लोकतंत्र में कैमरा उठाना गुनाह है क्या?

 पत्रकार बनाम रील मेकर

विजय शंकर पांडेय 



सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों एक बड़ा सवाल गूंज रहा है—कौन पत्रकार है और कौन रील मेकर? सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील है कि मोबाइल से रिकॉर्डिंग करने वाले हर शख्स की पहचान करना मुश्किल है। बात में दम है! आखिर कैमरे के पीछे खड़े आदमी की नीयत पढ़ने वाला कोई ऐप अभी तक लॉन्च नहीं हुआ है।


लेकिन सवाल यह है कि अगर मोबाइल उठाकर वीडियो बनाने वाला रील मेकर है, तो सूट-बूट पहनकर स्टूडियो में बैठा हर शख्स पत्रकार कैसे हो गया? क्या पत्रकारिता की डिग्री अब कैमरे के मेगापिक्सल और माइक पर लगे चैनल के लोगो से तय होगी?


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। संविधान ने कहीं यह नहीं लिखा कि बोलने से पहले किसी बड़े मीडिया हाउस का नियुक्ति पत्र दिखाना होगा। न ही यह शर्त रखी गई कि सच बोलने के लिए गले में प्रेस कार्ड और पीछे ओबी वैन होनी चाहिए।


दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स की याचिका भी इसी सवाल को उठाती है कि स्वतंत्र पत्रकारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खबरें साझा करने वालों को संरक्षण से वंचित क्यों रखा जाए?


अब जरा सरकार की चिंता समझिए। मोबाइल लेकर घूमने वाला व्यक्ति पत्रकार निकला, तो वह सवाल पूछ सकता है। सवाल पूछ लिया, तो जवाब देना पड़ सकता है। जवाब देने लगे, तो पुराना बयान याद आ सकता है। और पुराना बयान याद आ गया, तो नई खबर बन सकती है! इसलिए बेहतर है कि पहले यह तय हो जाए कि कैमरे वाला पत्रकार है या रील मेकर। तब तक मुद्दा कहीं और निकल चुका होगा।


वैसे रील बनाना अपराध नहीं है। बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रील बनाने को रोजगार के अवसरों से जोड़ चुके हैं। अब रोजगार का रास्ता खोलने के बाद अगर कोई उसी मोबाइल से भ्रष्टाचार, बदइंतजामी या जनता की परेशानी रिकॉर्ड करने लगे, तो उसके पेशे की पहचान अचानक इतनी जटिल क्यों हो जाती है?


क्या रील में दिखाया गया सच, सिर्फ इसलिए झूठ हो जाएगा कि उसे किसी स्वतंत्र पत्रकार ने रिकॉर्ड किया है?


मुख्यधारा के मीडिया पर भी सवाल कम नहीं हैं। व्यावसायीकरण, प्रायोजित खबरें, राजनीतिक दबाव और टीआरपी की दौड़ ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाई है। सोशल मीडिया पर लोग अक्सर मुख्यधारा के मीडिया को 'गोदी मीडिया' कहकर निशाना साधते हैं। ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकार कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण हैं।


हालांकि, हर स्वतंत्र पत्रकार सत्यवादी हरिश्चंद्र नहीं और हर रील मेकर खोजी पत्रकार नहीं। सोशल मीडिया पर अफवाहें भी फैलती हैं। इसलिए पत्रकारिता की कसौटी पहचान पत्र नहीं, बल्कि तथ्य, निष्पक्षता, जवाबदेही और जनहित होना चाहिए।


रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है। यह स्थिति मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।


ऐसे में महिला पत्रकारों पर हमले और बदसलूकी के मामलों में उनकी सुरक्षा पर बहस होनी चाहिए, न कि उनकी पहचान को ही बहस का केंद्र बना दिया जाए। पत्रकार चाहे बड़े चैनल का हो या छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म का, हमला करने वाले से पहले उसके संस्थान का नाम पूछना कैसा न्याय है?


लोकतंत्र में कैमरा अपराधी नहीं होता, वह कभी-कभी सत्ता का आईना भी होता है। आईने में चेहरा अच्छा दिखे तो उसे विकास की तस्वीर कहिए, लेकिन चेहरा बिगड़ा दिखे तो आईना बनाने वाले को रील मेकर बताकर खारिज मत कीजिए।


आखिर लोकतंत्र कोई ऐसा स्टूडियो नहीं, जहां सिर्फ चुने हुए एंकरों को बोलने की अनुमति हो। यहां जनता भी सवाल पूछ सकती है। और हां, अगर हर सवाल पूछने वाले को पत्रकार मानना मुश्किल है, तो हर सवाल से बचने वाले को लोकतंत्र का रक्षक मानना भी आसान नहीं होना चाहिए!


.

.

.

.

.


#पत्रकारिता #प्रेसकीआजादी #रीलमेकर #अभिव्यक्तिकीआजादी #लोकतंत्र #journalism #freedomofpress #reelmaker #FreedomOfExpression #democracy

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी: केवल इस ब्लॉग का सदस्य टिप्पणी भेज सकता है.