स्रष्टा और सृष्टि का अंतर मिट रहा

अब आपका गुस्सा भी “डिजिटल एसेट” है, हाथ में ब्रह्मास्त्र, दिमाग में फितूर

#विजय_शंकर_पांडेय


आज के युग में ज्ञान बहुत सस्ता हो गया है। इतना सस्ता कि हर दूसरा आदमी रील देखकर तीन मिनट में भू-राजनीति, क्वांटम फिजिक्स और अध्यात्म सामान्य तौर पर समझ लेता है। सूचनाओं का ऐसा अंबार है कि आदमी को अपने पड़ोसी का जन्मदिन भले याद न हो, लेकिन मंगल ग्रह का तापमान पता है। ज्ञान कहता है— “सब कुछ संभव है।” विवेक बेचारा कोने में बैठकर पूछता है— “लेकिन भाई, करना भी चाहिए क्या?” 



आज लोग टर्म ऐंड कंडीशन पढ़े बिना आत्मा तक स्वीकार कर लेते हैं। और फिर कहते हैं—प्राइवेसी खतरे में है! हर जेब में स्मार्टफोन है, लेकिन बातचीत अब भी मूर्खतापूर्ण है। गूगल के पास हर सवाल का जवाब है, बस “चुप कब रहना है” इसका ऑप्शन अभी बीटा वर्जन में है। पहले लोग तपस्या करके ज्ञान पाते थे। अब लोग वाईफाई  पकड़कर ज्ञानी बन जाते हैं। एक सज्जन तो सुबह योगा पर मोटिवेशनल पोस्ट डालते हैं, और दोपहर में ट्रोलिंग करके चार लोगों का रक्तचाप बढ़ा देते हैं। असल संकट सूचना की कमी नहीं, शून्य की कमी है। वह खाली जगह, जहां आदमी थोड़ा रुककर सोच सके—“जो मैं जानता हूं, क्या उसे समझता भी हूं?” वरना आजकल ज्ञान बढ़ रहा है, और बुद्धि स्टोरेज फुल दिखा रही है।


इंसान पहले पत्थर घिसता था, अब प्रॉम्प्ट घिस रहा है। पहले आग खोजी थी, अब “एआई जेनरेटेड” ज्ञान खोज रहा है। ऋषि-मुनि जंगल में ध्यान लगाते थे, आजकल लोग चैटजीपीटी से पूछते हैं— “गुरुजी, आत्मा क्या है? और साथ में एक एचडी फोटो भी बना दो।” हर आदमी अपनी चेतना का डिजिटल जुड़वा बना रहा है। किसी का एआई प्रेम पत्र लिख रहा है, किसी का एआई इश्क के हुनर सीखा रहा, और कुछ महानुभावों का एआई इस्तीफा भी लिख देता है— बस नौकरी छोड़ने की हिम्मत अभी इंसान को खुद करनी पड़ती है। दार्शनिक चिंतित हैं— “स्रष्टा और सृष्टि का अंतर मिट रहा है!” 

उधर कॉर्पोरेट वाले खुश हैं— “बहुत बढ़िया! अब कर्मचारी भी मशीन, और मशीन भी कर्मचारी!” एक बाबा ने तो नया कोर्स निकाल दिया— “डिजिटल मोक्ष विद कृत्रिम कुंडलिनी।” फीस मात्र 51 हजार। साथ में फ्री ई-बुक— “आत्मज्ञान इन 30 सेकंड।” सब ओर डेटा का शोर है। एल्गोरिद्म चीख रहे हैं। नोटिफिकेशन बरस रहे हैं। और भीतर बैठा मौलिक मौन धीरे से पूछ रहा है— “बेटा, तू चेतना बढ़ा रहा है या बस वाईफाई?” यहीं से शुरू होता है चेतना का विद्रोह— जब आदमी पहली बार मोबाइल बंद करके खुद से मिलने की कोशिश करता है।


इंसान ने कमाल कर दिया है। जेब में ऐसी मशीन रख ली है, जिससे पूरी दुनिया चल सकती है। बस दिक्कत इतनी है कि उसी मशीन से वह दिनभर रील भी देख रहा है। हम ईश्वरीय सामर्थ्य वाले उपकरण बना रहे हैं। AI  नॉवेल लिख रहा है, रोबोट सर्जरी कर रहा है, ड्रोन युद्ध लड़ रहे हैं। और इंसान? अब भी “रिप्लाई आल” दबाकर ऑफिस में महाभारत करा देता है। तकनीक आसमान छू रही है, लेकिन संयम अब भी जमीन पर पड़ा नेटवर्क ढूंढ रहा है। 


