तभी लोकतंत्र के रिमोट से किसी ने म्यूट बटन दबा दिया

 विजय शंकर पांडेय


देश की सबसे बड़ी पंचायत में इस बार नया नियम लागू हुआ है— बोलना मना है, समझना वैकल्पिक है, और मान लेना अनिवार्य है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों तैयार थे। विपक्ष फाइल लेकर आया था, सत्ता पक्ष भी जवाब लेकर। जनता उम्मीद लेकर बैठी थी— आज कुछ तो सुना जाएगा! लेकिन तभी लोकतंत्र के रिमोट से किसी ने म्यूट बटन दबा दिया। विपक्ष बोला—हम चर्चा चाहते हैं! जवाब आया—हमने उचित विचार-विमर्श कर लिया है। विपक्ष फिर बोला—लेकिन हमें भी तो बोलने दें! जवाब मिला—आपके विचार हम पहले ही समझ चुके हैं, अब उसे सुनने की ज़रूरत नहीं। 


लोकसभा में ओम बिरला और राज्यसभा में सीपी राधाकृष्णनन ने बड़ी शालीनता से कहा— बहस नहीं होगी, क्योंकि हमने पहले ही बहस कर ली है… अपने-अपने दिमाग में। यह सुनकर लोकतंत्र थोड़ा चौंका— अच्छा! अब बहस भी इन-हाउस हो गई? उधर विपक्ष के पास लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 हस्ताक्षर थे। मतलब संख्या पूरी थी, मौका अधूरा रह गया। जैसे शादी में बारात पूरी आ जाए, लेकिन दूल्हे से कहा जाए— फेरे हमने सोच लिए हैं, आप बस मिठाई खा लीजिए। प्रस्ताव था—मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने का। मुद्दा बड़ा था, सवाल गंभीर थे, लेकिन समाधान सरल निकला—चर्चा ही मत होने दो। क्योंकि अगर चर्चा होगी, तो सवाल उठेंगे। सवाल उठेंगे, तो जवाब देने पड़ेंगे। और जवाब देने पड़ेंगे, तो कहीं भरोसा भी बन सकता है— जो कि इस समय सबसे अनावश्यक चीज़ लग रही है।


जनता टीवी पर बैठी सोच रही थी— अरे! ये वही संसद है न, जहाँ कभी बहस हुआ करती थी? अब तो लगता है— संसद नहीं, साइलेंट मोड में चल रही मीटिंग है। विपक्ष के नेता बोले— हमें बोलने का मौका चाहिए! सत्ता पक्ष ने मुस्कुराकर कहा— आपकी भावना हम तक पहुँच गई है, अब शब्दों की क्या ज़रूरत? यह नया लोकतांत्रिक मॉडल है— जहाँ संवाद की जगह सारांश चल रहा है। जनता के मन में जो शक था, वो अब थोड़ा और मजबूत हो गया। क्योंकि जब सवाल पूछने की इजाज़त नहीं मिलती, तो लोग जवाब खुद बना लेते हैं— और वही सबसे खतरनाक होते हैं।


अगर सब ठीक है, तो बोलने में डर कैसा है?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ, निर्वाचन आयोग की सफाई, और अब संसद की चुप्पी— तीनों मिलकर एक नया नैरेटिव बना रहे हैं— अगर सब ठीक है, तो बोलने में डर कैसा है? लोकतंत्र अब सोच रहा है— मुझे बचाने के लिए बहस जरूरी थी, अब मुझे बचाने के लिए चुप्पी जरूरी हो गई? अंत में जनता ने टीवी बंद किया और कहा— लगता है अगली बार वोट डालने से पहले हमें यह भी पूछना पड़ेगा— वोट डालें या सीधे मान लें कि सब ठीक है? और संसद के गलियारों में कहीं एक धीमी आवाज गूंजी— बहस होती तो रिकॉर्ड बनता… अब सिर्फ रिकार्डेड साइलेंस है। 


लोकतंत्र में अब चुनाव नहीं हो रहा, “संदेह उत्सव” मनाया जा रहा है। पहले लोग वोट डालते थे, अब शक डालते हैं—और वह भी पूरे आत्मविश्वास के साथ। पहले सवाल होता था—किसे वोट दें? अब सवाल है—वोट जाएगा भी या बीच रास्ते में ही ‘लापता’ तो नहीं हो जाएगा? निर्वाचन आयोग बेचारा अब सिर्फ चुनाव नहीं कराता, वह लोगों के मन से शक हटाने की कोशिश भी करता है। लेकिन समस्या यह है कि शक अब वायरल कंटेंट बन चुका है—एक बार फैल गया तो हर मोबाइल में अपना घर बना लेता है। 


