लोकतांत्रिक हवा

 

विजय शंकर पांडेय 


दिल्ली की हवा अब हवा नहीं रही।

वो एक सरकारी फाइल है।

जिसमें हर सांस की एंट्री है।


सुबह उठते ही योग नहीं होता।

पहले एक्चेयूआई चेक होता है।

“आज जिंदा रहने की संभावना कितनी है?”


यहां लोग छाता नहीं,

मास्क लेकर निकलते हैं।

धूप से नहीं,

हवा से बचने के लिए।


दिल्ली की हवा लोकतांत्रिक है।

अमीर-गरीब में भेद नहीं करती।

सबको बराबर खांसने का हक देती है।


यहां सांस लेना भी

लक्ज़री हो गया है।

एसी के साथ।

हेपा फ़िल्टर के साथ।

और ईएमआई के साथ।


बच्चे ड्रॉइंग में

पेड़ नहीं बनाते।

चिमनी बनाते हैं।

उसे “विकास” कहते हैं।


डॉक्टर अब नाड़ी नहीं देखते।

एक्यूआई देखते हैं।

फिर कहते हैं—

“दिल्ली छोड़ दीजिए।”


सरकारें समाधान नहीं देतीं।

वे कैलेंडर देती हैं।

आज ऑड-ईवन।

कल सम-विषम।

परसों बहाना।


पराली हर साल जलती है।

जिम्मेदारी हर साल उड़ जाती है।

ठीक उसी हवा में।


यहां सांस लेना

एक राजनीतिक बयान है।

और खांसना

एक जन आंदोलन।


दिल्ली की हवा

इतनी जहरीली है कि

अब ज़हर भी शर्मिंदा है।


यह हवा

धीरे-धीरे नहीं मारती।

बस रोज़ याद दिलाती है—

“आज भी बच गए।”


कहते हैं—

ज़िंदगी चार सांसों की होती है।

दिल्ली में दो पहले ही

हवा ले जाती है।


बाकी दो

आप अस्पताल में ढूंढते हैं।

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