विजय शंकर पांडेय
संकट गहरा है.... शायद इतना गहरा कि ज्यादातर थिंक टैंक उसकी फिलहाल परिकल्पना तक नहीं कर पा रहे हैं.... सभी का तात्कालिक स्वार्थ भी आड़े आ रहा है.... कोरोना वायरस ने पूरी मानव सभ्यता को एक ऐसी सुरंग में धकेल दिया है.... जहां से दूर दूर तक अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा है... संभव है हम देर सबेर हाथ पांव मार कर इस महामारी के चलते हो रही मौतों पर नकेल कस लें... या ऊपरवाला जान बख्श दे.... मगर बकौल मुज़फ़्फ़र रज़्मी 'ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने / लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई....'
अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी ए केसेंजर ने 'वाल स्ट्रीट जरनल' में प्रकाशित अपने एक लेख में कहा है कि यह महामारी विश्व व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल देगी... कोरोना के लौटने के बाद एक नए वर्ल्ड आर्डर का अस्तित्व में आना तय है.... कायदे से वायरस का यह हमला पूरी मानव सभ्यता पर है... सो इससे लड़ने के लिए भी पूरी दुनिया को एकजुट होना चाहिए था... अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामूहिक कारगर रणनीति बनाई जानी चाहिए थी.... मगर पूरी दुनिया बंटी हुई है....
कई देशों में तो नेतृत्व पर ही सवाल उठने शुरू हो गए हैं... कई जगह नेताओं का इगो बाधक बना हुआ है... यहां तक कि लोग और समुदाय बंटे हुए हैं.... सभी अपनी अपनी डफली बजा रहे हैं... अपने अपने राग अलाप रहे हैं... हेनरी केसेंजर 1944 में दूसरे विश्व युद्ध के वक्त अमरीकी थल सेना का हिस्सा थे.... वे लिखते हैं कि आज भी वही ख़तरा मंडरा है, जो विश्व युद्ध के समय था... यानी कहीं भी कोई भी तब निशाना बन सकता था.... इसी तरह कोरोना भी किसी को भी निशाना बना रहा है... ऐसे में राजनीतिक दिग्गजों की हरकतें बहुत मायने रखती हैं...
मगर इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि चुनाव के मद्देनजर सर्वशक्तिमान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लॉकडाउन तक का निर्णय नहीं ले पा रहे हैं.... सब कुछ राज्यों के विवेक पर छोड़ दिया गया है... यहां तक कि आम लोगों को मास्क पहनने का मशविरा देने वाले ट्रंप खुद उससे परहेज कर रहे हैं.... कट्टर धर्मांधों ने सोशल डिस्टैंसिंग और लॉकडाउन जैसे अति आवश्यक पहल का पूरी दुनिया में बेड़ा गर्क कर रखा है.... इसमें सभी तबके के धुरंधर धनुर्धर शामिल हैं.... उन्हें शायद यह अहसास भी नहीं है कि कोरोना ने जो राजनैतिक और आर्थिक उथल पुथल मचायी है... वह कई पीढ़ियों तक जारी रहेगी... इतिहास उन्हें मानव सभ्यता के दुश्मन के रूप में याद रखने की तैयारी भी शुरू कर चुका है....
चिली के सॉन्डा एसएस कंपनी के प्रेसिडेंट आंद्रे नैवारो ने कभी कहा था कि अगर आप खुद को नहीं बदल सकते तो दुनिया को छोड़िए.... अपने बच्चों को भी नहीं बदल सकते... इक्कीसवीं सदी में काफी हद तक बदल चुकी है यह दुनिया... सेर भर गेहूं-चावल के बदले लेमनचूस और बताशे खरीदने वाली पीढ़ी के बच्चे आज एंड्रॉयड किटकैट तक की आनलाइन खरीदारी कर रहे हैं.... मगर यहां तो 'टोनहिनिया की जान अब भी तोतवा की नरेटी में ही अटकी हुई है...'
04 अप्रैल 2020