विजय शंकर पांडेय
युद्ध शुरू हुआ।
पहले ट्विटर जीता।
फिर टीवी स्टूडियो।
फिर हैशटैगों ने विजय पताका फहराई।
जमीन हँस रही थी।
वह बोली — बेटा, यहाँ मिसाइलें सच में गिरती हैं।
अमेरिका बोला —
हम लोकतंत्र पहुँचा रहे हैं।
इजरायल बोला —
हम सुरक्षा खोज रहे हैं।
ईरान बोला —
हम सम्मान बचा रहे हैं।
और दुनिया बोली —
तेल का भाव कितना हुआ?
युद्ध में सबसे पहले सच मरता है।
उसके बाद तर्क।
फिर इंसान।
फिर उम्मीद।
सोशल मीडिया पर सब जनरल हैं।
सोफे पर बैठे रणनीतिकार।
चाय के कप में विश्व युद्ध।
एक क्लिक में हमला।
एक ट्वीट में विजय।
एक रील में राष्ट्रवाद।
जमीन पर धुआँ है।
आसमान में ड्रोन।
और इंसान के भीतर डर।
लम्हों ने गलती की।
सदियाँ बिल भरेंगी।
नेता बोले —
यह अंतिम युद्ध है।
इतिहास हँसा।
कहा — यह संवाद मैं हजार बार सुन चुका हूँ।
असल दुश्मन कौन है?
किसी को नहीं पता।
फिर भी हथियार तैयार हैं।
बटन चमक रहे हैं।
भविष्य दरवाजे पर खड़ा है।
डरा हुआ।
कह रहा है —
भाइयों, पहले मुझे पहचान तो लो।
लेकिन दुनिया व्यस्त है।
किसी को दुश्मन चाहिए।
किसी को बाजार।
किसी को चुनाव।
और हथियार कंपनियाँ?
वे सबसे शांत हैं।
सबसे खुश भी।
उनके कैलेंडर में हर दिन
युद्धोत्सव है।
सच बड़ा अजीब है।
हम दूसरे को मारते हैं।
असल में खुद को चोट पहुँचाते हैं।
हर हत्या में
थोड़ी आत्म-घृणा होती है।
सभ्यता आगे बढ़ी है।
मिसाइल तेज हुई है।
नफरत सस्ती हुई है।
इंसान चाँद पर पहुँच गया।
पर दिमाग अब भी गुफा में है।
युद्ध चलता रहेगा।
घोषणाएँ
भी।
विजय के भाषण भी।
और कब्रिस्तान?
वह हमेशा तटस्थ रहता है।
वह सबको जगह देता है।


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