स्रष्टा और सृष्टि का अंतर मिट रहा

अब आपका गुस्सा भी “डिजिटल एसेट” है, हाथ में ब्रह्मास्त्र, दिमाग में फितूर

#विजय_शंकर_पांडेय


आज के युग में ज्ञान बहुत सस्ता हो गया है। इतना सस्ता कि हर दूसरा आदमी रील देखकर तीन मिनट में भू-राजनीति, क्वांटम फिजिक्स और अध्यात्म सामान्य तौर पर समझ लेता है। सूचनाओं का ऐसा अंबार है कि आदमी को अपने पड़ोसी का जन्मदिन भले याद न हो, लेकिन मंगल ग्रह का तापमान पता है। ज्ञान कहता है— “सब कुछ संभव है।” विवेक बेचारा कोने में बैठकर पूछता है— “लेकिन भाई, करना भी चाहिए क्या?” 



आज लोग टर्म ऐंड कंडीशन पढ़े बिना आत्मा तक स्वीकार कर लेते हैं। और फिर कहते हैं—प्राइवेसी खतरे में है! हर जेब में स्मार्टफोन है, लेकिन बातचीत अब भी मूर्खतापूर्ण है। गूगल के पास हर सवाल का जवाब है, बस “चुप कब रहना है” इसका ऑप्शन अभी बीटा वर्जन में है। पहले लोग तपस्या करके ज्ञान पाते थे। अब लोग वाईफाई  पकड़कर ज्ञानी बन जाते हैं। एक सज्जन तो सुबह योगा पर मोटिवेशनल पोस्ट डालते हैं, और दोपहर में ट्रोलिंग करके चार लोगों का रक्तचाप बढ़ा देते हैं। असल संकट सूचना की कमी नहीं, शून्य की कमी है। वह खाली जगह, जहां आदमी थोड़ा रुककर सोच सके—“जो मैं जानता हूं, क्या उसे समझता भी हूं?” वरना आजकल ज्ञान बढ़ रहा है, और बुद्धि स्टोरेज फुल दिखा रही है।


इंसान पहले पत्थर घिसता था, अब प्रॉम्प्ट घिस रहा है। पहले आग खोजी थी, अब “एआई जेनरेटेड” ज्ञान खोज रहा है। ऋषि-मुनि जंगल में ध्यान लगाते थे, आजकल लोग चैटजीपीटी से पूछते हैं— “गुरुजी, आत्मा क्या है? और साथ में एक एचडी फोटो भी बना दो।” हर आदमी अपनी चेतना का डिजिटल जुड़वा बना रहा है। किसी का एआई प्रेम पत्र लिख रहा है, किसी का एआई इश्क के हुनर सीखा रहा, और कुछ महानुभावों का एआई इस्तीफा भी लिख देता है— बस नौकरी छोड़ने की हिम्मत अभी इंसान को खुद करनी पड़ती है। दार्शनिक चिंतित हैं— “स्रष्टा और सृष्टि का अंतर मिट रहा है!” 

उधर कॉर्पोरेट वाले खुश हैं— “बहुत बढ़िया! अब कर्मचारी भी मशीन, और मशीन भी कर्मचारी!” एक बाबा ने तो नया कोर्स निकाल दिया— “डिजिटल मोक्ष विद कृत्रिम कुंडलिनी।” फीस मात्र 51 हजार। साथ में फ्री ई-बुक— “आत्मज्ञान इन 30 सेकंड।” सब ओर डेटा का शोर है। एल्गोरिद्म चीख रहे हैं। नोटिफिकेशन बरस रहे हैं। और भीतर बैठा मौलिक मौन धीरे से पूछ रहा है— “बेटा, तू चेतना बढ़ा रहा है या बस वाईफाई?” यहीं से शुरू होता है चेतना का विद्रोह— जब आदमी पहली बार मोबाइल बंद करके खुद से मिलने की कोशिश करता है।


इंसान ने कमाल कर दिया है। जेब में ऐसी मशीन रख ली है, जिससे पूरी दुनिया चल सकती है। बस दिक्कत इतनी है कि उसी मशीन से वह दिनभर रील भी देख रहा है। हम ईश्वरीय सामर्थ्य वाले उपकरण बना रहे हैं। AI  नॉवेल लिख रहा है, रोबोट सर्जरी कर रहा है, ड्रोन युद्ध लड़ रहे हैं। और इंसान? अब भी “रिप्लाई आल” दबाकर ऑफिस में महाभारत करा देता है। तकनीक आसमान छू रही है, लेकिन संयम अब भी जमीन पर पड़ा नेटवर्क ढूंढ रहा है। 


