झूठ थकता क्यों नहीं?

 विजय शंकर पांडेय 



राजनीति में झूठ थकता क्यों नहीं?

क्योंकि सच को दौड़ने की आदत नहीं।


झूठ जिम जाता है।

डाइट पर रहता है।

हर सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है।


सच बेचारा?

वह अभी भी फैक्ट चेक ढूंढ रहा है।


अमेरिका कहता है—

“हम लोकतंत्र बचाने आए हैं।”

जहां-जहां गया,

वहां लोकतंत्र ICU में मिला।


फिर भी आत्मविश्वास कम नहीं।

झूठ का पासपोर्ट स्ट्रॉन्ग है।

वीजा हर जगह मिल जाता है।


भारत के नेता भी प्रेरित हैं।

झूठ को ‘विकास’ कह देते हैं।

वादे को ‘दृष्टि’ कह देते हैं।

यू-टर्न को ‘रणनीति’ कह देते हैं।


जनता सुनती है।

सिर हिलाती है।

फिर अगला चुनाव आ जाता है।


झूठ फिर जवान हो जाता है।

सच फिर बूढ़ा हो जाता है।


टीवी एंकर चिल्लाते हैं।

“सबूत हमारे पास हैं!”

सबूत?

वह विज्ञापन ब्रेक में खो जाते हैं।


राजनीति अब शर्माती नहीं।

ढीठ हो चुकी है।

इतनी ढीठ कि

झूठ बोलकर

ताली भी खुद ही बजा लेती है।


और जनता?

वह महान है।

सब समझती है।

सब देखती है।

फिर भी कहती है—


“चलो, इस बार शायद सच आ जाए।”


झूठ मुस्कुराता है।

कुर्सी पर बैठता है।

और कहता है—


“चिंता मत करो।

मैं पांच साल और टिकाऊ हूं।” 😄

पुरुषों का मायका नहीं होता

 विजय शंकर पांडेय


पुरुषों का कोई मायका नहीं होता।

सच है।

पर छटाँक भर झूठ भी है।


पुरुष का मायका होता है—

चाय की अड़ी।


जहां चार यार मिल जाएं।

और पांचवा उधार लिखवा दे।


वहां कोई माथा नहीं चूमता।

पर पूछता जरूर है—

“क्यों यार, बहुत परेशान लग रहे हो?”


बस वही पूछना ही

माथा चूमने जैसा होता है।


घर में वह पिता है।

ऑफिस में कर्मचारी है।

बैंक में ईएमआई।

और समाज में जिम्मेदारी।


पर चाय की दुकान पर

वह फिर से “किशोरवय” में लौट जाता है।


वहां कोई नहीं पूछता—

बिजली का बिल भरा?

स्कूल की फीस दी?

सिलेंडर आया?


वहां सिर्फ एक सवाल होता है—

“कटिंग या फुल?”


पुरुष का मायका

पुरानी बाइक भी होती है।

जिसे स्टार्ट करते ही

आत्मा स्टार्ट हो जाती है।


कभी-कभी उसका मायका

मोबाइल में सेव

दोस्तों के व्हाट्सऐप संदेशे भी होते हैं।


जहां दिन भर

देश की राजनीति सुधरती है।

क्रिकेट की रणनीति बनती है।

और दुनिया बचाई जाती है।


फिर रात को वही पुरुष

घर लौटता है।


फिर वही जिम्मेदारियां।

फिर वही ईएमआई।

फिर वही पिता-पति का रोल।


पर फर्क इतना होता है—


आज वह

अपने “मायके” से होकर आया है।


दो कप चाय पीकर।

तीन गालियां सुनकर और सुनाकर।

और चार ठहाके लगाकर।


पुरुष रोता यदा कदा ही है।

पर हंसकर

अपना दुख किस्तों में चुका देता है। ☕😄





दिमाग अब भी गुफा में है

 

विजय शंकर पांडेय 


युद्ध शुरू हुआ।

पहले ट्विटर जीता।

फिर टीवी स्टूडियो।

फिर हैशटैगों ने विजय पताका फहराई।


जमीन हँस रही थी।

वह बोली — बेटा, यहाँ मिसाइलें सच में गिरती हैं।


अमेरिका बोला —

हम लोकतंत्र पहुँचा रहे हैं।


इजरायल बोला —

हम सुरक्षा खोज रहे हैं।


ईरान बोला —

हम सम्मान बचा रहे हैं।


और दुनिया बोली —

तेल का भाव कितना हुआ?


युद्ध में सबसे पहले सच मरता है।

उसके बाद तर्क।

फिर इंसान।

फिर उम्मीद।


सोशल मीडिया पर सब जनरल हैं।

सोफे पर बैठे रणनीतिकार।

चाय के कप में विश्व युद्ध।


एक क्लिक में हमला।

एक ट्वीट में विजय।

एक रील में राष्ट्रवाद।


जमीन पर धुआँ है।

आसमान में ड्रोन।

और इंसान के भीतर डर।


लम्हों ने गलती की।

सदियाँ बिल भरेंगी।


नेता बोले —

यह अंतिम युद्ध है।


इतिहास हँसा।

कहा — यह संवाद मैं हजार बार सुन चुका हूँ।


असल दुश्मन कौन है?