एक वैज्ञानिक बोला— “हमने ऐसी मशीन बनाई है जो मानवता बदल देगी!” उधर निवेशक बोला— “बहुत बढ़िया। इससे विज्ञापन कितने बेचेंगे?” सभ्यता बड़ी अजीब जगह पहुंच गई है। परमाणु शक्ति भी है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी, लेकिन ट्रैफिक में हॉर्न बजाते समय आदिमानव वाली आत्मा जाग जाती है। तकनीक भविष्य का ढांचा बना सकती है, लेकिन उसमें प्राण फूंकने का काम अब भी चेतना को ही करना है। वरना होगा यह कि मशीनें सुपरइंटेलिजेंट होंगी और उन्हें चलाने वाले लोग पासवर्ड में “1234” डाल रहे होंगे। असल खतरा AI नहीं है। खतरा वह इंसान है जिसके हाथ में ब्रह्मास्त्र है और दिमाग में कमेंट सेक्शन।


आप जितना चिल्लाएंगे, उतना प्लेटफॉर्म कमाएगा


पहले जमाने में व्यापारी नमक बेचते थे। अब कंपनियां गुस्सा बेचती हैं। सोशल मीडिया का नया सिद्धांत है— “आप खुश हैं? तो आप बेकार यूज़र हैं।” फ्रांसेस हॉगन ने बताया कि एल्गोरिद्म वही दिखाते हैं जिससे लोग लड़ें, भड़कें और टूट जाएं। क्योंकि प्यार में लोग स्क्रोल कम करते हैं, लेकिन नफरत में पूरी रात जागते हैं। अब आपका गुस्सा भी “डिजिटल एसेट” है। आप जितना चिल्लाएंगे, उतना प्लेटफॉर्म कमाएगा। 


एक आदमी ने लिखा— “आज मौसम अच्छा है।” पोस्ट पर दो लाइक आए। दूसरे ने लिखा—“देश खतरे में है!” तीन लाख शेयर, चार टीवी डिबेट, और पांच राजनीतिक पार्टियों का टिकट। एल्गोरिद्म बड़ा संवेदनशील जीव है। उसे आपकी उदासी, डर, असुरक्षा सब समझ आती है। बस इंसानियत समझने का फीचर अभी डेवलपमेंट में है। पहले मां कहती थी— “बेटा, गुस्सा मत किया करो।” अब ऐप कहता है— “भाई, थोड़ा और भड़क जाओ, इंगेजमेंट गिर रहा है।” दुनिया में अब भावनाएं महसूस नहीं की जातीं, मापी जाती हैं। क्रोध = रीच। नफरत = मोनेटाइजेशन। और विवेक? वह शायद “कम्युनिटी गाईडलाइन” पढ़ते-पढ़ते कहीं सो गया है।


भाई, इससे पड़ोसी की नौकरी कैसे खा सकते हैं?


तकनीक बेचारा निर्दोष है। उसने कब कहा था— “मुझे बनाओ और फिर नैतिकता को छुट्टी पर भेज दो!” समस्या यह है कि हमारे मोबाइल का सॉफ्टवेयर हर हफ्ते अपडेट हो जाता है, लेकिन दिमाग अब भी “संस्करण 1.0” पर अटका है। चैटजीपीटी दो महीने में 10 करोड़ लोगों तक पहुंच गया। उधर नैतिकता समिति अभी तक पहली मीटिंग का व्हाट्सऐप ग्रुप ही बना रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पूछ रहा है— “मैं मानवता की कैसे सेवा करूं?” और इंसान पूछ रहा है— “भाई, इससे पड़ोसी की नौकरी कैसे खा सकते हैं?” 

पहले लोग चरित्र निर्माण करते थे। अब “प्रोफाइल निर्माण” करते हैं। बायो में लिखा है— सहानुभूतिपूर्ण | दूरदर्शी | मानवता को प्राथमिकता देने वाला और नीचे कमेंट— “भाई, उसको बेरोजगार करवा दो।” मशीनें रातोंरात अपग्रेड हो रही हैं। कल तक एआई स्क्रिप्ट लिखता था, आज फिल्म बना रहा है। कल शायद संसद भी चला ले। वैसे फर्क किसी को पता भी नहीं चलेगा। मानव चरित्र बेचारा धीमा है। उसे अपडेट होने में पीढ़ियां लगती हैं। क्योंकि उसके सर्वर पर अहंकार, लालच और पाखंड का भारी लोड है। दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भाग रही है, और नेचुरल कॉमन सेंस अब लुप्तप्राय प्रजाति घोषित होने वाला है।


साभार #नेशनल_व्हील्स #प्रयागराज

बंगाल में दिमाग भी साथ लाना पड़ता है

दुर्गा पूजा में अंजलि दोगे या सिर्फ सेल्फी लोगे?