एक वैज्ञानिक बोला— “हमने ऐसी मशीन बनाई है जो मानवता बदल देगी!” उधर निवेशक बोला— “बहुत बढ़िया। इससे विज्ञापन कितने बेचेंगे?” सभ्यता बड़ी अजीब जगह पहुंच गई है। परमाणु शक्ति भी है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी, लेकिन ट्रैफिक में हॉर्न बजाते समय आदिमानव वाली आत्मा जाग जाती है। तकनीक भविष्य का ढांचा बना सकती है, लेकिन उसमें प्राण फूंकने का काम अब भी चेतना को ही करना है। वरना होगा यह कि मशीनें सुपरइंटेलिजेंट होंगी और उन्हें चलाने वाले लोग पासवर्ड में “1234” डाल रहे होंगे। असल खतरा AI नहीं है। खतरा वह इंसान है जिसके हाथ में ब्रह्मास्त्र है और दिमाग में कमेंट सेक्शन।


आप जितना चिल्लाएंगे, उतना प्लेटफॉर्म कमाएगा


पहले जमाने में व्यापारी नमक बेचते थे। अब कंपनियां गुस्सा बेचती हैं। सोशल मीडिया का नया सिद्धांत है— “आप खुश हैं? तो आप बेकार यूज़र हैं।” फ्रांसेस हॉगन ने बताया कि एल्गोरिद्म वही दिखाते हैं जिससे लोग लड़ें, भड़कें और टूट जाएं। क्योंकि प्यार में लोग स्क्रोल कम करते हैं, लेकिन नफरत में पूरी रात जागते हैं। अब आपका गुस्सा भी “डिजिटल एसेट” है। आप जितना चिल्लाएंगे, उतना प्लेटफॉर्म कमाएगा। 


एक आदमी ने लिखा— “आज मौसम अच्छा है।” पोस्ट पर दो लाइक आए। दूसरे ने लिखा—“देश खतरे में है!” तीन लाख शेयर, चार टीवी डिबेट, और पांच राजनीतिक पार्टियों का टिकट। एल्गोरिद्म बड़ा संवेदनशील जीव है। उसे आपकी उदासी, डर, असुरक्षा सब समझ आती है। बस इंसानियत समझने का फीचर अभी डेवलपमेंट में है। पहले मां कहती थी— “बेटा, गुस्सा मत किया करो।” अब ऐप कहता है— “भाई, थोड़ा और भड़क जाओ, इंगेजमेंट गिर रहा है।” दुनिया में अब भावनाएं महसूस नहीं की जातीं, मापी जाती हैं। क्रोध = रीच। नफरत = मोनेटाइजेशन। और विवेक? वह शायद “कम्युनिटी गाईडलाइन” पढ़ते-पढ़ते कहीं सो गया है।


भाई, इससे पड़ोसी की नौकरी कैसे खा सकते हैं?


तकनीक बेचारा निर्दोष है। उसने कब कहा था— “मुझे बनाओ और फिर नैतिकता को छुट्टी पर भेज दो!” समस्या यह है कि हमारे मोबाइल का सॉफ्टवेयर हर हफ्ते अपडेट हो जाता है, लेकिन दिमाग अब भी “संस्करण 1.0” पर अटका है। चैटजीपीटी दो महीने में 10 करोड़ लोगों तक पहुंच गया। उधर नैतिकता समिति अभी तक पहली मीटिंग का व्हाट्सऐप ग्रुप ही बना रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पूछ रहा है— “मैं मानवता की कैसे सेवा करूं?” और इंसान पूछ रहा है— “भाई, इससे पड़ोसी की नौकरी कैसे खा सकते हैं?” 

पहले लोग चरित्र निर्माण करते थे। अब “प्रोफाइल निर्माण” करते हैं। बायो में लिखा है— सहानुभूतिपूर्ण | दूरदर्शी | मानवता को प्राथमिकता देने वाला और नीचे कमेंट— “भाई, उसको बेरोजगार करवा दो।” मशीनें रातोंरात अपग्रेड हो रही हैं। कल तक एआई स्क्रिप्ट लिखता था, आज फिल्म बना रहा है। कल शायद संसद भी चला ले। वैसे फर्क किसी को पता भी नहीं चलेगा। मानव चरित्र बेचारा धीमा है। उसे अपडेट होने में पीढ़ियां लगती हैं। क्योंकि उसके सर्वर पर अहंकार, लालच और पाखंड का भारी लोड है। दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भाग रही है, और नेचुरल कॉमन सेंस अब लुप्तप्राय प्रजाति घोषित होने वाला है।


साभार #नेशनल_व्हील्स #प्रयागराज

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