”—बस कब होगा, ये किसी के सिलेबस में नहीं है।


हम ब्रेक का आनंद ले रहे हैं

देश की अर्थव्यवस्था इस वक्त ऐसी फिल्म बन चुकी है, जिसका ट्रेलर कुछ और दिखाता है और असली कहानी कुछ और निकलती है। ऊपर से बयान आता है—“चिंता की कोई बात नहीं।” नीचे वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट धीरे से कान में कहती है—“भाई, थोड़ा तो घबरा लो।” प्रधानमंत्री और मंत्रीगण ऐसे आत्मविश्वास से भरे हैं जैसे क्रिकेट मैच में टीम 200 रन से पीछे हो और कप्तान कहे—“अभी मैच हमारे कंट्रोल में है।” उधर अर्थव्यवस्था पवेलियन में बैठी पानी पी रही है और पूछ रही है—“मुझे कब बैटिंग का मौका मिलेगा?” वित्त मंत्रालय की मासिक समीक्षा रिपोर्ट ने तो जैसे सच्चाई का CCTV फुटेज जारी कर दिया। उसमें साफ लिखा है—आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ी हैं। लेकिन बयानबाज़ी का कमाल देखिए—इसे “धीमी” नहीं, “संतुलित गति” कहा जा रहा है। यानी गाड़ी खड़ी हो जाए, तो कहो—“हम ब्रेक का आनंद ले रहे हैं।”


पश्चिम एशिया में युद्ध का असर भी खूब है। तेल की कीमतें ऐसे उछल रही हैं जैसे उन्हें ओलंपिक में भेजा जाना हो। और भारत की हालत उस परिवार जैसी है, जिसका बजट पहले ही टाइट हो और गैस सिलेंडर अचानक VIP बन जाए। ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता ने सरकार को ऐसा उलझाया है जैसे मोबाइल में नेटवर्क न आए—आप बार-बार फोन उठाते हैं, लेकिन सिग्नल गायब। और इस बीच महंगाई ने अपनी एंट्री मार दी है—पूरी फिल्म की असली विलेन बनकर। खासकर खाद्य पदार्थों की कीमतें तो ऐसे बढ़ रही हैं जैसे सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स—रुकने का नाम ही नहीं। टमाटर अब सब्जी नहीं, स्टेटस सिंबल बन चुका है। लोग सलाद में डालने से पहले दो बार सोचते हैं—“खाएं या बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट कर दें?”


फिलहाल देश में सबसे स्थिर चीज़ अगर कोई है, तो वो है—आश्वासन

गरीब और मध्यम वर्ग की हालत सबसे दिलचस्प है। अमीर वर्ग कहता है—“थोड़ी महंगाई है, मैनेज कर लेंगे।” गरीब वर्ग कहता है—“थोड़ी नहीं, पूरी महंगाई है, कैसे मैनेज करें?” और मध्यम वर्ग… वो बस EMI और सब्जी के दाम के बीच संतुलन साधने में योगा कर रहा है। सरकार का कहना है—“हम स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।” जनता पूछती है—“नजर के साथ कुछ कार्रवाई भी है या सिर्फ देखना ही है?” जवाब में फिर वही भरोसा—“सब ठीक हो जाएगा।”


असल में, हमारी अर्थव्यवस्था अब उस छात्र की तरह हो गई है, जिसे हर बार कहा जाता है—“अगली बार बेहतर करेंगे।” और अगली बार फिर वही कहानी दोहराई जाती है। फिलहाल देश में सबसे स्थिर चीज़ अगर कोई है, तो वो है—आश्वासन। महंगाई बदलती रहती है, तेल के दाम बदलते रहते हैं, रिपोर्ट्स बदलती रहती हैं… लेकिन एक चीज़ नहीं बदलती—“चिंता की कोई बात नहीं।” और यही सुन-सुनकर अब जनता सोच रही है—“शायद असली चिंता यही है कि कोई चिंता की बात मान ही नहीं रहा।”


भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय ऐसी बहुमुखी प्रतिभा दिखा रही है कि हर दिशा में समस्या पैदा कर रही है—ऊर्जा महंगी, रुपया ढीला, निवेश सुस्त और बाज़ार नर्वस। यानी “ऑल-राउंडर परफॉर्मेंस”, बस दर्शक खुश नहीं हैं। ऊर्जा लागत बढ़ी तो महंगाई ने तुरंत मौका भांप लिया—जैसे किसी शादी में बिना बुलाए रिश्तेदार। पेट्रोल-डीजल के दाम ऐसे चढ़ते हैं, जैसे उन्हें लिफ्ट मिल गई हो, और नीचे उतरने का रास्ता भूल गए हों। आम आदमी सोचता है—“गाड़ी चलाऊं या EMI भरूं?” उधर व्यापार घाटा और चालू खाते का घाटा ऐसे बढ़ रहे हैं जैसे व्हाट्सऐप ग्रुप में “गुड मॉर्निंग” मैसेज—रोज़, लगातार और बिना पूछे। विदेशी निवेशक भी अब भारत को ऐसे देख रहे हैं जैसे कोई छात्र प्रैक्टिकल से पहले लैब—“जाएं या ना जाएं?”


आत्मविश्वास कम, पसीना ज्यादा

रुपया बेचारा डॉलर के सामने ऐसे खड़ा है जैसे बोर्ड एग्जाम में बिना पढ़े छात्र—आत्मविश्वास कम, पसीना ज्यादा। अमेरिका का डॉलर मुस्कुरा रहा है और रुपया धीरे-धीरे कह रहा है—“भाई, थोड़ा संभलकर… मैं पहले ही दबाव में हूं।” अब आते हैं असली ट्विस्ट पर—सरकार को ये सब पहले से पता है। वी. अनंत नागेश्वरन जैसे लोग लगातार चेतावनी दे रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025 में साफ कहा गया था कि वित्तीय क्षेत्र इतना तेज भाग रहा है कि असली अर्थव्यवस्था पीछे छूट रही है। यानी शेयर मार्केट पार्टी कर रहा है और असली कारोबार कोने में बैठा समोसा खा रहा है।


आईपीओ का हाल तो और दिलचस्प है। पहले कंपनियां पैसा जुटाने के लिए बाजार में आती थीं, अब कुछ मामलों में लगता है प्रमोटर कह रहे हैं—“भाई, हम निकल रहे हैं, तुम संभालो।” निवेशक सोचता है—“मैं निवेश कर रहा हूं या किसी और का एग्जिट प्लान फंड कर रहा हूं?” स्थिति ऐसी हो गई है कि हर समस्या दूसरी समस्या की दोस्त बन गई है। ऊर्जा महंगी हुई तो महंगाई बढ़ी, महंगाई बढ़ी तो खर्च घटा, खर्च घटा तो विकास धीमा, विकास धीमा तो निवेशक गायब—और फिर रुपया बोला, “अब मैं भी चलता हूं नीचे।”


सरकार का बयान अब भी वही है—“सब नियंत्रण में है।” लेकिन कंट्रोल इतना “माइक्रो” हो गया है कि आम आदमी को दिखाई ही नहीं दे रहा। असल में, हमारी अर्थव्यवस्था उस पुराने पंखे की तरह हो गई है—आवाज़ बहुत करता है, हवा कम देता है। और जब कोई पूछे कि “ठीक क्यों नहीं कराते?”, जवाब मिलता है—“चल तो रहा है ना!” अंत में सच्चाई यही है—जड़ कमजोर है, और ऊपर से आंधी तेज़। लेकिन हम अब भी पत्तों को पकड़कर समझ रहे हैं कि पेड़ मजबूत है। और जब अर्थशास्त्री चेतावनी देते हैं, तो हम कहते हैं—“भाई, थोड़ा पॉजिटिव सोचो!”

क्योंकि इस देश में सबसे मजबूत सेक्टर अगर कोई है, तो वो है—आशावाद। भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त एक ऐसे “जुगाड़ू महल” की तरह लग रही है, जिसे दूर से देखो तो ताजमहल, पास जाओ तो ईंटों के बीच से झांकती रेत। ऊपर से जीडीपी की चमक—नीचे से बुनियाद की खनक। सरकार कहती है—“हम दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं।” निजी क्षेत्र कहता है—“हाँ, लेकिन रिस्क आप लीजिए, हम तालियां बजाएंगे।” हाल ये है कि निवेश की बात आते ही उद्योगपति ऐसे पीछे हटते हैं जैसे स्कूल में टीचर पूछे—“कौन प्रेजेंटेशन देगा?”