विजय शंकर पांडेय


बंगाल में सिर्फ़ गला फाड़ने से काम नहीं चलता—यहाँ दिमाग भी साथ लाना पड़ता है। बंगाल चुनाव आते ही बाहरी नेताओं को अचानक लगता है कि हुगली के किनारे भी वही फार्मूला चलेगा, जो साबरमती के किनारे चला था। बस माइक उठाओ, आवाज़ दो डेसिबल और बढ़ाओ, दो-चार तुकबंदी वाली बजबजाते जुमले फेंको और समझ लो जनता “वाह साहब! क्या मास्टर स्ट्रोक है” कहकर वोट डालने दौड़ पड़ेगी। 

उन्हें लगता है कि बंगाल भी कोई विशाल व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का एक्सटेंशन सेंटर है, जहाँ जितनी ज़ोर से बोलो, उतनी जल्दी सत्य प्रमाणित हो जाता है। लेकिन बंगाल बेचारा हर बार चश्मा ठीक करते हुए पूछता है—“भाषण खत्म हुआ? अब कुछ विचार भी हैं, या सिर्फ़ वॉल्यूम ही लाए हैं?” 

यह वही बंगाल है जहाँ चैतन्य ने भक्ति दी, रवींद्रनाथ ने कविता दी, नज़रुल ने विद्रोह दिया, और विवेकानंद ने विचार दिया। वहाँ अगर आप टपोरी स्टाइल में “करारा हमला” बेचने आएँगे, तो जनता उसे भाषण नहीं, लोकल ट्रेन का झगड़ा समझेगी। नोएडा मीडिया उधर स्टूडियो में चिल्लाता है—“क्या मास्टरस्ट्रोक है!” और बंगाल इधर चाय की चुस्की लेकर कहता है—“भाई, यह स्ट्रोक कम, शोर ज़्यादा लग रहा है।” 


पहले संस्कृति से एनओसी लेनी पड़ती है

बाकी भारत में नेता जनता से वोट मांगते हैं, बंगाल में पहले संस्कृति से एनओसी लेनी पड़ती है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में इस बार विकास, रोजगार और सड़क-पानी जैसे मुद्दे कम ही चर्चा में आए। हां, आप कितने छटाक बंगाली हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढते ज्यादातर भाजपा नेता नजर आए। 

इससे पहले कांग्रेस हो, वामपंथी हो या फिर कांग्रेस से ही निकला तृणमूल हो, कभी इस तरह की अग्निपरीक्षा से किसी को नहीं गुजरना पड़ा। भाजपा नेता मंच पर पहुंचते ही पहले भाषण नहीं, पहचान पत्र निकालते दिख रहे हैं—देखिए, हमने भी आज माछ-भात खाया है, रसोगोल्ला भी बिना चम्मच के खाया है, और कोलकाता’ को ‘कलकत्ता’ नहीं बोलते! 

मुख्यमंत्री पद का चेहरा पूछो तो जवाब आता है—चेहरा पूरी तरह बंगाली होगा, बस अभी वॉशिंग मशीन में है, निकलते ही दिखा देंगे। उधर विरोधी पूछ रहे हैं—दुर्गा पूजा में अंजलि दोगे या सिर्फ सेल्फी लोगे? भाषा पर हालत यह है कि हर नेता “आमार सोनार बांग्ला” बोलते-बोलते “वंदे मातरम्” पर सुरक्षित लैंडिंग कर रहा है। धोती-कुर्ता पहनकर फोटोशूट हो रहे हैं, लेकिन बैठते समय सबको डर—कहीं प्लीट्स से राष्ट्रवाद बाहर न गिर जाए। बंगाल ने साफ कर दिया है—यहां सिर्फ चुनाव जीतना काफी नहीं, पहले पड़ोस की काकी को यह भरोसा दिलाना पड़ता है कि तुम सच में “बांग्लार मानुष” हो। 


ये चुनाव है या फिश फेस्टिवल

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुद्दे कम और मछलियाँ ज़्यादा तैर रही थी। चुनावी सभाओं में अब रोजगार, शिक्षा और सड़क से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि कौन कितनी मछली खाता है और किस भाव से खाता है। मानो विधानसभा नहीं, “राष्ट्रीय मत्स्य संसद” का चुनाव हो रहा हो। इसी बीच भाजपा सांसद रवि किशन ने बड़े प्रेम से जनता को आश्वस्त किया—4 मई के बाद चार गुना ज्यादा मछली खाइए, चिंता मत करिए! जनता भी सोच में पड़ गई कि ये चुनाव है या फिश फेस्टिवल का उद्घाटन? अब लोग राशन कार्ड नहीं, फिश कार्ड बनवाने की सोच रहे हैं।

