विजय शंकर पांडेय
पुरुषों का कोई मायका नहीं होता।
सच है।
पर छटाँक भर झूठ भी है।
पुरुष का मायका होता है—
चाय की अड़ी।
जहां चार यार मिल जाएं।
और पांचवा उधार लिखवा दे।
वहां कोई माथा नहीं चूमता।
पर पूछता जरूर है—
“क्यों यार, बहुत परेशान लग रहे हो?”
बस वही पूछना ही
माथा चूमने जैसा होता है।
घर में वह पिता है।
ऑफिस में कर्मचारी है।
बैंक में ईएमआई।
और समाज में जिम्मेदारी।
पर चाय की दुकान पर
वह फिर से “किशोरवय” में लौट जाता है।
वहां कोई नहीं पूछता—
बिजली का बिल भरा?
स्कूल की फीस दी?
सिलेंडर आया?
वहां सिर्फ एक सवाल होता है—
“कटिंग या फुल?”
पुरुष का मायका
पुरानी बाइक भी होती है।
जिसे स्टार्ट करते ही
आत्मा स्टार्ट हो जाती है।
कभी-कभी उसका मायका
मोबाइल में सेव
दोस्तों के व्हाट्सऐप संदेशे भी होते हैं।
जहां दिन भर
देश की राजनीति सुधरती है।
क्रिकेट की रणनीति बनती है।
और दुनिया बचाई जाती है।
फिर रात को वही पुरुष
घर लौटता है।
फिर वही जिम्मेदारियां।
फिर वही ईएमआई।
फिर वही पिता-पति का रोल।
पर फर्क इतना होता है—
आज वह
अपने “मायके” से होकर आया है।
दो कप चाय पीकर।
तीन गालियां सुनकर और सुनाकर।
और चार ठहाके लगाकर।
पुरुष रोता यदा कदा ही है।
पर हंसकर
अपना दुख किस्तों में चुका देता है। ☕😄


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी: केवल इस ब्लॉग का सदस्य टिप्पणी भेज सकता है.