पश्चिम बंगाल का माहौल तो जैसे चुनाव से पहले ही ‘थ्रिलर फिल्म’ बन चुका है। हर गली में सस्पेंस, हर चौक पर क्लाइमेक्स। और मालदा के कलियाचक में तो लोकतंत्र ने खुद को रियलिटी शो में बदल लिया—जहाँ न्यायिक अधिकारी दस घंटे तक “कैद में लोकतंत्र” एपिसोड का हिस्सा बने रहे। भीड़ भी कमाल की थी—महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग—सब शामिल। ऐसा लग रहा था जैसे कोई त्योहार हो। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां प्रसाद की जगह आक्रोश बांटा जा रहा था।


संदेह अब लोकतंत्र का नया ईंधन बन चुका है

कोई पूछे—आप क्यों आए हैं? जवाब मिला, हमें भी नहीं पता, लेकिन माहौल गरम है, तो हम भी गरम हैं। आजकल भीड़ का अपना तर्क है— अगर हम गुस्से में नहीं होंगे, तो हमें सीरियस कौन लेगा? और नेताओं का तर्क उससे भी सरल— अगर जनता गुस्से में है, तो उसे थोड़ा और गुस्सा दिलाना हमारा कर्तव्य है। संदेह अब लोकतंत्र का नया ईंधन बन चुका है। बिना इसके चुनाव का इंजन स्टार्ट ही नहीं होता। कोई कहता है—सूची में नाम नहीं है। कोई कहता है—नाम है, पर भरोसा नहीं है।

और कुछ लोग तो इतने उन्नत हो चुके हैं कि कहते हैं—हमें खुद पर ही भरोसा नहीं है, वोट पर क्या भरोसा करें! इस पूरे ड्रामे में न्यायिक अधिकारी सबसे दिलचस्प किरदार बन गए हैं— वे फाइल लेकर आए थे, और ‘बंधक अनुभव’ लेकर लौटे।


सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई—और जतानी भी चाहिए थी। लेकिन कोर्ट भी शायद सोच रहा होगा— हम फैसला सुनाएं या पहले जनता के संदेह का इलाज करें? असल समस्या यही है—चुनाव प्रक्रिया से ज्यादा लोगों के मन की प्रक्रिया बिगड़ गई है। जहाँ भरोसा होना चाहिए था, वहाँ शक है। जहाँ धैर्य होना चाहिए था, वहाँ भीड़ है। और जहाँ संवाद होना चाहिए था, वहाँ नारे हैं। लोकतंत्र अब वोट से नहीं, वायरल वीडियो से प्रभावित होता है।


आखिर में जनता भी कन्फ्यूज है

जिसका वीडियो ज्यादा चला, उसका नैरेटिव सही माना जाता है। आखिर में जनता भी कन्फ्यूज है— हम वोटर हैं, दर्शक हैं, या इस पूरे शो के एक्स्ट्रा कलाकार? और लोकतंत्र चुपचाप कोने में बैठा सोच रहा है—मुझे बचाने के लिए चुनाव कराए जाते थे, अब चुनाव बचाने के लिए मुझे ही बचाना पड़ रहा है। कहानी का नैतिक संदेश बहुत सीधा है— जब भरोसा गायब हो जाता है, तो लोकतंत्र भीड़ के भरोसे चलने लगता है… और भीड़ का भरोसा—आप जानते ही हैं— हर पाँच मिनट में अपडेट हो जाता है!


देश में दो तरह के आयोग सक्रिय हैं— एक है निर्वाचन आयोग। और दूसरा है जनता का संदेह आयोग। पहला चुनाव कराता है, दूसरा चुनाव पर शक कराता है। अब समस्या यह है कि दूसरा आयोग ज्यादा लोकप्रिय हो गया है। उसके पास न दफ्तर है, न कर्मचारी— फिर भी उसकी पहुँच हर गली, हर मोबाइल और हर चाय की दुकान तक है। निर्वाचन आयोग ने सोचा—चलो सुधार करते हैं। और देखते ही देखते पश्चिम बंगाल के 480 अफसरों का तबादला कर दिया। ऐसा लगा जैसे चुनाव नहीं, म्यूजिकल चेयर का फाइनल राउंड चल रहा हो।