टीएमसी ने भी शायद मन ही मन तय कर लिया होगा कि अगला घोषणा पत्र “मां, माटी, मानुष” नहीं, “माछ, भात, मतदान” पर बनेगा। उधर विपक्ष पूछ रहा है—सर, महंगाई? जवाब आता है—“पहले बताइए, हिलसा पसंद है या रोहू? बंगाल की राजनीति ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में मुद्दे तैरते रहते हैं—बस कभी-कभी वे पानी से निकलकर कड़ाही में पहुंच जाते हैं। जनता वोट डालेगी या कांटा, यह देखने लायक होगा।


महिला सशक्तिकरण का असली फॉर्मूला

राजनीति की विडंबना देखिए—जब ममता बनर्जी जैसी महिला नेता सत्ता में होती हैं, तो अचानक पूरा नैरेटिव बदल जाता है। तब महिला सशक्तिकरण घास छिलने चला जाता है, “पॉलिटिकल टारगेटिंग” शुरू हो जाती है। इस बार के चुनाव में ईडी से लेकर बाकी जांच एजेंसियां पश्चिम बंगाल में ऐसे दौड़ लगाई, जैसे चुनाव नहीं, वर्ल्ड कप का फाइनल चल रहा हो। 


छापेमारी की स्पीड देखकर लगता है कि देश की असली जीडीपी इसी के बूते मापी जानी चाहिए। जनता सोचती है—“यह चुनाव है या भारत पाकिस्तान युद्ध?” और सत्ता कहती है—“नहीं नहीं, यह तो सिर्फ पारदर्शिता है!” उधर आज्ञाकारी चुनाव आयोग के महारथी पहले ही मैदान सेट कर चुके होते हैं। नियम ऐसे लागू होते हैं जैसे किसी रियलिटी शो में जज पहले से विजेता तय कर चुके हों। 


महिला सशक्तिकरण का असली फॉर्मूला कुछ यूं है, पहले महिला को देवी बनाओ, फिर ऊंचे आसन पर बैठाओ, फिर कहो—“आप इतनी पवित्र हैं कि राजनीति की गंदगी में क्यों उतरेंगी?” और अगर कोई महिला खुद उतर जाए—तो फिर पूरा सिस्टम उसे याद दिलाता है कि “देवी का काम मंदिर में अच्छा लगता है, संसद विधानसभा में नहीं।” 




आजादी के बाद का सबसे शुद्ध प्रेम-प्रकरण है

अरे भाई, बंगाल में वोट पड़ रहे हैं तो बस सीएम पद का फैसला नहीं, सीधे दिल्ली का सिंहासन भी तय होना है! जीत गए तो मोदी जी के उत्तराधिकारी, हार गए तो... अरे, 2029 से पहले ही भाजपा को “रिटायरमेंट” का फॉर्म भरवा दिया जाएगा। ममता दीदी खड़ी हैं – एक तरफ हौसले का पहाड़, दूसरी तरफ “दुनिया का सबसे ईमानदार चुनाव आयोग”, जिसकी ईमानदारी देखकर ईवीएम भी शर्म से लाल हो जाता है। एक तरफ अपार धन, नफरत की फैक्ट्री और सिस्टम का पूरा रिमोट कंट्रोल। 


दूसरी तरफ– माँ काली के सच्चे भक्त, हाथ में त्रिशूल, मुंह में “अभी नहीं तो कभी नहीं” का मंत्र। दीदी का नारा है, “आओ, लड़ो, हारो, फिर भी हम जीतेंगे!” भाजपा का “कमल खिलाओ अभियान!” सचमुच, यह चुनाव आजादी के बाद का सबसे शुद्ध प्रेम-प्रकरण है – जहां एक तरफ बेशर्मी का बाजार गर्म है, दूसरी तरफ योद्धाओं का सैलाब। हार-जीत कुछ भी हो, एक बात पक्की, 2029 में अगर भाजपा बंगाल से बाहर हुई तो दिल्ली का ताज पर संकट गहरा सकता है। जय माँ काली! जय इलेक्शन कमीशन! दोनों की जय हो, बस थोड़ी-सी ईमानदारी मिल जाए तो काफी है।


अच्छे दिन आएंगे, बस तारीख कन्फर्म नहीं

देश में एक नया ट्रेंड चल पड़ा है—“बेचारा कौन?” प्रतियोगिता। बंगाल में चुनाव है। दावा किया जा रहा है कि बंगाल में हिंदू बेचारे हैं, तो कोई जवाब देता है कि पूरे देश में ही आम आदमी बेचारा है—धर्म बाद में, जेब पहले रोती है। बंगाल में अगर कोई कहे कि “मुसलमान फैल रहे हैं”, तो बाकी देश से आवाज आती है—“भाई, यहां तो महंगाई फैल रही है!” उधर कोई “दबंगई” का मुद्दा उठाए, तो इधर सिलेंडर के दाम इतने दबंग हो गए हैं कि रसोई में घुसते ही आम आदमी सलाम ठोक देता है। 


