विजय शंकर पांडेय
बकरी गुर्राई।
कसाई मुस्कराया।
चाकू चमका।
कसाई का "धर्म" टस से मस न हुआ।
बकरी बोली—“अन्याय!”
कसाई बोला—“आदेश।”
बकरी मिमियाई।
सत्ता ने कान बंद कर लिया।
यहाँ गुर्राहट से इतिहास नहीं बदलता।
यहाँ खून से सिर्फ फाइलें लाल होती हैं।
विचार नहीं।
सत्ता बड़ा मोह है।
इत्र जैसा।
जितना लगाओ, उतना चिपकता है।
कुर्सी पर बैठते ही
रीढ़ फोल्डिंग हो जाती है।
ज़मीर साइलेंट मोड में।
कल जो भाषण दे रहा था,
आज वही थाली पकड़े खड़ा है।
नमक वही।
स्वाद बदला हुआ।
कसाई कहता है—
“मैं मजबूर हूँ।”
बकरी कहती है—
“मैं बेबस हूँ।”
मजबूरी को नीति बना दिया गया।
बेबस को खबर।
गुर्राने से क्रांति नहीं आती।
तालियों से तानाशाही जाती नहीं।
यहाँ धर्म बदलते हैं पोस्टर में।
नीतियाँ बदलती हैं मौसम में।
और आदमी बदलता है
सत्ता के आईने में।
बकरी फिर गुर्राई।
कसाई फिर हँसा।
चाकू फिर चला।
क्यों
कि
सत्ता का मोह है।
कोई छोह नहीं।
जो बाज आ जाए।