अफसर भी कन्फ्यूज— हम ड्यूटी पर हैं या ट्रांसफर की रिहर्सल में? ऊपर से आया आदेश—निष्पक्ष रहो। नीचे से आया सवाल—सर, पहले पता तो हो हम हैं कहाँ? फिर आया विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात SIR। नाम सुनकर लगा जैसे कोई सुपरहीरो एंट्री कर रहा हो— मैं हूँ SIR, सब ठीक कर दूँगा! लेकिन SIR के आते ही 10 लाख आपत्तियाँ आ गईं। इतनी आपत्तियाँ कि खुद आपत्तियाँ भी सोचने लगीं—हम ज़्यादा तो नहीं हो गईं? अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा—जल्दी निपटाओ। तो निपटाया गया—इतनी तेजी से कि कुछ आपत्तियाँ समझ ही नहीं पाईं कि उन्हें सुना गया या सिर्फ स्क्रॉल किया गया।


निष्पक्षता अब सिद्धांत नहीं, कस्टमाइज्ड सर्विस

निष्पक्षता अब भारत में कोई सिद्धांत नहीं, एक कस्टमाइज्ड सर्विस बन चुकी है—आपकी ज़रूरत के हिसाब से निष्पक्षता। पश्चिम बंगाल में भारतीय चुनाव आयोग ने पूरा प्रशासन बदल दिया—जैसे घर में मेहमान आने वाले हों और अचानक सफाई अभियान चल पड़े। कुर्सियाँ बदलो, टेबल बदलो, माहौल बदलो… ताकि निष्पक्षता चमकती हुई दिखे। वहीं असम में सब कुछ वैसा ही है। यहाँ निष्पक्षता छुट्टी पर है, शायद ब्रह्मपुत्र किनारे चाय पी रही है। हिमंता बिस्वा सरमा के साथ सेटिंग इतनी आरामदायक है कि आयोग को लगा—यहाँ सब ठीक ही होगा, क्यों बेवजह मेहनत करें? 


अब निष्पक्षता भी क्षेत्रीय भाषा समझने लगी है। बंगाल में वो सख्त अफसर बन जाती है—सब बदल दो! और असम में दोस्ताना अंदाज़—आप जैसे हैं, वैसे ही बढ़िया हैं। जनता भी कन्फ्यूज है—निष्पक्षता का ट्रांसफर ऑर्डर आया क्या? कोई कहता है—भाई, ये वन नेशन, वन निष्पक्षता’ नहीं है, ये वन स्टेट, वन स्टाइल है। आखिरकार लोकतंत्र में सब बराबर हैं… बस कुछ लोग ज़्यादा बराबर हैं!


नतीजा— काम पूरा हुआ, पर भरोसा अधूरा रह गया। जनता ने देखा— इतनी जल्दी? जरूर कुछ गड़बड़ है! और फिर शुरू हुआ साज़िशाना कहानियों का सीज़न 2। कोई बोला—सूची में नाम गायब है। दूसरा बोला—नाम है, पर भरोसा गायब है। तीसरा बोला—दोनों हैं, पर सिस्टम पर भरोसा नहीं है। अब राजनीतिक गुटों के लिए यह माहौल वैसा ही है जैसे सूखी घास में चिंगारी। बस एक बयान दो, और आग अपने आप फैल जाती है।


हर सफाई, एक नई शंका पैदा कर रही

नेता बोले— हम जनता की भावनाओं का सम्मान करते हैं। मतलब— जहाँ शक है, वहाँ थोड़ा और शक डालो। इस पूरे ड्रामे में सबसे दिलचस्प किरदार फिर वही—निर्वाचन आयोग। वह बार-बार कहता है— हमने सब नियमों के अनुसार किया। जनता जवाब देती है— हमें नियम नहीं, भरोसा चाहिए। सुप्रीम कोर्ट बीच में आता है, नाराजगी जताता है, टिप्पणी करता है— पर जनता का संदेह इतना जिद्दी है कि वह कहता है— कोर्ट भी आ गया, अब कहानी और पक्की लग रही है! यानी स्थिति यह है कि हर सफाई, एक नई शंका पैदा कर रही है। लोकतंत्र अब प्रक्रिया से नहीं, परसेप्शन से चलता है। और परसेप्शन वही बनाता है जिसकी कहानी ज्यादा मजेदार हो।


आखिर में सवाल वही— चुनाव निष्पक्ष है या नहीं? शायद है। शायद नहीं भी। लेकिन असली संकट यह है कि अब किसी को “शायद” पर भरोसा नहीं। लोकतंत्र को बचाने के लिए अब सिर्फ वोटिंग मशीन नहीं, ट्रस्ट मशीन भी चाहिए— जो हर वोट के साथ एक भरोसा भी डाले। वरना अगली बार निर्वाचन आयोग प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगा, और जनता पूछेगी— सर, चुनाव कब हैं? और साथ ही—और इस बार शक का रिजल्ट कब आएगा?



साभार - #नेशनल_व्हील्स #प्रयागराज 


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