नौकरी का हाल ये है कि डिग्री दीवार पर टंगी है और आदमी खुद ठेके पर। 12 घंटे की ड्यूटी के बाद 10-12 हजार की सैलरी मिलती है, जैसे कोई लॉटरी लग गई हो। और फिर भी उम्मीद यही—“अच्छे दिन आएंगे”, बस तारीख कन्फर्म नहीं है। मजेदार बात ये है कि हर कोई “अपना-अपना दुख” लेकर बैठा है। बंगाल वाला कहता है, “हम पीड़ित हैं”, बाकी देश वाला कहता है, “भाई, लाइन में लगो।” असल सच्चाई ये है कि धर्म के नाम पर बहस करते-करते हम सबकी कॉमन प्रॉब्लम—महंगाई, बेरोजगारी और थकान—VIP एंट्री लेकर पीछे से निकल जाती है। और हम? अभी भी तय कर रहे हैं—“बेचारा आखिर है कौन?”









जैसे कोई हॉरर फिल्म चल रही हो

 विजय शंकर पांडेय 


वाराणसी में बिजली अब सिर्फ चमकती नहीं है, मौके बेमौके मजाक भी करती है। "अमर उजाला" की खबर पढ़कर लगा कि वाराणसी में बिजली का स्मार्ट मीटर नहीं, कोई स्टैंडअप कॉमेडियन अपनी कलाबाजी दिखा रहा है। 


यहां उपभोक्ता का बिल माइनस में चला जाए तो भी यूपीपीसीएल का मैसेज आता है—“समय से जमा नहीं किया तो कनेक्शन काट देंगे।” मतलब आप कंपनी को पैसा दे रहे हों या कंपनी आपको—डांट हमेशा आपके ही हिस्से में है!  


सोलर लगवाने वालों ने सोचा था कि सूरज से दोस्ती कर लेंगे, लेकिन यूपीपीसीएल ने बता दिया—“दोस्ती हमारी चलेगी, सूरज की नहीं।” सरप्लस बिजली ऐसे उठा ली, जैसे मोहल्ले का दबंग आपके घर की छत से पतंग भी बिना पूछे ले जाए, और बदले में दो रुपये थमा दे—“लो भाई, मेहनताना, झालमुड़ी भी दस के भाव है, कम से कम टॉफी ही खा लेना!” विडंबना यह है कि इसकी भनक तक नहीं लगने दी जाती उपभोक्ताओं को।


अब आप सोलर लगवाने का जो अपराध किए हैं, उसके एवज में बैंक का लोन भी चुकाइए और बिजली का बिल भी। 


ऊपर से पोस्टपेड से प्रीपेड का ऐसा परिवर्तन हुआ जैसे लोकतंत्र से सीधे “लॉटरी तंत्र” में एंट्री। आधी रात को SMS आता है—“रिचार्ज करो वरना अंधेरा कायम हो जाएगा!” आम आदमी घबराकर मोबाइल ढूंढता है, जैसे कोई हॉरर फिल्म चल रही हो। 


कुल मिलाकर वाराणसी में बिजली नहीं, किस्मत जल रही है—और बिल? वो तो बस कॉमेडी का पंचलाइन बन चुका है!


अंधेर नगरी में पहले तो एकमुश्त थोक के भाव में बिना किसी अनुमति के उपभोक्ताओं को पोस्टपेड से प्रीपेड में कन्वर्ट कर दिया गया। अब कहा जा रहा है कि प्री-पेड अनिवार्य नहीं है। अब इनमें जो प्रीपेड का सरदर्द नहीं पालना चाहते, वे कब पोस्टपेड में तब्दील होंगे? किसकी चिरौरी विनती करनी होगी?


पोस्टपेड इसलिए जरूरी है कि निर्धारित तिथि पर बिल जमा करने की सहूलियत रहे। प्रीपेड में चिरकूट की तरह कभी भी, यहां तक कि आधी रात गए भी एसएमएस टपक जाता है। 


बिजली विभाग बिल का प्रारूप ऐसा बनाया है‌ कि उसे पढ़ने समझने के लिए कोचिंग सेंटर ज्वाइन करना पड़ेगा।


आम लोग पाई पाई जोड़ कर किसी तरह जीवन गुजार रहे हैं। नेताओं और अफसरों की तरह उनकी आमदनी के कई स्रोत नहीं है।  


कुछ तो रहम कीजिए.....