आर्थिक सर्वेक्षण ने भी इशारों-इशारों में बता दिया—निजी क्षेत्र रिस्क लेने के मूड में नहीं है। यानी देश का बिजनेस क्लास अब “खतरा” शब्द को ऐसे देखता है जैसे कोई बिल्ली पानी को—दूर से ही नमस्ते! अनुसंधान और विकास की हालत तो और दिलचस्प है। बाकी दुनिया नई टेक्नोलॉजी बना रही है, और हम अभी भी “जुगाड़ इनोवेशन” पर अटके हैं—जैसे टूटी कुर्सी को ईंट से सपोर्ट देना और कहना—“देखो, इंडिजिनस टेक्नोलॉजी!”


ये इन्वेस्टमेंट है या किसी का ‘एग्जिट इंटरव्यू’?

आईपीओ का खेल भी अब थोड़ा फिल्मी हो गया है। पहले कंपनियां कहती थीं—“हम भविष्य बना रहे हैं, पैसा लगाइए।” अब कुछ जगहों पर मैसेज ऐसा लगता है—“हम अपना भविष्य बना चुके हैं, अब आप हमारा वर्तमान खरीद लीजिए।” निवेशक सोचता है—“ये इन्वेस्टमेंट है या किसी का ‘एग्जिट इंटरव्यू’?” और फिर आता है जीडीपी का जादू। हर बार आंकड़ा आता है और हम खुशी से कहते हैं—“देखो, कितनी तेज़ ग्रोथ है!” लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि ये ग्रोथ आई कहां से? क्योंकि अगर सवाल पूछ लिया, तो जवाब मिलेगा—“थोड़ा वित्तीय सेक्टर से, थोड़ा उम्मीदों से, और बाकी एक्सेल शीट से।”


असल में, हमने अर्थव्यवस्था के दो मजबूत खंभे बनाए—निजी क्षेत्र और वित्तीय सेक्टर। लेकिन दिक्कत ये है कि दोनों खंभे रेत पर खड़े हैं। निजी क्षेत्र रिस्क नहीं लेना चाहता और वित्तीय सेक्टर इतना तेज़ भाग रहा है कि असली अर्थव्यवस्था पीछे छूट गई है। अब जब वैश्विक परिस्थितियां खराब हुईं—ऊर्जा महंगी, निवेश धीमा, बाज़ार अस्थिर—तो ये खंभे डगमगाने लगे। जैसे तेज हवा में प्लास्टिक की कुर्सी—दिखती मजबूत है, पर भरोसा नहीं होता।


मासिक समीक्षा रिपोर्ट ने भी यही कहा—हालात थोड़े कठिन हैं। लेकिन सरकारी भाषा में “कठिन” का मतलब होता है—“थोड़ा ज्यादा ही कठिन।” जनता अब कंफ्यूज है—टीवी पर सुनती है “अर्थव्यवस्था मजबूत है”, बाजार में जाती है तो लगता है “जेब कमजोर है।” ये वही स्थिति है जैसे डॉक्टर कहे—“आप बिल्कुल फिट हैं”, और मरीज सीढ़ी चढ़ते ही हांफ जाए। अंत में सच्चाई सीधी है—हमने एक शानदार इमारत बनाई, लेकिन नींव पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अब जब मौसम खराब हुआ है, तो दीवारों में हल्की-हल्की दरारें दिखने लगी हैं। फिलहाल समाधान यही है—आंकड़ों की पेंटिंग थोड़ी और चमका दो, और जनता से कहो—“देखो, सब कुछ ठीक लग रहा है ना?” क्योंकि इस दौर में असली अर्थव्यवस्था से ज्यादा जरूरी है—उसका अच्छा दिखना।





बेहया बनाम वज्र बेहया

  विजय शंकर पांडेय 


एक होता है बेहया।

दूसरा होता है वज्र-बेहया।

पहला कभी-कभार शरमा जाता है।

दूसरा शर्म को सरकारी फाइल समझता है।

जिसे खोलना मना है।


बेहया गलती करे तो कान खुजाता है।

वज्र-बेहया गलती करे तो प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाता है।

