सपने छुट्टी पर हैं

 

विजय शंकर पांडेय 


युद्ध शुरू होता है।

पहले बयान आता है।

फिर चेतावनी।

फिर आखिरी चेतावनी।

और फिर… वही पुरानी कहानी।


नेता कहते हैं—रणनीति जरूरी है।

जनता पूछती है—रोटी भी?

जवाब आता है—वो अगली मीटिंग में।


टीवी पर नक्शे चमकते हैं।

लाल तीर दौड़ते हैं।

स्टूडियो में जीत तय हो जाती है।

मैदान में इंसान हार जाता है।


बच्चा लाइन में खड़ा है।

हाथ में कटोरा है।

आंखों में सवाल है।

पर जवाब… कहीं और व्यस्त है।


स्कूल खामोश है।

ब्लैकबोर्ड खाली है।

चॉक घिस चुकी है।

सपने छुट्टी पर हैं।


अस्पताल भरा है।

दवा आधी है।

दर्द पूरा है।

और बजट… भाषण में है।


हर मौत एक आंकड़ा बनती है।

फाइल में फिट हो जाती है।

पर घर में जो सन्नाटा है—

उसका कोई कॉलम नहीं होता।


फिर घोषणा होती है—पुनर्निर्माण!

ताली बजती है।

ठेके निकलते हैं।

और मलबा “मौका” बन जाता है।

आपदा में अवसर।


युद्ध खत्म नहीं होता।

बस नाम बदलता है।

कभी ऑपरेशन।

कभी मिशन।

कभी “शांति प्रक्रिया”।



और इंसान?

वो हर बार वही रहता है—

टूटता हुआ।

छूटता हुआ।

और… भूलता हुआ।


क्योंकि अगला युद्ध

बस अगली हेडलाइन दूर है।










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