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तभी लोकतंत्र के रिमोट से किसी ने म्यूट बटन दबा दिया

 विजय शंकर पांडेय


देश की सबसे बड़ी पंचायत में इस बार नया नियम लागू हुआ है— बोलना मना है, समझना वैकल्पिक है, और मान लेना अनिवार्य है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों तैयार थे। विपक्ष फाइल लेकर आया था, सत्ता पक्ष भी जवाब लेकर। जनता उम्मीद लेकर बैठी थी— आज कुछ तो सुना जाएगा! लेकिन तभी लोकतंत्र के रिमोट से किसी ने म्यूट बटन दबा दिया। विपक्ष बोला—हम चर्चा चाहते हैं! जवाब आया—हमने उचित विचार-विमर्श कर लिया है। विपक्ष फिर बोला—लेकिन हमें भी तो बोलने दें! जवाब मिला—आपके विचार हम पहले ही समझ चुके हैं, अब उसे सुनने की ज़रूरत नहीं। 


लोकसभा में ओम बिरला और राज्यसभा में सीपी राधाकृष्णनन ने बड़ी शालीनता से कहा— बहस नहीं होगी, क्योंकि हमने पहले ही बहस कर ली है… अपने-अपने दिमाग में। यह सुनकर लोकतंत्र थोड़ा चौंका— अच्छा! अब बहस भी इन-हाउस हो गई? उधर विपक्ष के पास लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 हस्ताक्षर थे। मतलब संख्या पूरी थी, मौका अधूरा रह गया। जैसे शादी में बारात पूरी आ जाए, लेकिन दूल्हे से कहा जाए— फेरे हमने सोच लिए हैं, आप बस मिठाई खा लीजिए। प्रस्ताव था—मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने का। मुद्दा बड़ा था, सवाल गंभीर थे, लेकिन समाधान सरल निकला—चर्चा ही मत होने दो। क्योंकि अगर चर्चा होगी, तो सवाल उठेंगे। सवाल उठेंगे, तो जवाब देने पड़ेंगे। और जवाब देने पड़ेंगे, तो कहीं भरोसा भी बन सकता है— जो कि इस समय सबसे अनावश्यक चीज़ लग रही है।


जनता टीवी पर बैठी सोच रही थी— अरे! ये वही संसद है न, जहाँ कभी बहस हुआ करती थी? अब तो लगता है— संसद नहीं, साइलेंट मोड में चल रही मीटिंग है। विपक्ष के नेता बोले— हमें बोलने का मौका चाहिए! सत्ता पक्ष ने मुस्कुराकर कहा— आपकी भावना हम तक पहुँच गई है, अब शब्दों की क्या ज़रूरत? यह नया लोकतांत्रिक मॉडल है— जहाँ संवाद की जगह सारांश चल रहा है। जनता के मन में जो शक था, वो अब थोड़ा और मजबूत हो गया। क्योंकि जब सवाल पूछने की इजाज़त नहीं मिलती, तो लोग जवाब खुद बना लेते हैं— और वही सबसे खतरनाक होते हैं।


अगर सब ठीक है, तो बोलने में डर कैसा है?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ, निर्वाचन आयोग की सफाई, और अब संसद की चुप्पी— तीनों मिलकर एक नया नैरेटिव बना रहे हैं— अगर सब ठीक है, तो बोलने में डर कैसा है? लोकतंत्र अब सोच रहा है— मुझे बचाने के लिए बहस जरूरी थी, अब मुझे बचाने के लिए चुप्पी जरूरी हो गई? अंत में जनता ने टीवी बंद किया और कहा— लगता है अगली बार वोट डालने से पहले हमें यह भी पूछना पड़ेगा— वोट डालें या सीधे मान लें कि सब ठीक है? और संसद के गलियारों में कहीं एक धीमी आवाज गूंजी— बहस होती तो रिकॉर्ड बनता… अब सिर्फ रिकार्डेड साइलेंस है। 


लोकतंत्र में अब चुनाव नहीं हो रहा, “संदेह उत्सव” मनाया जा रहा है। पहले लोग वोट डालते थे, अब शक डालते हैं—और वह भी पूरे आत्मविश्वास के साथ। पहले सवाल होता था—किसे वोट दें? अब सवाल है—वोट जाएगा भी या बीच रास्ते में ही ‘लापता’ तो नहीं हो जाएगा? निर्वाचन आयोग बेचारा अब सिर्फ चुनाव नहीं कराता, वह लोगों के मन से शक हटाने की कोशिश भी करता है। लेकिन समस्या यह है कि शक अब वायरल कंटेंट बन चुका है—एक बार फैल गया तो हर मोबाइल में अपना घर बना लेता है। 


