विजय शंकर पांडेय
एक होता है बेहया।
दूसरा होता है वज्र-बेहया।
पहला कभी-कभार शरमा जाता है।
दूसरा शर्म को सरकारी फाइल समझता है।
जिसे खोलना मना है।
बेहया गलती करे तो कान खुजाता है।
वज्र-बेहया गलती करे तो प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाता है।
कहता है—सब ठीक है।
गलती जनता की है।
समझने में चूक गई।
बेहया कुर्सी पाए तो थोड़ा संभलता है।
वज्र-बेहया कुर्सी पाए तो कुर्सी संभलती है।
डरती है।
कहीं ये बैठ न जाए।
और लकड़ी तक जल न जाए।
इनकी खासियत निराली है।
कीचड़ में कमल ढूंढ लेते हैं।
और कमल में भी कीचड़।
फिर गर्व से बताते हैं—
देखो, सफाई अभियान चल रहा है।
इनका आत्मविश्वास अद्भुत होता है।
तूफान आए तो कहते हैं—हमने बुलाया।
बारिश हो तो कहते हैं—हमारी योजना।
सूखा पड़े तो कहते हैं—जनता की साजिश।
ये हर मंच पर चमकते हैं।
माइक मिले तो इतिहास बदल देते हैं।
कैमरा मिले तो भूगोल।
और मौका मिले तो संविधान भी।
कुर्सी इनके लिए सेवा नहीं।
कुर्सी इनके लिए जिम है।
जहां वे रोज नैतिकता उठाते हैं।
और फर्श पर पटक देते हैं।
इनकी चमड़ी वैज्ञानिक चमत्कार है।
टिप्पणी पड़े तो फिसल जाती है।
आलोचना पड़े तो उछल जाती है।
जवाबदेही आए तो गायब हो जाती है।
बेहया कभी-कभी सोचता है—
“यार, लोग क्या कहेंगे?”
वज्र-बेहया सोचता है—
“लोग कुछ भी कहें,
कुर्सी क्या कहेगी?”
और कुर्सी बेचारा क्या कहे।
वह लकड़ी है।
चुप रहती है।
मगर इतिहास गवाही देता है—
कई बार कुर्सी छोटी नहीं होती।
बैठने वाला बड़ा बेहया निकल आता है।
इसलिए राजनीति का नया सिद्धांत बना है।
योग्यता बाद में।
बेशर्मी पहले।
जो जितना वज्र-बेहया,
उसकी कुर्सी उतनी स्थायी।
जनता देखती है।
हंसती है।
कभी-कभी रो भी लेती है।
फिर चुनाव आता है।
और कहानी फिर से शुरू हो जाती है।
#AprilFoolsDay


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी: केवल इस ब्लॉग का सदस्य टिप्पणी भेज सकता है.