किसी को नहीं पता।

फिर भी हथियार तैयार हैं।

बटन चमक रहे हैं।


भविष्य दरवाजे पर खड़ा है।

डरा हुआ।

कह रहा है —

भाइयों, पहले मुझे पहचान तो लो।


लेकिन दुनिया व्यस्त है।

किसी को दुश्मन चाहिए।

किसी को बाजार।

किसी को चुनाव।


और हथियार कंपनियाँ?

वे सबसे शांत हैं।

सबसे खुश भी।


उनके कैलेंडर में हर दिन

युद्धोत्सव है।


सच बड़ा अजीब है।

हम दूसरे को मारते हैं।

असल में खुद को चोट पहुँचाते हैं।


हर हत्या में

थोड़ी आत्म-घृणा होती है।


सभ्यता आगे बढ़ी है।

मिसाइल तेज हुई है।

नफरत सस्ती हुई है।


इंसान चाँद पर पहुँच गया।

पर दिमाग अब भी गुफा में है।


युद्ध चलता रहेगा।

घोषणाएँ

 भी।

विजय के भाषण भी।


और कब्रिस्तान?


वह हमेशा तटस्थ रहता है।

वह सबको जगह देता है।




लेखक चेक-आउट कर गया

विजय शंकर पांडेय 




शायद शंकर मुस्कुरा रहे होंगे—क्योंकि उनका ‘जनअरण्य’ अब भी हमारे आसपास है, और ‘चौरंगी’ की लिफ्ट अब भी ऊपर-नीचे जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि लेखक चेक-आउट कर गया, कहानी अभी भी कमरे में ठहरी है।



सच तो यह है कि क्लासिक उपन्यास 'चौरंगी' एक मरते हुए शहर को श्रद्धांजलि है। 1955 में उच्च न्यायालय के कामकाज पर आधारित थी, उनकी पहली पुस्तक ' कोतो अजानारे।' शंकर को उच्च न्यायालय में प्रवेश कलकत्ता के अंतिम अंग्रेज बैरिस्टर, नोएल फ्रेडरिक बारवेल के साथ एक 'संयोगवश मुलाकात' के माध्यम से मिला था, जिन्होंने उन्हें क्लर्क के रूप में नियुक्त किया था। इसकी सफलता के बाद मणि शंकर मुखर्जी उर्फ शंकर ने अपने दूसरे उपन्यास के लिए विषय-वस्तु की खोज शुरू की थी।


अपनी 60वीं वर्षगांठ मनाते हुए, 1950 के दशक में कलकत्ता के एक विशिष्ट होटल में घटित होने वाली घटनाओं पर आधारित यह क्लासिक उपन्यास एक मरते हुए शहर को श्रद्धांजलि थी।


बांग्ला साहित्य के 93 साल पुराने बरगद शंकर नहीं रहे। मणिशंकर मुखर्जी नाम था, पर पाठकों के दिल में वे सिर्फ “शंकर” थे—जैसे किसी पुराने होटल के रजिस्टर में दर्ज वह नाम, जिसे कोई काट नहीं पाता। 


#anandbazarpatrika के मुताबिक 93 वर्षीय अनुभवी लेखक को कई शारीरिक समस्याओं के चलते पंद्रह दिन पहले अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उस समय वे खाना-पीना बंद कर चुके थे। वे कोमा में थे। शुक्रवार को दोपहर लगभग पौने दो बजे उनका निधन हो गया।


‘चौरंगी’ लिखकर उन्होंने कोलकाता के चमचमाते होटल के झूमरों के नीचे छिपी उदासी दिखा दी थी। आज शायद, वही झूमर आधे झुके होंगे—क्योंकि जिसने उनकी रोशनी का राज खोला, वह चला गया। ‘सीमाबद्ध’ और ‘जनअरण्य’ पर सत्यजित राय ने फिल्में बनाईं, और हम दर्शकों ने समझा कि यह सिर्फ कहानी नहीं, आईना है—जिसमें सूट-बूट पहने महत्वाकांक्षा और जेब में रखी बेचैनी साफ दिखती है।


साहित्य अकादमी पुरस्कार ने उन्हें सम्मानित किया, लेकिन सच यह है कि उन्होंने हमारे समाज को बेनकाब करके पुरस्कृत किया। कॉर्पोरेट दफ्तरों की चाय, होटल की लॉबी, और महानगर की भागती सड़कों पर जो नैतिक दुविधाएँ घूमती थीं, उन्हें उन्होंने शब्द दे दिए।


अब जब वे नहीं हैं, तो शहर वही रहेगा—भीड़ भी, नौकरी भी, प्रमोशन की दौड़ भी। फर्क बस इतना होगा कि उन सबको खामोशी से पढ़ने वाली कलम थम गई है।


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