पश्चिम बंगाल का माहौल तो जैसे चुनाव से पहले ही ‘थ्रिलर फिल्म’ बन चुका है। हर गली में सस्पेंस, हर चौक पर क्लाइमेक्स। और मालदा के कलियाचक में तो लोकतंत्र ने खुद को रियलिटी शो में बदल लिया—जहाँ न्यायिक अधिकारी दस घंटे तक “कैद में लोकतंत्र” एपिसोड का हिस्सा बने रहे। भीड़ भी कमाल की थी—महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग—सब शामिल। ऐसा लग रहा था जैसे कोई त्योहार हो। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां प्रसाद की जगह आक्रोश बांटा जा रहा था।


संदेह अब लोकतंत्र का नया ईंधन बन चुका है

कोई पूछे—आप क्यों आए हैं? जवाब मिला, हमें भी नहीं पता, लेकिन माहौल गरम है, तो हम भी गरम हैं। आजकल भीड़ का अपना तर्क है— अगर हम गुस्से में नहीं होंगे, तो हमें सीरियस कौन लेगा? और नेताओं का तर्क उससे भी सरल— अगर जनता गुस्से में है, तो उसे थोड़ा और गुस्सा दिलाना हमारा कर्तव्य है। संदेह अब लोकतंत्र का नया ईंधन बन चुका है। बिना इसके चुनाव का इंजन स्टार्ट ही नहीं होता। कोई कहता है—सूची में नाम नहीं है। कोई कहता है—नाम है, पर भरोसा नहीं है।

और कुछ लोग तो इतने उन्नत हो चुके हैं कि कहते हैं—हमें खुद पर ही भरोसा नहीं है, वोट पर क्या भरोसा करें! इस पूरे ड्रामे में न्यायिक अधिकारी सबसे दिलचस्प किरदार बन गए हैं— वे फाइल लेकर आए थे, और ‘बंधक अनुभव’ लेकर लौटे।


सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई—और जतानी भी चाहिए थी। लेकिन कोर्ट भी शायद सोच रहा होगा— हम फैसला सुनाएं या पहले जनता के संदेह का इलाज करें? असल समस्या यही है—चुनाव प्रक्रिया से ज्यादा लोगों के मन की प्रक्रिया बिगड़ गई है। जहाँ भरोसा होना चाहिए था, वहाँ शक है। जहाँ धैर्य होना चाहिए था, वहाँ भीड़ है। और जहाँ संवाद होना चाहिए था, वहाँ नारे हैं। लोकतंत्र अब वोट से नहीं, वायरल वीडियो से प्रभावित होता है।


आखिर में जनता भी कन्फ्यूज है

जिसका वीडियो ज्यादा चला, उसका नैरेटिव सही माना जाता है। आखिर में जनता भी कन्फ्यूज है— हम वोटर हैं, दर्शक हैं, या इस पूरे शो के एक्स्ट्रा कलाकार? और लोकतंत्र चुपचाप कोने में बैठा सोच रहा है—मुझे बचाने के लिए चुनाव कराए जाते थे, अब चुनाव बचाने के लिए मुझे ही बचाना पड़ रहा है। कहानी का नैतिक संदेश बहुत सीधा है— जब भरोसा गायब हो जाता है, तो लोकतंत्र भीड़ के भरोसे चलने लगता है… और भीड़ का भरोसा—आप जानते ही हैं— हर पाँच मिनट में अपडेट हो जाता है!


देश में दो तरह के आयोग सक्रिय हैं— एक है निर्वाचन आयोग। और दूसरा है जनता का संदेह आयोग। पहला चुनाव कराता है, दूसरा चुनाव पर शक कराता है। अब समस्या यह है कि दूसरा आयोग ज्यादा लोकप्रिय हो गया है। उसके पास न दफ्तर है, न कर्मचारी— फिर भी उसकी पहुँच हर गली, हर मोबाइल और हर चाय की दुकान तक है। निर्वाचन आयोग ने सोचा—चलो सुधार करते हैं। और देखते ही देखते पश्चिम बंगाल के 480 अफसरों का तबादला कर दिया। ऐसा लगा जैसे चुनाव नहीं, म्यूजिकल चेयर का फाइनल राउंड चल रहा हो।