कहता है—सब ठीक है।

गलती जनता की है।

समझने में चूक गई।


बेहया कुर्सी पाए तो थोड़ा संभलता है।

वज्र-बेहया कुर्सी पाए तो कुर्सी संभलती है।

डरती है।

कहीं ये बैठ न जाए।

और लकड़ी तक जल न जाए।


इनकी खासियत निराली है।

कीचड़ में कमल ढूंढ लेते हैं।

और कमल में भी कीचड़।

फिर गर्व से बताते हैं—

देखो, सफाई अभियान चल रहा है।


इनका आत्मविश्वास अद्भुत होता है।

तूफान आए तो कहते हैं—हमने बुलाया।

बारिश हो तो कहते हैं—हमारी योजना।

सूखा पड़े तो कहते हैं—जनता की साजिश।


ये हर मंच पर चमकते हैं।

माइक मिले तो इतिहास बदल देते हैं।

कैमरा मिले तो भूगोल।

और मौका मिले तो संविधान भी।


कुर्सी इनके लिए सेवा नहीं।

कुर्सी इनके लिए जिम है।

जहां वे रोज नैतिकता उठाते हैं।

और फर्श पर पटक देते हैं।


इनकी चमड़ी वैज्ञानिक चमत्कार है।

टिप्पणी पड़े तो फिसल जाती है।

आलोचना पड़े तो उछल जाती है।

जवाबदेही आए तो गायब हो जाती है।


बेहया कभी-कभी सोचता है—

“यार, लोग क्या कहेंगे?”

वज्र-बेहया सोचता है—

“लोग कुछ भी कहें,

कुर्सी क्या कहेगी?”


और कुर्सी बेचारा क्या कहे।

वह लकड़ी है।

चुप रहती है।

मगर इतिहास गवाही देता है—

कई बार कुर्सी छोटी नहीं होती।

बैठने वाला बड़ा बेहया निकल आता है।


इसलिए राजनीति का नया सिद्धांत बना है।

योग्यता बाद में।

बेशर्मी पहले।

जो जितना वज्र-बेहया,

उसकी कुर्सी उतनी स्थायी।





जनता देखती है।

हंसती है।

कभी-कभी रो भी लेती है।

फिर चुनाव आता है।

और कहानी फिर से शुरू हो जाती है।


#AprilFoolsDay

सपने छुट्टी पर हैं

 

विजय शंकर पांडेय 


युद्ध शुरू होता है।

पहले बयान आता है।

फिर चेतावनी।

फिर आखिरी चेतावनी।

और फिर… वही पुरानी कहानी।


नेता कहते हैं—रणनीति जरूरी है।

जनता पूछती है—रोटी भी?

जवाब आता है—वो अगली मीटिंग में।


टीवी पर नक्शे चमकते हैं।

लाल तीर दौड़ते हैं।

स्टूडियो में जीत तय हो जाती है।

मैदान में इंसान हार जाता है।


बच्चा लाइन में खड़ा है।

हाथ में कटोरा है।

आंखों में सवाल है।

पर जवाब… कहीं और व्यस्त है।


स्कूल खामोश है।

ब्लैकबोर्ड खाली है।

चॉक घिस चुकी है।

सपने छुट्टी पर हैं।


अस्पताल भरा है।

दवा आधी है।

दर्द पूरा है।

और बजट… भाषण में है।


हर मौत एक आंकड़ा बनती है।

फाइल में फिट हो जाती है।

पर घर में जो सन्नाटा है—

उसका कोई कॉलम नहीं होता।


फिर घोषणा होती है—पुनर्निर्माण!

ताली बजती है।

ठेके निकलते हैं।

और मलबा “मौका” बन जाता है।

आपदा में अवसर।


युद्ध खत्म नहीं होता।

बस नाम बदलता है।

कभी ऑपरेशन।

कभी मिशन।

कभी “शांति प्रक्रिया”।



और इंसान?

वो हर बार वही रहता है—

टूटता हुआ।

छूटता हुआ।

और… भूलता हुआ।


क्योंकि अगला युद्ध

बस अगली हेडलाइन दूर है।