अफसर भी कन्फ्यूज— हम ड्यूटी पर हैं या ट्रांसफर की रिहर्सल में? ऊपर से आया आदेश—निष्पक्ष रहो। नीचे से आया सवाल—सर, पहले पता तो हो हम हैं कहाँ? फिर आया विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात SIR। नाम सुनकर लगा जैसे कोई सुपरहीरो एंट्री कर रहा हो— मैं हूँ SIR, सब ठीक कर दूँगा! लेकिन SIR के आते ही 10 लाख आपत्तियाँ आ गईं। इतनी आपत्तियाँ कि खुद आपत्तियाँ भी सोचने लगीं—हम ज़्यादा तो नहीं हो गईं? अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा—जल्दी निपटाओ। तो निपटाया गया—इतनी तेजी से कि कुछ आपत्तियाँ समझ ही नहीं पाईं कि उन्हें सुना गया या सिर्फ स्क्रॉल किया गया।


निष्पक्षता अब सिद्धांत नहीं, कस्टमाइज्ड सर्विस

निष्पक्षता अब भारत में कोई सिद्धांत नहीं, एक कस्टमाइज्ड सर्विस बन चुकी है—आपकी ज़रूरत के हिसाब से निष्पक्षता। पश्चिम बंगाल में भारतीय चुनाव आयोग ने पूरा प्रशासन बदल दिया—जैसे घर में मेहमान आने वाले हों और अचानक सफाई अभियान चल पड़े। कुर्सियाँ बदलो, टेबल बदलो, माहौल बदलो… ताकि निष्पक्षता चमकती हुई दिखे। वहीं असम में सब कुछ वैसा ही है। यहाँ निष्पक्षता छुट्टी पर है, शायद ब्रह्मपुत्र किनारे चाय पी रही है। हिमंता बिस्वा सरमा के साथ सेटिंग इतनी आरामदायक है कि आयोग को लगा—यहाँ सब ठीक ही होगा, क्यों बेवजह मेहनत करें? 


अब निष्पक्षता भी क्षेत्रीय भाषा समझने लगी है। बंगाल में वो सख्त अफसर बन जाती है—सब बदल दो! और असम में दोस्ताना अंदाज़—आप जैसे हैं, वैसे ही बढ़िया हैं। जनता भी कन्फ्यूज है—निष्पक्षता का ट्रांसफर ऑर्डर आया क्या? कोई कहता है—भाई, ये वन नेशन, वन निष्पक्षता’ नहीं है, ये वन स्टेट, वन स्टाइल है। आखिरकार लोकतंत्र में सब बराबर हैं… बस कुछ लोग ज़्यादा बराबर हैं!


नतीजा— काम पूरा हुआ, पर भरोसा अधूरा रह गया। जनता ने देखा— इतनी जल्दी? जरूर कुछ गड़बड़ है! और फिर शुरू हुआ साज़िशाना कहानियों का सीज़न 2। कोई बोला—सूची में नाम गायब है। दूसरा बोला—नाम है, पर भरोसा गायब है। तीसरा बोला—दोनों हैं, पर सिस्टम पर भरोसा नहीं है। अब राजनीतिक गुटों के लिए यह माहौल वैसा ही है जैसे सूखी घास में चिंगारी। बस एक बयान दो, और आग अपने आप फैल जाती है।


हर सफाई, एक नई शंका पैदा कर रही

नेता बोले— हम जनता की भावनाओं का सम्मान करते हैं। मतलब— जहाँ शक है, वहाँ थोड़ा और शक डालो। इस पूरे ड्रामे में सबसे दिलचस्प किरदार फिर वही—निर्वाचन आयोग। वह बार-बार कहता है— हमने सब नियमों के अनुसार किया। जनता जवाब देती है— हमें नियम नहीं, भरोसा चाहिए। सुप्रीम कोर्ट बीच में आता है, नाराजगी जताता है, टिप्पणी करता है— पर जनता का संदेह इतना जिद्दी है कि वह कहता है— कोर्ट भी आ गया, अब कहानी और पक्की लग रही है! यानी स्थिति यह है कि हर सफाई, एक नई शंका पैदा कर रही है। लोकतंत्र अब प्रक्रिया से नहीं, परसेप्शन से चलता है। और परसेप्शन वही बनाता है जिसकी कहानी ज्यादा मजेदार हो।


आखिर में सवाल वही— चुनाव निष्पक्ष है या नहीं? शायद है। शायद नहीं भी। लेकिन असली संकट यह है कि अब किसी को “शायद” पर भरोसा नहीं। लोकतंत्र को बचाने के लिए अब सिर्फ वोटिंग मशीन नहीं, ट्रस्ट मशीन भी चाहिए— जो हर वोट के साथ एक भरोसा भी डाले। वरना अगली बार निर्वाचन आयोग प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगा, और जनता पूछेगी— सर, चुनाव कब हैं? और साथ ही—और इस बार शक का रिजल्ट कब आएगा?



साभार - #नेशनल_व्हील्स #प्रयागराज 


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